May 18, 2020

वो नौ-दो ग्यारह के नौ दिन-3

हम लोग तो अच्छे से खड़ी करके आए थे, मगर   ....
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उस दिन ताजमहल देखने के बाद थकान से पूरा शरीर मालगाड़ी के कोयले के खुले डिब्बे जैसा हो गया था, जिसमें से जो जब और जितना चाहे कोयला चुरा सकता है। रात गुजारने का कोई साधन नहीं था। हमारे लिए होटल का मतलब ढाबे तक सीमित थाजिसे संस्कारी लोग तब भी रेस्तराँ या रेस्टोरेन्ट कहते थे। 

हम ये पूरी ईमानदारी से खुलेआम स्वीकारते हैं कि हम बिलकुल भी ये नहीं जानते थे कि ढाबे को होटल कहना ठीक उसी तरह होता है जैसे कि भद्र जन एक दूसरे की बखिया उधेड़ने से पहले अत्यंत सम्मानपूर्वक कहते हैं- "देखिए, मैं केवल संसदीय भाषा का ही प्रयोग कर सकता हूँ इसलिए बाइज्जत मैं (आपकी बेइज्जती करते हुए) ये कहना चाहूँगा कि आपने कुकर्म किया है, ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ परंतु यह संभावना तो आप भी मानेंगे कि ऐसा करने वाला कोई भी हो सकता है...आप भी हो सकते हैं और... मेरे कहने का अभिप्राय: यह बिलकुल नहीं है कि वे आप थे याकि नहीं थे... कोई भी हो सकता है और कोई में आप शामिल नहीं हैं ऐसा नहीं माना जा सकता हैलेकिन मैं... आप ही थे यह कह कर आपको शर्मिंदा नहीं करना चाहता हूँ। मैं तो यही कहूँगा कि जिसने भी किया वह होटल में था या ढाबे में था..." 

कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि हमें होटल शब्द का जितना अर्थादि पता था, वह परवासी मजदूरों की तरह मात्र कसबाई था । यह शब्द हमारे तहसीली शहर में जिन खुले ढाबों के बाहर लिखा होता था, वहाँ बाहर से ही पीतल के बड़े-बड़े भगोने दिखाई देते थे। उस जमाने में मांसाहारी लिखने से अधिकांश होटल मालिक परहेज करते थे, क्योंकि उन्हें शायद मालूम होता था कि जिसे वे होटल लिखवा रहे हैं, वह होटल नहीं, बल्कि छोटे शहर में बना हुआ नमीयुक्त अति कोमल प्राकृतिक कालीन के कभी-कभार गोबर लिपे कच्चे फर्श से सुशोभित ढाबा मात्र है, जहां रेलवाई से थोड़ी सी अधिक गरम चाय, भरपूर सडे हुए महीनों से उबल रहे अज्ञात ब्रांड के किसी तैलीय पदार्थ में दिल खोलकर तले गए समोसे, कुछ दाल-वाल और रोटी-तरकारी वगैरा की सीमित उपलब्धता के साथ-साथ धुंधलके के बाद बोरी के टाट के परदे के पीछे पूर्णत: स्वदेशी माल थैली में अनुकंपा के आधार पर आपकी दयनीय दशा की पुष्टि होने के बाद प्राप्य है, बस...बहुत ज्यादा अप्राप्यों की अपेक्षा कृपया खुलेआम न करें।

May 15, 2020

वो नौ-दो ग्यारह के नौ दिन -2


जी हाँदेवेन्द्र की खटारा साइकिल पर ही भागे थे।

वास्तव में उस खटारा के जलवे हुआ करते थे और उन जलवों का मजा लेना सिर्फ हम दोनों ही जानते थे। खटारा होते हुए भी वह कभी रुकी नहीं थी। कभी-कभार कुछ चें पें करती तो हम लोग ठेठ भारतीय अंदाज में लात घूंसों के जरिए उसके कान अच्छे से मरोड़ देते थे। उसके बाद खटारा की हिम्मत जवाब दे जाती और फिर वह चुपचाप हमारे वश में हो जाती थी।  उसे अच्छी तरह मालूम था कि ज्यादा चें-पें करने पर उठाकर पटके जाने की संभावनाओं को साकार होने से नहीं रोका जा सकता । शुरू-शुरू में उसने दो-चार बार नखरे दिखाए भी थेलेकिन बहुत जल्द उसे समझ आ गया था कि हम लोग उसके नखरे झेलने वालों में से नहीं हैं,  नखरों का जवाब उठा-पटक से ही दिया जाता जाएगा

