Apr 3, 2013

गीले मौजों के कैदी

[1]
बहुत पीछे छूटा
डिबिया से डरता
वो घुप्प अँधेरा
जन्नत से बेहतर
छप्पर की छाया
वो शीतल हवा में  
सँवरता सवेरा
अँधेरे में ज़ोरों से
दिल का धकना
वो बूकल में ठिठुरी
उंगलियों का अकड़ना
गीले मौजों के कैदी  
पावों का फटना
वो पाती की पट-पट  
सुनता सन्नाटा...  
वो सिर का मुड़ासा
वो सांकल खटकना...

[2]
अब घुप्प अंधेरे को
नज़रें तरसती हैं
उंगली की पोरें
अकड़न को मरती हैं
क्यों आँखों में चुभता  
ये तीखा उजाला
क्यों खामोश है दिल   
कहाँ कमली वाला।
कहाँ कमली वाला...   
-अजय मलिक (c)

Mar 26, 2013

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ

होली पर
मेरे पास न रंग है, न ढंग है
न केसर है, न गुलाल है ...
बस फेसबुक से ली हुई यह एक तस्वीर है



होली मुबारक 

Mar 25, 2013

मद्रास उच्च न्यायालय में तमिल में न्याय हो


इससे जुड़ी कुछ खबरें नीचे दिए लिंक्स पर
http://dainik cebook

अज्ञेय जी की कुछ कविताएँ

[ ये कविताएँ ओम थानवी जी ने फेसबुक पर पोस्ट की हैं। वहीं से साभार]

(सफर में अज्ञेय का सारा काव्य फिर पढ़ गया। देखिए, ये कविताएँ भी अज्ञेय की ही हैं। लेकिन जिन्हें ऐसी रचनाओं को नजरअंदाज करना है, वे इनको देखकर भी नहीं देखेंगे! (बरसों-बरस यही तो करते करते आए हैं! - ओम थानवी) 

हरा-भरा है देश
----------

हरे-भरे हैं खेत
मगर खलिहान नहीं:
बहुत महतो का मान --
मगर दो मुट्ठी धान नहीं।
भरा है दिल
पर नीयत नहीं:
हरी है कोख --
तबीयत नहीं।

भरी हैं आंखें
पेट नहीं:
भरे हैं बनिये के कागज --
टेंट नहीं।

Mar 17, 2013

दालचीनी और शहद की दरियादिली

अङ्ग्रेज़ी में यह पोस्ट फेसबुक पर मिली। एंटोनिओ रॉबर्ट्स की इस पोस्ट को डॉ उदय बोधंकर ने आगे बढ़ाया था। मैंने फिर कई हिन्दी वेब पृष्ठों पर भी दालचीनी और शहद के कमाल का विस्तृत विवरण देखा। यदि यह उपयोगी लगे तो किसी संभावित खतरे की ज़िम्मेदारी स्वयं लेते हुए आज़माएँ।
 
Cinnamon and Honey
Drug companies won't like this one getting around. Facts on Honey and Cinnamon:
It is found that a mix of honey and Cinnamon cures most diseases. Honey is produced in most of the countries of the world. Scientists of today also note honey as very effective medicine for all kinds of diseases. Honey can be used without side effects which is also a plus. Today’s science says that even though honey is sweet, when it is taken in the right dosage as a medicine, it does not harm even diabetic patients. Researched by western scientists:

