Oct 13, 2020

राजभाषा विभाग ने शुरू किया भाषा पत्राचार पाठ्यक्रमों का ऑनलाइन पंजीकरण

 राजभाषा विभाग,  गृह मंत्रालय के अधीनस्थ कार्यालय केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान ने पत्राचार के माध्यम से हिंदी भाषा पाठ्यक्रमों अर्थात प्रबोध, प्रवीण, प्राज्ञ के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की शुरुआत की है। भारत या भारत से बाहर अर्थात संसार भर में किसी भी देश, नगर या कस्बे में स्थित भारत सरकार के किसी भी कार्यालय का कोई भी कर्मचारी, जिसके लिए हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है, उपर्युक्त पाठ्यक्रमों के लिए अपना पंजीकरण ऑनलाइन कराकर पत्राचार के माध्यम से अध्ययन प्रारम्भ कर सकता है । राजभाषा विभाग का यह प्रयास मोबाइल एप्प 'लीला राजभाषा' तथा 'लीला प्रवाह' की सहायता से, जो एंड्रायड और आई-फोन दोनों में निशुल्क हिंदी सीखने की सुविधा उपलब्ध कराते हैं, हिंदी सीखना शुरू कर पत्राचार पाठ्यक्रमों के लिए पंजीकरण कराकर आसानी से समय और संसाधन बचाते हुए हिंदी प्रशिक्षण पूरा कराने की दिशा में यह अत्यंत उपयोगी साबित होगा। राजभाषा विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध भाषा पत्राचार पाठ्यक्रमों के लिंक नीचे दिए जा रहे हैं-


New Online Registration for LANGUAGE Correspondence Courses


ऑनलाइन भाषा पत्राचार पाठ्यक्रम पंजीकरण 


प्रबोध, प्रवीण, प्राज्ञ पत्राचार पाठ्यक्रम ऑनलाइन पंजीकरण  

Sep 24, 2020

मंत्रिमंडल सचिव का हिंदी दिवस पर संदेश


 

हिंदी दिवस पर केंद्रीय गृह मंत्री जी का संदेश

 





राजभाषा के कार्यान्वयन संबंधी जानकारी :: निशुल्क हिंदी कार्यशाला


निशुल्क कार्यशाला 


कृपया उपर्युक्त लिंक क्लिक करें। 

Sep 18, 2020

बरसों पहले

बरसों पहले 

जाने कब ये 

चुपके से आया?

जाने कैसे ये 

बंद पलकों से घुसा 

और पुतलियों में 

छुपकर बस गया !

दिखता है, मगर 

पकड़ नहीं आता । 

आँसू बह बह कर

हलकान हो चुके हैं,

पलकों के सब पेंच 

बेजान हो चुके हैं ।

आँखें, न खुलती हैं 

न बंद हो पाती हैं!

कैसे आँखों से

निकालूँ इसको ?

जीने की तमन्ना 

और जद्दोजहद 

अभी बाकी है । 

-अजय मलिक 




Jul 4, 2020

कुछ पुराने खतों की खताएँ...

आज अलमारी खोली तो अनायास ही कुछ पुराने ख़त निकल भागे । ऐसे ख़त जो बरसों पहले बड़े इंतजार के बाद अपने पते तक पहुंचे थे। ऐसे ख़त जिनसे बर्फीले तूफान सा दर्द, किसी बादल फटने से आई अचानक बाढ़ की तरह बह निकलता था। ऐसे ख़त जिन्हें पढ़ने का साहस या जरूरत दशकों पहले ही बाकी नहीं बची थी। शायद इसीलिए इन खतों को उम्रक़ैद की सजा सुनाई गई थी और सूती धागों की जंजीरों में अच्छी तरह बांधकर अलमारी में बंद कर दिया गया था। 

इतने बरसों तक दो उम्रक़ैद से भी अधिक की सजा पूरी कर चुके ये ख़त आजाद होना चाहते थे या अवसर पाकर भाग जाना चाहते थे, लेकिन कुछ खताओं की सजाएँ कभी पूरी नहीं हो सकतीं...कोई उम्रक़ैद उनके लिए काफी नहीं हो सकती। 

उस अज्ञात को, जिसे हम परमात्मा वगैरा के नाम से पुकारते हैं, कुछ अपने हिसाब से करना होता है। हम जो खुद को कभी गफलत या गलतफहमी में खुदा समझ बैठते हैं, कुछ अच्छा और सच्चा करने की जिद में सब कुछ गड़बड़ा देते हैं...और फिर जो होता है, वह बिलकुल भी वह नहीं होता, जो हम करना चाहते हैं...बस होती हैं तो सिर्फ खताएँ और लगातार होती ही चली जाती हैं। ऐसी खताएँ, जिनके लिए कोई भी सज़ा नाकाफी होती है। 