उठा पटक के बाद मरगाड़ (मडगार्ड) तो मुड़ता ही थाअतिरिक्त घाव के रूप में रिम से एक दो तिल्लियों के बाहर आ जानेब्रेक टूट जाने या पैडल के तिरछा हो जाने जैसी दयनीय स्थिति का सामना वह बेचारी खटारा कई बार कर चुकी थी। बड़ी भली बन गई थी वहपूरी संस्कारी । अब वह हर पैडल पर चेन कवर पर घिस्सा खाकर बस कराह भर लेती थी। दो पंद्रह-सोलह बरस के लौंडों के सामने उसकी एक न चलतीइसलिए वह धड़ल्ले से दौड़ती थी।

साइकिल पर भागना तो दूर, उस समय  पैदल भागना भी फिल्म हैप्पी भाग जाएगी की हैप्पी के पाकिस्तान तक भाग जाने की तरह नहीं होता था। हमारे बड़े-बूढ़े बड़ी चिंता करते और खुफिया पुलिस से भी ज्यादा चौकन्नी नजर रखते थे। खटारा के गुणा-भाग से दो-तीन साल पहले एक बार देवेन्द्र के पिताजी के ट्रक पर बैठकर एक रात, जो बेचारी अधेरे–उजाले के दलदल के बीच अभी सही से अपने होने का खुद भी अहसास नहीं कर पाई थी, हम अपनी ननिहालजो हमारे गाँव से बस इतनी ही दूर थी, जितना सिकंदराबाद से गाजियाबाद के बीच का अंतराल । यह बात अलग थी कि इस अंतराल को पाताल लोक की यात्रा से भी दीर्घ होने की सहज सामूहिक और पूरी तरह सामाजिक स्वीकृति मिल चुकी थी।

May 13, 2020

वो नौ-दो ग्यारह के नौ दिन -1


जी हाँ, खटारा साइकिल पर ही भागे थे... एक सेकेंडहैंड साइकिल पर दो यार।

शोले तो बाद में देखी थी और ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे गाना भी बाद में ही देखा-सुना गया था। गाँव से करीब पाँच मील दूर था  छोटा सा शहर सिकंदराबाद...दो सिनेमाघर वाला "भराही" के मेले वाला अपना शहर।

हमारे इस शहर, जो उस जमाने में हमारी तहसील भी हुआ करता था,सिकंदराबाद तक जाने के लिए परिवहन के साधन के रूप में बहुत छुटपन में तो हमारे हरपाल बाबा (ताऊ जी) के कंधे की सवारी के सिवाय कुछ और होता नहीं था। अति छुटपन से छुटकारे के बाद जो सहज साधन उपलब्ध था उसे बैलगाड़ी कहा जाता था। वह एक मौसमी या फ़सली सवारी हुआ करती थी यानी जब कोई अपना गुड, गेहूँ, मक्का वगैरह बेचने जाने वाला होता तो गाड़ीवान अर्थात गाड़ी के मालिक से अनुनय-विनय के बाद बैलगाड़ी की सवारी करने का सौभाग्य मिल जाता था। 

बड़े तगड़े नियम कायदे हुआ करते थे इस सवारी के। सुबह मुंह अधेरे उठकर तैयार होना पड़ता था। नाश्ते-पानी यानी पूरे दिन की रोटी शोटी का बंदोबस्त करके ही निकलना हो सकता था। शहर मेन होटल या ढाबे में खाने की अपनी औकात होती नहीं थी, बस एक चवन्नी के पाँच पानी के पटाखे (गोलगप्पे/पानीपूरी)खाने का जुगाड़ जरूर रो-धोकर या गाड़ीवाले का अनाज ढोकर कर लिया जाता था। वापसी का कोई समय निश्चित नहीं होता था। अगर फसल की बिक्री आढ़ती ने जल्दी करा दी तो शाम ढलने तक, वरना तो रात। कुल मिलाकर बैलगाड़ी की सवारी भरोसे की सवारी नहीं कही जा सकती थी।

May 11, 2020

पचपन के पार :: यादें बचपन की ...