Mar 12, 2013

अङ्ग्रेज़ी को अन्य भारतीय भाषाओं की कीमत पर नहीं रखा जाना चाहिए


चेन्नई से  तिरुच्चिरापल्ली और फिर मदुरै...और उसके आगे भी - इन सभी स्थानों पर अधिकांश व्यापारी  उत्तर भारतीय हैं और उनमें से 99 प्रतिशत तमिल और हिन्दी जानते हैं। उन्हें किसी त्रिभाषा सूत्र ने तमिल सीखने को मजबूर नहीं किया बल्कि यह उनके व्यापार की मांग अर्थात जरूरत है ।
शिक्षा का प्रसार उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में अधिकांशत: समुद्र तटीय क्षेत्रों मे मिशनरी स्कूलों के माध्यम से हुआ। आजादी के समय हमारे देश में साक्षारता का प्रतिशत मात्र 16 या 17 प्रतिशत था। अधिकांश शिक्षित समुद्र तटीय इलाकों विशेषकर तत्कालीन मद्रास प्रांत में साक्षारता दर पूरे देश के औसत की तुलना में कहीं ज्यादा थी। सन् 1901 में जब पूरे देश की साक्षारता दर का औसत लगभग 6 प्रतिशत था तब मद्रास प्रांत में यह लगभग 12 प्रतिशत था। महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, पॉण्डिचेरी और तमिलनाडु के समुद्र तटीय क्षेत्रों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार तुलनात्मक रूप से सर्वाधिक हुआ। अंग्रेज़ जब प्रशासनिक कार्यालय कलकत्ता यानी बंगाल ले गए तो वहाँ भी अङ्ग्रेज़ी तथा साक्षारता दर दोनों में तेजी से वृद्धि हुई। आज भी अगर हम 2011 की जनगणना के आंकड़े देखें तो तथाकथित उत्तर भारतीयों याकि हिन्दी भाषी क्षेत्रों की साक्षारता दर 75 प्रतिशत से कम है।

Mar 11, 2013

परमपूज्य डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा था-

" एक भाषा जनता को एक सूत्र में बांध सकती है। दो भाषाएं निश्चित ही जनता में फूट डाल देंगी। यह एक अटल नियम है। भाषा, संस्कृति की संजीवनी होती है। चूंकि भारतवासी एकता चाहते हैं और एक समान संस्कृति विकसित करने के इच्छुक हैं, इसलिए सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि वे हिंदी को अपनी भाषा के रूप में अपनाएँ। "
(डा.अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड एक, पृष्ठ 178..प्रकाशक-कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार )

Mar 10, 2013

श्यामरुद्र पाठक के अपनी भाषाओं के लिए जारी सत्याग्रह की कुछ कड़ियाँ

चित्र में बीच में लंबी दाढ़ी और पगड़ी के साथ श्यामरुद्र पाठक

क्या संघ की राजभाषा अँग्रेजी है!

(लाखों प्रत्याशियों में से सात-आठ सौ लोग संघ लोक सेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा द्वारा चुने जाते हैं। इनमें प्रतिभा की कमी तो नहीं हो सकती है। इन्हें चयनित होने के बाद कई भाषाएँ सिखाई जाती हैं और उच्च बौद्धि क्षमता वाले व्यक्ति होने के कारण उन्हें इन भाषाओं को सीखने में कोई कठिनाई भी नहीं होती। यदि ये हिन्दी, तमिल, मलयालम और अन्य सभी भारतीय भाषाएँ, यहाँ तक की विदेशी भाषाएँ भी सीखने की योग्यता रखते हैं तो फिर दसवीं स्तर की अँग्रेजी चयन के बाद सीखने में क्या समस्या हो सकती है?)
    
क्या अँग्रेजी विद्वता की निशानी है? विद्वान तो कोई भी हो सकता है मगर जीनियस (genius) होने के लिए क्या अँग्रेजी की चाशनी में डुबकी लगाए बिना बात नहीं बनती? क्या भारतीय भाषाओं में वह बात नहीं है जो किसी को जीनियस बना सके? क्या सरकारी सेवा में ऐसे जीनियसों की जरूरत होती है जो और कोई भाषा जाने या न जाने मगर अँग्रेजी में पारंगत जरूर हों? संविधान (राष्ट्रपति का आदेश) के अनुसार केंद्रीय सरकार के सभी कार्मिकों को हिंदी का ज्ञान जरूर होना चाहिए तो फिर बड़ी नौकरी के लिए अँग्रेजी और मैकाले की मानसिकता क्यों जरूरी है? क्या त्रिभाषा सूत्र सभी भारतीय विद्यालयों, पाठशालाओं, शिक्षा बोर्डों में लागू है? क्या सभी सरकारी स्कूलों में अँग्रेजी पढ़ाने की व्यवस्था है? भारतीय भाषाओं के माध्यम से स्कूली शिक्षा की व्यवस्था का प्रतिशत क्या है? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो मेरे हिन्दी माध्यम से आधे-अधूरे विकसित दिमाग में कई दिनों से कुलबुला रहे हैं। मेरे पास इनमें से किसी भी प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है।

