Sep 19, 2010

आप हिंदी अधिकारी हैं मगर और क्या करते हैं ?

(अशिष्ट जी की एक नई कहानी )
उनका नाम ही निरोगीलाल था। तन-मन और कर्म से अपने नाम की तरह पूरी तरह निरोग। उनकी प्रतिरोधक क्षमता इतनी की रोग के कीटाणु उनपर हमला करने की बजाय उनकी परछाई तक से दूर भागते थे। कुछ लोग उन्हें सलाह देते थे कि अपना देशी नाम थोड़ा सा टिप-टाप कर लें और तनिक स्टाइल में ज़रा सा आधुनिकता का तड़का लगाकर मिस्टर एन. जी. लाल बन जाएं तो मैनेज़री का रूतबा भी झलकने लगेगा। मगर वे अपने देशीपन से बाहर आने को तैयार नहीं थे। उनके मन पर ‘खोसला का घोसला’ के चिरोंजीलाल की अमिट  छाप थी। 

वे सब कुछ निरोगी बना देना चाहते थे। जहां भी उन्हें हिंदी के काम में थोड़े भी फोड़े फुंसी नजर आते, वे तुरंत काट-पीट-छांट कर 'आपरेशन सफल' की घोषणा कर देते। अधिकाँश लोग उनके स्वास्थ्य से खौफ खाते थे मगर जिन्हें अँग्रेज़ी के  वात-कफ़-पित्त आदि असाध्य रोग लगे थे और जो हर बीमारी का इलाज़ अँग्रेज़ी दवाओं में ढूंढ कर सामयिक रूप से रोग को दबा-छुपा लेने के अभ्यस्त थे, वे उनसे खार खाए रहते। अधिकाँश इलाकों-कबीलों में लगातार आयातित  बीमारियों का प्रकोप रहता और उन इलाकों के लोग उनके निरोगिपन को देखकर इर्ष्या-द्वेष आदि-इत्यादि ला-इलाज छूत के रोगों से ग्रस्त हो जाते और मौके की तलाश में रहते कि कब किसी आयातित असाध्य रोग से निरोगीलाल को भी संक्रमित किया जाए।



वे एक प्रतिष्ठित बैंक में तैनात थे और पूरे मनोयोग से अपना काम करते थे। अपना काम से अभिप्राय अपने घर के काम से नहीं बल्कि जिस राजभाषा हिंदी के काम के लिए उनकी नियुक्ति हुई थी उसी काम को वे अच्छे से अच्छे ढंग से करने की कोशिश करते थे । वे हिंदी के अधिकारी थे और ईमानदारी से किए गए काम के लिए सभी उनकी सराहना करते थे। अपनी सही बात कहने और मनवाने के लिए वे कोई न कोई रास्ता अवश्य ढूंढ लेते थे। उन्होंने अनेक काबिल अधिकारियों के अधीन काम किया था और सभी ने उनके निरोगी और व्यवस्थित काम से प्रभावित होकर उनकी तारीफों के पुल बांधे थे। उन्हें हैड आफिस में तैनात कर मौसमी विलायती  रोगों से छुटकारा पाने का विचार किया ही जा रहा था कि 'सिफारिशी शिफर साहब' उनके बॉस बनकर आ गए। बॉस भी ऐसे वैसे नहीं बल्कि कार्यालय प्रधान, महाप्रबंधक।

केवल बारह साल में एक मामूली क्लर्क / बाबू  से महाप्रबंधक बने 'एस. एस. साहब' निरोगीलाल के चेहरे के नूर को नज़रअंदाज नहीं कर पा रहे थे। उनके लिए एक हिंदी अधिकारी का इतना अधिक निरोगी होना दफ्तर के लिए कम अपने सूकड़ा तन के लिए अधिक चुनौती पूर्ण लग रहा था। निरोगी लाल के बारे में बीमार लोगों ने शिफर साहब को बताया - "अरे साहब जहां मन करता है ये हिंदी की टांग अड़ाकर हमारा चलना-फिरना यहाँ तक कि हिलना-डुलना तक बंद कर देते हैं।'  दफ्तर के और भी तो सैंकड़ों काम होते हैं मगर हिंदी के सिवाय है मजाल ये कुछ और करें। सेहत इनकी आप देख ही रहे हैं। नाम से ही  निरोगी हैं। इन्हें बहुत कहा कि कम से कम नाम का खौफ तो कम कर दें मगर 'एन आर लाल' बनने तक में इन्हें बड़ी आपत्ति है। अब तक तो सब साहब लोग भी इनकी 'हाँ' में 'हाँ' मिलाते रहे हैं, अब आप आए हैं तो कुछ उम्मीद बंधी है। मगर आप भी ज़रा सावधान रहें।" 
'एस. आर. शिफर साहब' जिन्होंने अपना नाम बदल कर ‘साहब’ अपने नाम में वैधानिक रूप से जुड़वाया था, निरोगीलाल को सबक सिखाने में जुट गए। उन्होंने बड़े-बड़े हिंदी वाले सूरमाओं की सिट्टी-पिट्टी गुम की थी। एक दिन निरोगीलाल शिफर साहब के पास हिंदी पखवाड़े के आयोजन के सिलसिले में पहुँच गए और अपने निरोगी कार्य तथा दफ्तर में हिंदी के साफ़ सुथरे माहौल का बयान करने के बाद उन्होंने साहब को हिंदी दिवस कार्यक्रम के लिए अपनी योजना बताई.