यूँ आता जाता तो अब भी कुछ नहीं है, पर तब तो कुछ भी नहीं जानता था। सन् 1963-64 की बात है। उम्र यही कोई दो या अढ़ाई साल रही होगी। महाराष्ट्र का एक नगर अहमदनगर... जहाँ तक याद पड़ता है वहाँ पानी की समस्या रहा करती थी। छावनी में टेंकर से पानी आता था और चाय की एल्यूमिनियम की अधिकतम आधा लीटर की एक केतली में हमें भी पानी भरवाने में अहम भूमिका निभाकर अपार संतुष्टि का अनुभव शायद हुआ करता होगा।

पिताजी फौज में थे और अपने जन्म के बाद पहली और आखरी बार हम और हमारी माताजी, जो तब तक हमारी बहन की भी माताजी बन चुकी थीं, पिताजी के साथ अहमदनगर में थे। उसके बाद 1965 के युद्ध में पिताजी हम सब को गाँव छोड़कर अपने टैंकों के साथ मोर्चे पर चले गए थे। फिर कभी अहमदनगर जाना कभी नसीब नहीं हुआ। बस एक बार रेलवे स्टेशन पर पैर रखने का अवसर जरूर मिला। अहमदनगर की कई यादें हैं ...संयुक्त शौचालय में ततैये के छत्ते से छेड़खानी के बाद ततैये के डंक का भरपूर मजा ...

May 5, 2020

'हंसमुख ' :: कहानी कुछ नहीं, मगर कलाकारों में दम है।



आज दिल्ली हाई कोर्ट ने नेटफ्लिक्स की लघु वेब सीरीज हंसमुख के प्रसारण पर  रोक लगाने संबंधी याचिका को खारिज कर दिया। लॉक डाउन के दौर में अगर कोरोना की खबरों से उकताहट हो चुकी है तो देखने का साहस किया जा सकता है। 

हंसमुख की कहानी एक अजीबोगरीब किरदार को लेकर है जिसे हास्य कलाकार के रूप में विकसित होते दिखाने की कोशिश में बेतुकेपन का शिकार बना दिया गया है। एक ऐसा हास्य कलाकार (?) जिसे मंच से चुटकुलेबाज़ी की हिम्मत किसी की हत्या के बाद ही हो पाती है। पता नहीं पटकथा और संवाद लेखक क्या कहना चाहता है। मंच से तथाकथित हास्य पर ऐसे हास्यास्पद चुट्कुले, जिनपर हँसना तो दूर रोना भी बमुश्किल ही आ पाता है, सुनाए जाते हैं और पता नहीं कैसे दर्शक हँसते हँसते लोटपोट हो जाते हैं??

मुझे इस सीरीज में जो एक ही खास बात नजर आई वह बस इतनी सी है की यदि कोई यह सीखना चाहता है कि बेहतरीन कलाकारों की प्रतिभा को कैसे जाया किया जाता है तो इस वेब सीरीज में भरपूर मसाला मौजूद है। चाहे हंसमुख की भूमिका में वीर दास हो या जिमी के रूप में रणवीर शोरी या फिर के.के. की भूमिका में सुहेल नैयर सबका अभिनय लाजवाब है।

जिस कलाकार में सबसे अधिक संभावनाएं नज़र आती हैं वो अमृता बागची हैं, उन्होंने प्रोमिला की एक बहुरंगी भूमिका निभाई है। यह अकेली भूमिका नायिका से लेकर खलनायिका तक के सभी मनोभावों से भरी है और इसे प्रोमिला ने बेहद खूबसूरत ढंग से निभाया है। 

हंसमुख के अलावा अमृता बागची "मेरी प्यारी बिन्दु", "फोबिया" , " सिटी ऑफ ड्रीम्स" में काम कर चुकी है। 

- अजय मलिक 

Apr 30, 2020

तुम एक महान कलाकार और उससे भी महान इंसान थे इरफान...