स्त्री शोषण : जिम्मेदार कौन !! -डॉ. राम भरोसे

(फेसबुक से साभार )
 
*** आज 'विश्व महिला दिवस' पर एक घटना, जो आज ही व्यक्तिगत रूप से मेरे साथ घटित हुई या यूं कहिए कि इस घटना का जानकार भी मैं ही हूँ, आप मित्रों से साझा करना चाहता हूँ। शायद इस घटना को जानने के बाद आज मनाया जा रहा ' विश्व महिला दिवस' सिर्फ एक दिवस मात्र लगने लगेगा।
हुआ यूं कि आज जब मैं अपने कॉलेज से वापस ऑटो मे आ रहा था, तो उस ऑटो मे लगभग ९-१० वर्ष की एक बच्ची भी बैठी थी और उसके कंधो पर एक भरी भरकम बेग था। यानि कि वो अपने स्कूल से छुट्टी होने पर वापस आ रही थी। पहले मैंने सोचा कि इस बच्ची (रिया) के साथ इसकी माँ या पिता दोनों मे से कोई साथ होगा। परंतु मुझे कोई उसके साथ वाला नहीं दिखा वो मेरे बिलकुल पास ही बैठी थी और कुछ डरी और सहमी से वो मुझे लगी। मैंने बच्ची से पूछा बेटा आपके पापा या मम्मी कहाँ है? उसने कुछ डरे से स्वर मे कहा कि "पापा तो ड्यूटि और मम्मी घर पर हैं।" मैंने फिर पूछा कि "आपको स्कूल से आज कोई लेने नहीं आया?" उसे कहा अंकल जी मैं रोज ऐसे ही स्कूल से वापस आती हूँ अकेले..." मैं सुनकर हतप्रभ रह गया। फिर मैंने पूछा कि बेटा मम्मी लेने नहीं आती....??? इस प्रश्न को पूछकर मैं खुद बहुत पछताया और मन ही मन सोचा कि आज जो महिला दिवस मनाया जा रहा है, वो केवल एक दिखावा सा लगता है। और उस कडवे सच को सुनने के बाद यह बात पुष्ट हो जाती है कि आज महिलाओ के शोषण मे पुरुष से जायदा खुद स्त्रियाँ जिम्मेदार हैं। और इसका प्रारम्भ घर से ही होता है।

Mar 7, 2013

अज्ञेय के जन्मदिन पर गद्यकोश के लिंक

आज सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन "अज्ञेय" जी का जन्मदिन है। अज्ञेय जी के उपन्यास 'शेखर-एक जीवनी', 'नदी के द्वीप', 'अपने-अपने अजनबी' और 'बीनू भगत' जिन्होंने नहीं पढ़े हैं वे गद्यकोश पर भी इन्हें पढ़ सकते हैं। अज्ञेय जी का लगभग समस्त गद्य साहित्य गद्यकोश पर उपलब्ध है। संबंधित पृष्ठ का लिंक नीचे दिया जा रहा है -   

(गद्यकोश से साभार)

Mar 5, 2013

सुलगना उसकी फितरत है


साँच को आंच हो न हो

सुलगना उसकी फितरत है

झूँठ बेशर्मी की गठरी

बंधी तो भी बहुत भारी

खुली तो भी बहुत भारी

-अजय मलिक (c)

Mar 3, 2013

हिंदी की तीन विभूतियाँ- ओम थानवी


(आज सुबह फेसबुक पर ओम थानवी की टिप्पणी के साथ यह दुर्लभ चित्र एक मित्र द्वारा साझा किए मिले। अज्ञेय जी पर कुछ भी नया-पुराना मिलना मेरे लिए किसी लाटरी से कम नहीं है। साभार यह पोस्ट यहाँ दी जा रही है )