किसी मासूमियत में ऐसी ही कुछ खताएँ, कभी उन खतों से भी हो गईं थीं। उनके लिए सज़ा-ए-मौत पर्याप्त नहीं मानी गई थी और अंतिम साँस तक की उम्रक़ैद की सज़ा का फरमान चुपचाप जारी कर दिया गया था। 

शायद वो खत भागने या रिहा होने के लिए नहीं, बल्कि माफी मांगने के लिए निकल पड़े थे... मगर वह माफ़ी मेरे अख्तियार में न कभी थी, न है। मैंने उनके आँसुओं को देखा मगर दिल दहला देने वाली उनकी पुकार को अनसुना कर फिर से उन्हें सूत के उन्हीं कच्चे धागों की जंजीरों में बांधकर कैदखाने के अँधेरों में डाल दिया.... 

-अजय मलिक     

तालाबंदी में हिंदी भाषा प्रशिक्षण...अनलॉक -प्रतिभा मलिक

सिर्फ एक मिनट...जरा देखिए तो सही 


May 18, 2020

वो नौ-दो ग्यारह के नौ दिन-3

हम लोग तो अच्छे से खड़ी करके आए थे, मगर   ....
.xxxxxx ....xxxxx
उस दिन ताजमहल देखने के बाद थकान से पूरा शरीर मालगाड़ी के कोयले के खुले डिब्बे जैसा हो गया था, जिसमें से जो जब और जितना चाहे कोयला चुरा सकता है। रात गुजारने का कोई साधन नहीं था। हमारे लिए होटल का मतलब ढाबे तक सीमित थाजिसे संस्कारी लोग तब भी रेस्तराँ या रेस्टोरेन्ट कहते थे। 

हम ये पूरी ईमानदारी से खुलेआम स्वीकारते हैं कि हम बिलकुल भी ये नहीं जानते थे कि ढाबे को होटल कहना ठीक उसी तरह होता है जैसे कि भद्र जन एक दूसरे की बखिया उधेड़ने से पहले अत्यंत सम्मानपूर्वक कहते हैं- "देखिए, मैं केवल संसदीय भाषा का ही प्रयोग कर सकता हूँ इसलिए बाइज्जत मैं (आपकी बेइज्जती करते हुए) ये कहना चाहूँगा कि आपने कुकर्म किया है, ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ परंतु यह संभावना तो आप भी मानेंगे कि ऐसा करने वाला कोई भी हो सकता है...आप भी हो सकते हैं और... मेरे कहने का अभिप्राय: यह बिलकुल नहीं है कि वे आप थे याकि नहीं थे... कोई भी हो सकता है और कोई में आप शामिल नहीं हैं ऐसा नहीं माना जा सकता हैलेकिन मैं... आप ही थे यह कह कर आपको शर्मिंदा नहीं करना चाहता हूँ। मैं तो यही कहूँगा कि जिसने भी किया वह होटल में था या ढाबे में था..." 

कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि हमें होटल शब्द का जितना अर्थादि पता था, वह परवासी मजदूरों की तरह मात्र कसबाई था । यह शब्द हमारे तहसीली शहर में जिन खुले ढाबों के बाहर लिखा होता था, वहाँ बाहर से ही पीतल के बड़े-बड़े भगोने दिखाई देते थे। उस जमाने में मांसाहारी लिखने से अधिकांश होटल मालिक परहेज करते थे, क्योंकि उन्हें शायद मालूम होता था कि जिसे वे होटल लिखवा रहे हैं, वह होटल नहीं, बल्कि छोटे शहर में बना हुआ नमीयुक्त अति कोमल प्राकृतिक कालीन के कभी-कभार गोबर लिपे कच्चे फर्श से सुशोभित ढाबा मात्र है, जहां रेलवाई से थोड़ी सी अधिक गरम चाय, भरपूर सडे हुए महीनों से उबल रहे अज्ञात ब्रांड के किसी तैलीय पदार्थ में दिल खोलकर तले गए समोसे, कुछ दाल-वाल और रोटी-तरकारी वगैरा की सीमित उपलब्धता के साथ-साथ धुंधलके के बाद बोरी के टाट के परदे के पीछे पूर्णत: स्वदेशी माल थैली में अनुकंपा के आधार पर आपकी दयनीय दशा की पुष्टि होने के बाद प्राप्य है, बस...बहुत ज्यादा अप्राप्यों की अपेक्षा कृपया खुलेआम न करें।