                        07-01-1967 .....  29-04-2020
                             
मुंबई छूटने का इतना दुःख जून 1997 में भी नहीं हुआ था, जितना कल अचानक इरफान खान के आकस्मिक निधन की खबर से हुआ। 

वो मेरा मुहब्बत का ऐसा दौर था, जब लपलपाती दहकती शमा पर परवाना ये सोचकर क़ुर्बान होने से रुक गया कि कहीं शमा बुझकर धुँआ-धुँआ न हो जाए !! फिर भी जब अचानक शमा बुझ गई, तो परवाना धुएँ की दहक में ऐसा झुलसा कि कहीं का न रहा। वो शमा फिर कभी उसके लिए न जली ...और बस धुँआ बनकर रह गई।

कल दुःख शब्द बहुत ही खोखला सा लगा। इरफान के निधन का समाचार आसमानी बिजली के गिरने से भी कहीं ज्यादा कष्टकारी था। मैंने तत्काल डॉ चंद्रप्रकाश को लघु संदेश/एसएमएस भेजा... सिराज को फोन मिलाया... वह सुनकर सन्न रह गया। दोनों को ही एकबारगी विश्वास नहीं हुआ। फिर असीम चक्रवर्ती को फोन लगाया...असीम को खबर मिल चुकी थी और वे सदमे के कारण खुद को बात करने की स्थिति में नहीं पा रहे थे...

शाम सुहानी हो जाए...


शाम सुहानी हो जाए...

कुछ ऐसी चले पवन निर्मल
हर राह बिछे पुष्पी चादर
हो दीपक से जग भर रोशन
सूरज शरमा कर छुप जाए ।

मीलों तक चले तेरी चिक-चिक
रुक जाए घड़ियों की टिक-टिक
झगडें फिर से दो-चार बार
फिर हो जाएँ दो-चार वार
बीते पल-पल का हो हिसाब
हर बात पुरानी हो जाए I
कुछ ऐसी चले पवन निर्मल ...

ना तू माने, ना मानूँ मैं
ना तू जाने, ना जानूँ मैं
मैं-मैं तू-तू की काँव-काँव
जब मिलें ख्वाब में किसी ठांव
पतझड़ हो या फूल-ए-बहार
वह शाम सुहानी हो जाए I
कुछ ऐसी चले पवन निर्मल ...
-अजय मलिक
09-07-2012

समय चुपके से भागता चला जाए है


यूँ तो मुझे शायद हक नहीं है कि कुछ सोचूँ मगर कभी-कभी परिस्थितियाँ मजबूर कर देती हैं, सोचने के लिए और तब न चाहते हुए भी मैं सोचने लगता हूँ। बार-बार भरसक प्रयास करता हूँ कि सोचने का यह कष्टसाध्य क्रम ठहर जाए, थोड़ा विराम ले पर जब एक बार यह शुरू होता है तो फिर क्या मजाल कि रुक जाए। मानो सारा ब्रह्मांड सामने आ जाता है, लोक-परलोक, आकाश-पाताल, स्वर्ग-नर्क कुछ भी तो नहीं छूटता। बस छूट जाता है पसीना और अपार ब्रह्म में न जाने कहाँ खो जाती है नींद। फिर नींद को ढूँढते-ढूँढते कई और चक्कर लग जाते हैं जाने कितने ग्रह, नक्षत्र और तारों के...सितारों के पार, चाँद के उस ओर कहीं कुछ नज़र नहीं आता, थक-हार कर न जाने कब कुछ बेहोशी सी छा जाती है।