हिंदी की तीन विभूतियों का एक दुर्लभ और अब तक अप्रकाशित चित्र: ( बाएं से ) फणीश्वरनाथ रेणु, स. ही. वात्स्यायन अज्ञेय और प्रफुल्लचंद्र ओझा मुक्त। तस्वीर सम्भवतः पटना रेलवे स्टेशन पर ली गई थी। हिंदी के छुआछूत सम्प्रदायों की परवाह न कर रेणु अज्ञेय के घोर प्रशंसक रहे। अज्ञेय जब 'दिनमान' के लिए रेणु को साथ लेकर बिहार के सूखे की रिपोर्टिंग को निकले, तब रेणुने एक लम्बा रिपोर्ताज अज्ञेय के व्यक्तित्त्व और कार्यशैली पर ही लिख दिया था। अज्ञेय भी रेणु के बड़े प्रशंसक थे। रेणु अज्ञेय से दस वर्ष छोटे थे, पर दस वर्ष पहले (1977 में) चल बसे। तब अज्ञेय ने प्रेमचंद, निराला आदि अग्रजों पर लिखे "स्मृतिलेखा" पुस्तक के अपने संस्मरणों में एक संस्मरण अनुज रेणु पर भी लिखा: "धरती का धनी"... परती परिकथा के महान सृजक को हिंदी साहित्य में यह अनूठी श्रद्धांजलि मानी जाती है।


(चित्र ओझा जी के बेटे आनंदवर्धन ओझा के सौजन्य से)
-ओम थानवी

Mar 2, 2013

धूप खिली देखकर...

हर घड़ी आजकल

हर ओर शून्य सा

क्यूँ उघड़ जाता है

सूरज में अँधेरा सा

चाँद नज़र आता है  

धूप खिली देखकर

क्यूँ मन घबराता है  
 
-अजय मलिक (c)

Feb 24, 2013

भला फिर नंगपन क्या है.......अशोक अग्रवाल

(डॉ कुँअर बेचैन की फेसबुक दीवार पर अशोक अग्रवाल की एक लाज़वाब ग़ज़ल मिली। आप भी इसका लुत्फ उठाएँ । साभार पेश है )
 
हुई है जब से शादी......इक अजब आसेब तारी है
मुसलसल खौफ रहता है , मुसलसल बेकरारी है

कसम से इक निवाला....कंठ से नीचे नहीं उतरा
सुना जब लौट के......मैके से आने को बीमारी है

मरा जब लग गया पानी पे कैसे.........तैरने देखो
यकीनन आदमी की ज़िन्दगी पर...सांस भारी है

नहीं मस्जिद में करते दंडवत मालूम है लेकिन
रुकू में जब गए........पीछे किसी ने लात मारी है

खुदा की देन कह कर...इतने बच्चे कर दिए पैदा
करानी पड़ गयी....घर की अलग मर्दमशुमारी है

तलफ़्फ़ुस,गुफ्तगू,तर्ज-ए-बयानी सब के सब शीरीं
ज़ुबान-ए-यार है.......या कारोबार-ए-खांडसारी है

ये बालिश्तों से घट कर उँगलियों से नप रहे कपड़े
भला फिर नंगपन क्या है.......अगर ये पर्दादारी है

हमारे शहर की सड़कों पे.....चलते हैं तो लगता है
पहाड़ों की ढलानों पर............अभी भूकंप जारी है

-अशोक अग्रवाल

Feb 23, 2013

बोलो क्या करूँ अब

सचमुच मैंने

दिल दिया ही नहीं था

दिलफेंक नहीं था...  

कोई जबरदस्ती

चुराकर भागा और

लापता हो गया ।  

बोलो क्या करूँ अब

इस बेदिली का
 
-अजय मलिक (c)

आइए पतली गली से यूनिकोड ....2

मुझे लगता है कि पिछली पोस्ट में कुछ या बहुत कुछ अधूरा रह गया है। भाई हरिनारायण त्रिवेदी जी ने सूचना दी है कि azhagi + का पोर्टेबिल संस्करण काम नहीं कर रहा है। वस्तुत: मैंने केवल इसी संस्करण को परख कर पिछली पोस्ट लिखी थी। पोर्टेबिल संस्करण को इंस्टाल करने की आवश्यकता नहीं है। इसे डेस्कटॉप पर या पेन ड्राइव में सिर्फ खोलिए और लघुतर यानी मिनिमाइज़ कर लीजिए और वर्ड आदि में शुरू हो जाइए। हिन्दी के लिए कंट्रोल और 1 एकसाथ दबाइए। अभी मैंने इसे विंडोज़ 8 में भी परखने की कोशिश की है। विंडोज़ 8 में यह इन्टरनेट एक्सप्लोरर में काम नहीं कर रहा है, बाकी किसी प्रणाली में कोई समस्या नहीं है।
 
