हम तमिलनाडु के छद्म हिंदी विरोध पर बहुत टीका टिप्पणी करते हैं। यह हिंदी विरोध पूर्णतः राजनैतिक फंडा है, क्योंकि तमिलनाडु की राज्य सरकार, तमिलनाडु की राज्य सरकार के कार्यालयों और तमिलनाडु के व्यक्तियों पर 26 जनवरी, 1950 से ही केंद्रीय सरकार की ओर से “अंग्रेज़ी/English” वैधानिक रूप से थोपी गई है। केंद्रीय सरकार के तमिलनाडु स्थित कार्यालयों, केन्द्रीय सरकार की सम्पत्ति पर जहाँ भी हिंदी मे कुछ लिखा या मुद्रित किया गया है, उससे पहले/ उसके ऊपर तमिल लिखी/मुद्रित की गई है और सबसे नीचे अंग्रेज़ी भी थोपी गई है , अतः यह हिंदी थोपने का मुद्दा किसी भी तरह बनता ही नहीं है, लेकिन राजनीति की वोट बटोरू विवशताएं अलग हैं । विशुद्ध राजनैतिक नारे किसी नशीले पदार्थों से कम नहीं हैं और इन पर किसी तर्क की कोई गुंजाइश कहीं नहीं है।
इस छद्म हिंदी विरोध की राजनीति की हीरक जयंती के अवसर यदि हिंदी भाषी राज्य चाहें, तो एक झटके में इसकी हवा निकाल कर इसे सदैव के लिए समाप्त किया जा सकता है।
वास्तविकता यह है कि यदि हिंदी भाषी राज्यों के हिंदी भाषी नागरिकों ने ही ईमानदारी से हिंदी को आत्मसात् किया होता, तो अब तक हिंदी विश्व भाषा बन चुकी होती।
यदि केंद्रीय सरकार के कार्यालयों/ विभागों/ मंत्रालयों ने हिंदी भाषी राज्यों के साथ केवल राजभाषा नियम 3(1) का ईमानदारी से अनुपालन किया होता तो हिंदी विश्व भाषा बन चुकी होती।
यदि केवल हिंदी भाषी राज्य ही अंग्रेज़ी के मोह से मुक्त होकर यह निर्णय लें कि वे तमिल को भी कक्षा 6 से 08 तक तीसरी भाषा के रूप में एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाएँगे और कक्षा 9-10 में तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत या अन्य कोई भारतीय भाषा पढ़ाई जाएगी, तो तमिलनाडु की राजनीति का छद्म हिंदी विरोध का वोट बटोरी फ़ॉर्मूला सदा के लिए टाँय टाँय फुस्स हो जाएगा और हिंदी स्वत: विश्व भाषा बन जाएगी। इस तीसरी भाषा के पर्चे में सिर्फ़ उत्तीर्ण होना पर्याप्त माना जाए और इसके अंकों को किल प्राप्तांकों के प्रतिशत में न जोड़ा जाए।
अब तक तमिलनाडु के छद्म हिंदी विरोध के कारण हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेज़ी के प्रति आग्रह अकल्पनीय रूप से बढ़ा है और हिंदी के प्रति उपेक्षा की प्रवृत्ति विकसित हुई है। तमिलनाडु के स्थानीय दलों को केवल राजनैतिक लाभ मिला है, इससे तमिल का कुछ भी भला नहीं हुआ है और मेरी व्यक्तिगत रूप से यह मानना है कि इससे तमिलनाडु में अंग्रेज़ी के स्तर में भी गिरावट आई है। अंग्रेज़ी के इस उतार-चढ़ाव का प्रत्यक्ष प्रमाण सिविल सेवा परीक्षा के विगत 50 वर्षों के आँकड़ों के विश्लेषण से पाया जा सकता है।
यदि केवल हिंदी भाषी राज्य कक्षा 6 से कक्षा 10 तक प्रथम भाषा के रूप मे हिंदी, दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेज़ी की पढ़ाई अनिवार्य रूप से करने के साथ-साथ तमिल को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य विषय कर दें और तमिल के लिए केवल न्यूनतम उत्तीर्ण अंक रखें तो तमिलनाडु के राजनैतिक दल देखते रह जाएँगे।
इसके बाद कक्षा 9 एवं 10 में संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं में से एक भाषा को तीसरी भाषा के रूप में केवल उत्तीर्णांक तक अनिवार्य कर दें, तो न सिर्फ़ भारत की भाषायी वोट बैंक की छद्म राजनीति समाप्त होगी, बल्कि दक्षिण भारतीय राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु में हिंदी भाषी राज्यों से पढ़े-लिखे लोगों के लिए रोज़गार के नए अवसर विकसित होंगे। यह बिल्कुल वैसी ही बात होगी, सिलिकॉन वैली मे अंग्रेज़ी के कारण भारतीयों का बोलबाला है।
शायद लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि केंद्रीय विद्यालयों में हिंदी कक्षा 9-10 में अनिवार्य विषय के रूप में नहीं पढ़ाई जाती। मेरी जानकारी के अनुसार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में त्रिभाषा सूत्र के तहत हिंदी केवल कक्षा 6 से 8 तक ही अनिवार्य विषय / भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है।
परदे के पीछे का एक कटु सत्य दो मैंने पूरे तमिलनाडु में भटकने के बाद जाना है, यह है कि लंबे समय से तमिलनाडु मे अधिकांश मछोले स्तर के व्यापारी मारवाड़ी, राजस्थानी या गुजराती हैं, जो धड़ल्ले से तमिल बोलते हैं और हिंदी अच्छी तरह जानते हैं। इसका प्रमाण चेन्नै सेंट्रल रेलवे स्टेशन के पीछे का बहुत बड़ा बाज़ार है, जिसे साहूकार पेठ के नाम से जाना जाता है। वहाँ आप धड़ल्ले से हिंदी बोल कर कुछ भी ख़रीद सकते हैं। इसी इलाक़े में बर्मा बाज़ार/ पेरिस कॉर्नर भी है और वहाँ भी मुझे हिंदी बोलने में कोई कठिनाई कभी नहीं हुई।
रामेश्वरम्, मदुरै, कन्याकुमारी, ऊटी, कोडैकनाल, तिरुच्चिरापल्ली का मेनगार्ड गेट इलाक़ा सब जगह हिंदी दौड़ती है। ऐसे में अगर हिंदी भाषियों को तमिल के वणक्कम, अन्ना, तम्बी, उन्न, रेंडु, मूण, नाल (नमस्ते, बड़ा भाई, छोटा भाई, एक, दो, तीन,चार) जैसे शब्द सिखा दिए जाए, तो क्या हानि है?
मेरे दोनों बच्चे तमिल, हिंदी, अंग्रेज़ी, मलयालम बख़ूबी जानते-समझते हैं। बेटा थोड़ी कन्नड़ सीख गया लगता है, जबकि बेटी जापानी काफ़ी हद तक पढ़-लिख-बोल सकती है। ये सब उन्हें तमिलनाडु स्थित दो केंद्रीय विद्यालयों की देन है।
मैं पिछले अनेक वर्षों से तमिल के वणक्कम (नमस्ते) शब्द का प्रयोग-प्रचार-प्रसार अनिवार्य रूप से करता रहा हूँ। अंत मे हिंदी भाषियों से यही अनुरोध है कि थोड़ा सा देसी होकर तो देखिए भाषायी राजनीति स्वत: पूर्णतः विलुप्त हो जाएगी।
-अजय मलिक
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