कुछ लोग अच्छे लगते हैं, न जाने क्यूँ वे अच्छे लगते है? वे कुछ अच्छा न भी करें तब भी अच्छे लगते हैं। कुछ बुरे लोगों को भी यह अहसास दिलाने की कोशिश मन मारकर करनी पड़ती है कि वे भी अच्छे लगते हैं। वे बुरे क्यूँकर लगते हैं, इसका भी कोई सही-सही जवाब नहीं मिलता। चाहे उन्होंने कुछ बुरा लगने जैसा न भी किया हो तब भी वे बुरे लगते हैं। मन सभी को तो मनमाफिक नहीं पाता, नहीं मानता, और जिन्हें नहीं मानता उनसे मन से बात कैसे की जा सकती है भला! बेमन से बात करना भी तो किसी सज़ा से कम नहीं।

जाति की जाति


मैं जाति की जाति हूँ
जाती नहीं हूँ जाति हूँ
मैं सत्य सती हूँ
आदमी की अति हूँ

जो जाति के बाहर हैं
मैं उनकी भी जाति हूँ
सोते में भी जाति हूँ
रोते में भी जाति हूँ
इतनी बढ़ी जाति हूँ
कि पूरी प्रजाति हूँ
आती हूँ तो जाति हूँ
जाती हूँ तो जाति हूँ

खान पान सांस शरण
आन बान जन्म मरण
हार-जीत मार-पीट 
झूठ-गबन प्रेम-प्रीत
पाठ से पहाड़ तक
चीख से दहाड़ तक   
हर कदम साथ साथ
कहाँ नहीं जाती हूँ !

कहीं पर किराए में
कहीं कुर्सी पाए में
कहीं पर तिराहे में  
ब्याह-शादी-साये में
कफन से दफन तक
मेरी ही पुकार है
जीवन का लक्ष्य-मोक्ष  
जाति की दरकार है

घर हो या घेर हो
बकरी या शेर हो 
खेत या खलिहान हो
दफ्तर या दुकान हो
महल या श्मशान हो
मेरी ही सरकार है
अमीरी बेकार है
गरीबी बेकार है
मेरे बिना जग में
हर आदमी बेकार है 

31-01-2013

डिबिया से डरता... वो घुप्प अँधेरा


बहुत पीछे छूटा
डिबिया से डरता
वो घुप्प अँधेरा
जन्नत से बेहतर
छप्पर की छाया
वो शीतल हवा में  
सँवरता सवेरा

अँधेरे में ज़ोरों से
दिल का धकना
वो बूकल में ठिठुरी
उंगलियों का अकड़ना
गीले मौजों के कैदी  
पावों का फटना
वो पाती की पट-पट 
समझता सन्नाटा...  
वो सिर का मुड़ासा
वो सांकल खड़कना...

अब घुप्प अंधेरे को
नज़रें तरसती हैं
उंगली की पोरें
अकड़न को मरती हैं
क्यों आँखों में चुभता 
ये तीखा उजाला

क्यों खामोश है दिल   
कहाँ कमली वाला।
कहाँ कमली वाला...  
 -अजय मलिक (c)
  04-03-2013

उजाला ...अजी भाई साहब जी, सुनो तो जी ....


अंधेरा ... इस घनघोर अंधेरे में खड़ा हुआ मैं, उजाले में चलते-फिरते, गुलाटियाँ लगाते, गिलोरियाँ खेलते, गोटियाँ बिठाते कई तरह के चेहरों को, बड़ी आसानी से देख पाता हूँ। मुझे अंधेरे में गुम हो गया मान लिया गया है। मैं शायद ब्रह्मांड का हिस्सा बन गया हूँ... ब्लैक होल में समाकर सब ऊर्जाएँ सबसे बड़ी ऊर्जा का हिस्सा बन जाती हैं। अंधेरा जो सबसे बड़ी ऊर्जा है। अंधेरे से सब उजाले में जाना चाहते हैं ... उजाले से कोई भी अंधेरे में नहीं आना चाहता, मगर आना तो पड़ता है। ऐसा कोई नहीं जो अंधेरे में समाने से बच सके। घर का अंधेरा सब मिटाना चाहते हैं; बाकी किसी जगह बिखरे अंधेरे को कोई देखना तक नहीं चाहता। इस अंधेरे में छुपे रहस्यों को क्यों कोई जानना-समझना-छूना-पहचानना नहीं चाहता।