azhagi+ के माध्यम से एक अच्छी तमिल सिखाने वाली साइट भी मिली जिसका लिंक नीचे दे रहा हूँ-

http://www.thamizham.net/kal/ttenglish/index-u8.htm

पिछले दिनों एक मित्र ने कुछ सलाह मांगी थी। आज 24 साल से सोया हुआ मेरा परामर्शदाता जाग गया है। इससे पूर्व की वह फिर से सो जाए, सलाह दे डालता हूँ-
1. दो नावों में अगर किसी भी वजह से सवार हो गए हैं तो जैसे भी हो संतुलन बनाए रखिए; यदि संभव नहीं है तो
2. एक नाव छोड़ दीजिए;  यदि नहीं तो
3. फिर डूबने से डरना छोड़ दीजिए।

बस ...

Feb 21, 2013

आइए पतली गली से यूनिकोड की सैर करें

आजके हिन्दू अखबार में एक लेख है जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा है-

इसपर विस्तार से चर्चा करने के लिए कुछ समय चाहिए। संक्षेप में यह लेख आपको पतली गली से यूनिकोड की सैर कराने वाला साबित हो सकता है। बिना यूनिकोड सक्रिय किए सिर्फ पेन ड्राइव में 395kb का सॉफ्टवेयर लिए आप किसी भी विंडोज़ कंप्यूटर में सभी भारतीय भाषाओं में धड़ल्ले से काम कर सकते हैं। मैंने पिछले डेढ़ घंटे में जो प्रयास जांच-परख का किया है उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि बेहद आसान, सहज और सरल तरीके से पतली गली यानी शॉर्टकट से इस Azhagi+ सॉफ्टवेयर से हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में यूनिकोड में काम किया जा सकता है।
 
 
 
इससे संबन्धित लिंक्स  नीचे हैं -  
 
कृपया आप भी इसे आज़माकर कुछ प्रतिक्रिया दें।

ठग नहीं हो, किन्तु तुम...डॉ कुँअर बेचैन

(प्रस्तुत है -डॉ कुँअर बेचैन का एक गीत, फेसबुक से साभार )


बहुत प्यारे लग रहे हो।

ठग नहीं हो, किन्तु तुम ही
हर नज़र को ठग रहे हो ।
बहुत प्यारे लग रहे हो ॥

दूर रहकर भी निकट हो
प्यास मैं, तुम तृप्ति-घट हो
मैं नदी की इक लहर हूँ
तुम नदी के स्वच्छ तट हो
सो रहा हूँ किन्तु मेरे
स्वप्न में तुम जग रहे हो।
बहुत प्यारे लग रहे हो॥

देह मादक, नेह मादक
नेह का मन-गेह मादक
और यह मुझ पर बरसता
नेह वाला मेह मादक
किन्तु तुम डगमग पगों में
एक संयत पग रहे हो।
बहुत प्यारे लग रहे हो॥

अंग ही हैं सुघर गहने
हो बदन पर जिन्हें पहने
कब न जाने आऊँगा मैं
यह ज़रा सी बात कहने
यह कि तुम मन की अंगूठी के
अनूठे नग रहे हो ।
बहुत प्यारे लग रहे हो॥

 - कुँअर बेचैन-
( लौट आए गीत के दिन' नामक गीत संग्रह से )

Feb 19, 2013

हिंदी शिक्षण योजना के पाठ्यक्रमों की परीक्षाओं के प्रश्न-पत्रों के नमूने

इंटरनेट पर केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान, नई दिल्ली के कुछ नए एवं सकारात्मक प्रयासों की झलक राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय की साइट पर देखी जा सकती है। प्रबोध, प्रवीण, प्राज्ञ तथा बैंकिंग प्राज्ञ के प्रशिक्षार्थियों के लिए पुराने प्रश्न-पत्रों को नेट पर डाउन लोड हेतु उपलब्ध कराया जाना भी इनमें एक है। उपर्युक्त पाठ्यक्रमों की नवम्बर 2012 में सम्पन्न सभी परीक्षाओं के प्रश्न-पत्रों के लिए केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान के संबंधित पृष्ठ का लिंक नीचे दिया जा रहा है-