शिफर साहब ने उनकी ओर अपनी मिचमिचाती आँखों से देखा और पूछा – “कौन हैं आप और क्या करते हैं?”
निरोगीलाल ने बताया- “ साहब मैं हिंदी अधिकारी हूँ। हिंदी और हिंदीतर भाषी सभी से हिंदी का, हिंदी में, हिंदी के लिए काम कराने की जिम्मेदारी मेरी है। सारे दफ्तर में हिंदी का माहौल बना हुआ है और आपके आशीर्वचन से आगे भी बना रहेगा।"

शिफर साहब की मिचमिचाती आँखें टिमटिमा उठीं. उन्होंने कहा – “आप और क्या करते हैं?”

निरोगीलाल थोड़े सकपकाए मगर फिर संभल कर बोले –“ साहब सभी शाखाओं में लगातार दौरा करता हूँ और सरकार की राजभाषा नीति के लागू कराने के लिए जो भी संभव हो सकता है वह सब करता ... कराता हूँ। हमारी किसी भी शाखा में किसी भी तरह की कोई चूक राजभाषा के मामले में नहीं मिलेगी। सरकार की तरफ से जो भी निरीक्षण के लिए आते हैं वे हमारे बैंक के अच्छे  हिंदी कामकाज का उदाहरण अन्य बैंकों में भी देते है, हमें बहुत सारे राजभाषा पुरस्कार भी ….”

शिफर साहब ने उन्हें बीच में टोका और कहा- “मिस्टर निरोगी आप बोलते बहुत हैं, आपसे मैंने पूछा कि आप और क्या करते हैं? आपके हिंदी काम की कहानियाँ सुनने के लिए हम यहाँ नहीं आए हैं, ये बैंक है और हमें बैंक का काम करना है, आज से आपके सारे  दौरे-सौरे  बंद... बैंक के लिए कुछ कमाई करने की बजाय आप सिर्फ अनावश्यक खर्चा करते हैं। मुझे ये सब पसंद नहीं है। समझे आप!”

“मगर साहब, हिंदी दिवस तो मनाना जरूरी है, हैड आफ़िस से भी इस बारे में पत्र आया है और ...” निरोगी को शिफार साहब ने वाक्य पूरा नहीं करने दिया। निरोगी का हिंदी बोलना ही उनके कलेजे को चीर रहा था। एक छोटा अधिकारी महाप्रबंधक से ज़बान लड़ाता है। हैड आफ़िस की धमकी देता है।

वे अपनी कुर्सी से खड़े हो गए और बोले- “आप जी. एम. से जबान लड़ाते हैं, हम आपको सबक सिखाकर रहेंगे, हिंदी दिवस कैसे मनाना है ये हम आपसे सीखेंगे, आप समझते क्या हैं अपने आपको? हिंदी दिवस मनाने से हैड आफ़िस का क्या भला होगा? आज से आप कुछ काम कीजिए, ...और कुछ नहीं तो बिल सेक्शन में कुछ मदद कीजिए। अभी आप यहाँ से चले जाइए।"

निरोगी जी एक पत्र दिखाना चाहते थे जो संसदीय समिति के निरीक्षण से संबंधित था। वे पत्र आगे बढ़ाने ही जा रहे थे कि शिफर साहब की सहन शक्ति जवाब दे गई। उन्होंने गुर्रा कर कहा – "आप की इतनी मजाल कि मेरे आर्डर के बाद भी बोले जा रहे हैं, यह कौन सी नीति है, यह कैसी विडंबना है। ... आप ..“

शिफर साहब ने स्टेनो को बुलाया और निरोगी जी को लिखित आदेश दिया कि वे हिंदी की बजाय दफ्तर का काम करेंगे। उन्हें सख़्त हिदायत दी गई कि जब तक बुलाया न जाए वे जी. एम. से नहीं मिलेंगे। अगर उन्होंने इन आदेशों का पालन नहीं किया तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

निरोगीलाल शिफर साहब के हीरोपन से सारा हिसाब किताब भूल गए। उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी और अगले दिन से बिल सेक्शन में जाकर बैठने लगे।

दो माह बाद संसदीय समिति के निरीक्षण की तिथि आ गई। शिफर साहब ने बड़े ही करीने से अँग्रेजी में  सुंदर सुनहरी छपाई में सारे कागजात तैयार कराए और समिति के सामने पहुँच गए। उनके चमकीले रंगीन कपड़ों से समिति के माननीय सदस्य गण सारा माज़रा समझ गए।

उनसे पूछा गया- “मिस्टर शिफर, आपके यहाँ हिंदी अधिकारी नहीं हैं क्या?”