यह एक बहुत अच्छी शुरुआत है। यदि पिछले दो-तीन वर्षों के प्रश्न-पत्र दिए जा सकें तो अभ्यास के लिए और अधिक संभावनाएँ बनेंगी।  इसी क्रम में ऑनलाइन परीक्षा तथा हिन्दी टंकण एवं आशुलिपि परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र भी दिए जाएँ तो परीक्षार्थी बेहद लाभान्वित होंगे।

Feb 18, 2013

कुछ रोशन करूँ - अजय मलिक

जलना ही है तो

दिये की लौ बनूँ

कुछ रोशन करूँ
 
थोड़ी तपन दूँ

 -अजय मलिक

किस्सा - एक अनोखा किस्सा

एक मित्र ने कहा- "सहयोग कीजिए।"
मुझसे सहयोग से अधिक असहयोग की अपेक्षा की जाती है।
मद्रास में शायद असहयोग का अधिक महत्व है। मुझसे सहयोग मांगने का मन बहुत कम लोगों का होता है।
मैंने पूछा- " क्या सहयोग अपेक्षित है?"
मित्र ने कहा-" जरा, एक पचास का नोट निकालिए।"
मेरे पचास देने से पहले ही वे "किस्सा" थमाकर चले गए। बोले - "पचास कल ले लूँगा।"
बेहद अच्छी साज़सज्जा  के साथ बहुत अच्छे कागज पर छापा गया यह 200 पृष्ठ का सुंदर कहानी संग्रह मन को छू गया। यकीन मानिए, मित्रवर को पचास दे चुका हूँ। किस्सा अगर आपको मिल जाए तो जरूर पढ़िए। सहयोग राशि मात्र पचास रुपए।
प्रकाशक: सुधा स्मृति ट्रस्ट, भागलपुर -812001



 

Feb 16, 2013

ग़ज़ल मेरी मुझे तेरी ज़ुबानी अच्छी लगती है- शायर अशोक मिज़ाज बद्र

(फेस बुक पर शायर अशोक मिज़ाज बद्र की यह ग़ज़ल जो मुझे बहुत पसंद आई, यहाँ साभार प्रस्तुत है - अ. म.)


बहुत से मोड़ हों जिसमें कहानी अच्छी लगती है
निशानी छोड़ जाए वो जवानी अच्छी लगती है

सुनाऊं कौन से किरदार बच्चों को कि अब उनको
न राजा अच्छा लगता है न रानी अच्छी लगती है

खुदा से या सनम से या किसी पत्थर की मूरत से
मुहब्बत हो अगर तो ज़िंदगानी अच्छी लगती है

पुरानी ये कहावत है सुनो सब की करो मन की
खुद अपने दिल पे खुद की हुक्मरानी अच्छी लगती है

ग़ज़ल जैसी तेरी सूरत ग़ज़ल जैसी तेरी सीरत
ग़ज़ल जैसी तेरी सादा बयानी अच्छी लगती है

गुज़ारो साठ सत्तर साल मैदाने अदब में फिर
क़लम के ज़ोर से निकली कहानी अच्छी लगती है

मैं शायर हूँ ग़ज़ल कहने का मुझको शौक़ है लेकिन
ग़ज़ल मेरी मुझे तेरी ज़ुबानी अच्छी लगती है

-शायर अशोक मिज़ाज बद्र

Feb 13, 2013

शर्म हमको मगर नहीं आती..... राहुल देव

 (राहुल जी की यह पोस्ट फ़ेस बुक से साभार ) 
    
यह पोस्ट सामान्यतया सबके लिए और खास तौर पर एक राजेश शर्मा के लिए है जिन्होंने हमारे जारी भाषा संवाद में एक जगह लिखा कि अंग्रेजी ने हिन्दी के 6.5 लाख शब्द लिए हैं तो हिन्दी वाले इतना क्यों चिल्ला रहे हैं। उन्होंने उत्सुकता जगाई और हमने कुछ तलाशा तो यह मिला।

अंग्रेजी शब्द संख्या के अनुमान 2.5 लाख, 7.5 लाख (ऑक्सफर्ड इंग्लिश डिक्शनरी) और अधिकतम 10,13,913 (स्रोतः ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर, 1 जनवरी,2012 तक) हैं।

हिन्दी शब्दों के अनुमान 1.20 लाख से 2 लाख और एक पूर्णतः अपुष्ट, संदर्भ-स्रोतहीन अनुमान के अनुसार 7.5 लाख हैं।

1886 में दो अंग्रेजों यूल और बर्नेल ने एक प्रसिद्ध शब्दकोश निकाला - हॉबसन जॉबसन। इसमें अंग्रेजी राज के दौरान अंग्रेजी में शामिल किए गए हिन्दी, उर्दू, पुर्तगाली, अरबी फारसी आदि के शब्दों को शामिल किया गया था। इसमें लगभग 2000 प्रविष्टियां हैं। यह अद्भुत ग्रंथ है, और मेरे पास है।

अब अंतिम बिन्दु जिसको लेकर बहुत से हिन्दी वाले हमारे जैसों को शुद्धतावादी, क्रुद्धतावादी वगैरह कह कर गरियाते, लजाते, फटकारते रहते हैं। कल दिलीप मंडल ने भी मेरे प्रतिवाद में लंबी बात करते हुए इसका ज़िक्र किया था। आज के अंग्रेजी के दुनिया में सबसे प्रामाणिक शब्दकोश ऑक्सफर्ड में हिन्दी के कितने शब्द हैं, या भारतीय भाषाओं के कितने शब्द हैं...खोजने पर जो संख्या मुझे मिली है वह है लगभग 700।

ये सारे लगभग वे शब्द हैं जो अद्वितीय और अनूठे ढंग से ठेठ भारतीय हैं। ये अंग्रेजी के आम शब्दों के भारतीय विकल्प नहीं हैं। इनसे अंग्रेजी समृद्ध और वैश्विक हुई है।

अंग्रेजी ने अपने रोजमर्रा के आम, प्रचलित, परिचित शब्दों को भगा कर उनकी जगह भारतीय शब्दों को नहीं बिठाया। इन भारतीय शब्दों से अंग्रेजीभाषियों की अंग्रेजी अभिव्यक्ति क्षमता खंडित, प्रदूषित और भ्रष्ट नहीं हुई है। वह मां को आज भी मदर ही बोलते हैं मां नहीं। और हम...हम बोलते हैं मदर, फादर, ब्रदर .....सूची लंबी और सुपरिचित है।

शर्म हमको मगर नहीं आती.....
 
- राहुल देव
 
हमारे मित्र और मेरी इस नकली साहब नुमा फोटो के अपराधी सुशील पंडित की एक मार्मिक टिप साझा कर रहा हूं।Sushil Pandit सदियां लग जाती हैं किसी सक्षम भाषा के बनने में । पीढ़ियाँ चुक ज।ती हैं उसमें जीवंत अभिव्यक्ति की क्षमता भरने में । देश, काल और परिस्थितियों के अपने विशिष्ट अनुभवों को संजोते-संजोते, ज्ञान और साहित्य के अपने कोष बनाते-बनाते, दर्शन व इतिहास की एक अलग समझ-बूझ तराशते-तराशते, कोई भाषा किसी स्वाभिमानी समूह की गौरवश।ली पहच।न बन प।ती है । फिर वही भाषा माँ की तरह अपने भाषियों को पालती भी है । हमें हमाँरी भाषा पकी-पकायी, थाली में परोसकर मिली है। शायद इसी लिए हम उसे बाज़ार के तराज़ू में तौलने निकल पड़े हैं । हिब्रु को यहूदी अगर इसी तरह तौलते तो दो हजार साल के अंतराल पर इज़रायल में वो फिर से आम बोलचाल में न आती । 
- राहुल देव

Feb 9, 2013

पहचानो जरा ...


Feb 7, 2013

कंप्यूटर पर हिन्दी और हिन्दी में कंप्यूटर : ज्ञान यज्ञ

इसके संबंध में संभवत: पहले भी जानकारी दी गई थी। ज्ञानयज्ञ पर आपको हिन्दी में कम्प्यूटर, विंडोज़, एम एस ऑफिस आदि से संबन्धित जानकारी से ओतप्रोत ढेर सारे यू ट्यूब  के वीडियो मिलेंगे। आज  श्री अमरजीत ने इसके बारे में एक ईमेल भेजा है। लिंक नीचे दिया गया है। स्वयं आज़माकर देखिए, एक क्लिक भर ही तो करना है- 

http://www.gyanyagya.info