शिफर साहब ने जवाब दिया- “सर वे बैंक का कोई काम नहीं करते थे, मैंने उन्हें बिल सेक्शन में काम पर लगा दिया है।“

“लेकिन शिफर जी, आप और आपके अन्य लोग क्या करते हैं?” – एक सदस्य ने पूछा।

“सर, हम लोग बैंक का काम करते हैं"- शिफर साहब ने कहा।

आपने हिंदी में बैंक का कोई काम किया है?” – एक अन्य सदस्य ने पूछा।

“जी हिंदी में बैंक का काम... हमें तो पैसा कमाना है, इसमें हिंदी..."

“शिफर जी, आपको वेतन कौन देता है? आपको किस काम के लिए वेतन दिया जाता है? आपसे किसने कहा कि बैंक का काम अँग्रेजी में करना है?”

शिफर साहब के आगे कुछ और बखेड़ा खड़ा करने की संभावनाओं को देखते हुए बैंक के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ने कहा-“मैं माननीय समिति के सभी माननीय सदस्यों से क्षमा चाहता हूँ और ये सारी रिपोर्टें वापस लेता हूँ। मिस्टर शिफर को अगरतला स्थानांतरित करने के आदेश जारी किए जा चुके हैं। हमारे हिंदी अधिकारी निरोगी जी एक सप्ताह के अंदर सभी रिपोर्टें और जो भी अन्य कारवाई की जानी हैं पूरी करेंगे और माननीय समिति को सही रिपोर्टें मैं स्वयं निरोगी जी को लेकर समिति कार्यालय में प्रस्तुत करूंगा। मैं माननीय समिति से विनती करता हूँ कि हमारे बैंक के हिंदी के उत्कृष्ट कामकाज के पुराने रिकार्ड को ध्यान में रखते हुए हमें एक मौंका और देने की कृपा की जाए"।

शिफर साहब नहीं समझ पाए कि यह सारा माज़रा क्या है? एक खाली हिंदी अधिकारी को बिल सेक्शन में काम पर लगाकर उन्होंने क्या गलती की?

बाहर आकर वे सीएमडी की और बढ़े ही थे कि सी एम डी ने लताड़ कर पूछा- “आप क्या करते हैं? बताइए  आप अपने नाम को साकार करने के अलावा कुछ और करते हैं क्या? आपको यहाँ इस लिए भेजा गया था कि  यहाँ के हिंदी अधिकारी के निरोगी नाम से आपकी कुछ समस्याओं का समाधान होगा। जिस निरोगी के काम के कारण बैंक को हिंदी के लिए नाम-सम्मान मिला, आप उन का भी सही से  उपयोग  नहीं कर पाए। बताइए आप और क्या करेंगे। जाइए, जाकर तुरंत  अगरतला जाने की तैयारी कीजिए। वहाँ जाकर भी अगर शिफर ही रहे और किसी और  के साथ नहीं जुड़े तो और कोई मौका आपको नहीं मिलेगा।“

6 comments:

  1. मैं निरोगीलाल नाम के हिन्दी अधिकारी से मिला हूँ. फिर एकबार उससे मिलाने का धन्यवाद.

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  2. कहानी प्रसंशनीय है , लेकिन
    क्‍या हर निरोगीलाल की कहानी का अंत इतना ही सुखद होता है ?????
    यह एक सेाचने वाली बात है

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  3. इस कहानी की पीड़ा को एक हिन्दी अधिकारी ही महसूस कर सकता है। विडम्बना देखिए कि जिस अधिकारी को हिन्दी के कार्य के लिए रखा जाता है उसे मात्र दो अवसरों पर ही हिन्दी काम करने दिया जाता है। इसके अतिरिक्त वह अन्य कार्यों में ही व्यस्त रहता है। मैं नियमित रूप से इस पीड़ा से गुजर रहा हूँ। यदि किसी व्यक्ति के पास इसका उपचार है तो वह मुझे अवश्य बताएं। धन्यवाद....

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  4. इस कहानी की पीड़ा को एक हिन्दी अधिकारी ही महसूस कर सकता है। विडम्बना देखिए कि जिस अधिकारी को हिन्दी के कार्य के लिए रखा जाता है उसे मात्र दो अवसरों (पखवाड़ा और निरीक्षण) पर ही हिन्दी काम करने दिया जाता है। इसके अतिरिक्त वह अन्य कार्यों में ही व्यस्त रहता है। मैं नियमित रूप से इस पीड़ा से गुजर रहा हूँ। यदि किसी व्यक्ति के पास इसका उपचार है तो वह मुझे अवश्य बताएं। धन्यवाद....

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  5. ऐसे कई नि‍रोगीलाल है जि‍न्‍हें उपरोक्‍त परि‍स्‍थि‍ति‍यों का सामना करना पडा होगा मगर घबराने की जरूरत नहीं। शि‍फर भी होगे ऐसे कई सारे उनका भी हश्र वहीं होगा जो शि‍फर का हुआ है।

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