Apr 30, 2020

तुम एक महान कलाकार और उससे भी महान इंसान थे इरफान...


                        07-01-1967 .....  29-04-2020
                             
मुंबई छूटने का इतना दुःख जून 1997 में भी नहीं हुआ था, जितना कल अचानक इरफान खान के आकस्मिक निधन की खबर से हुआ। 

वो मेरा मुहब्बत का ऐसा दौर था, जब लपलपाती दहकती शमा पर परवाना ये सोचकर क़ुर्बान होने से रुक गया कि कहीं शमा बुझकर धुँआ-धुँआ न हो जाए !! फिर भी जब अचानक शमा बुझ गई, तो परवाना धुएँ की दहक में ऐसा झुलसा कि कहीं का न रहा। वो शमा फिर कभी उसके लिए न जली ...और बस धुँआ बनकर रह गई।

कल दुःख शब्द बहुत ही खोखला सा लगा। इरफान के निधन का समाचार आसमानी बिजली के गिरने से भी कहीं ज्यादा कष्टकारी था। मैंने तत्काल डॉ चंद्रप्रकाश को लघु संदेश/एसएमएस भेजा... सिराज को फोन मिलाया... वह सुनकर सन्न रह गया। दोनों को ही एकबारगी विश्वास नहीं हुआ। फिर असीम चक्रवर्ती को फोन लगाया...असीम को खबर मिल चुकी थी और वे सदमे के कारण खुद को बात करने की स्थिति में नहीं पा रहे थे...

शाम सुहानी हो जाए...


शाम सुहानी हो जाए...

कुछ ऐसी चले पवन निर्मल
हर राह बिछे पुष्पी चादर
हो दीपक से जग भर रोशन
सूरज शरमा कर छुप जाए ।

मीलों तक चले तेरी चिक-चिक
रुक जाए घड़ियों की टिक-टिक
झगडें फिर से दो-चार बार
फिर हो जाएँ दो-चार वार
बीते पल-पल का हो हिसाब
हर बात पुरानी हो जाए I
कुछ ऐसी चले पवन निर्मल ...

ना तू माने, ना मानूँ मैं
ना तू जाने, ना जानूँ मैं
मैं-मैं तू-तू की काँव-काँव
जब मिलें ख्वाब में किसी ठांव
पतझड़ हो या फूल-ए-बहार
वह शाम सुहानी हो जाए I
कुछ ऐसी चले पवन निर्मल ...
-अजय मलिक
09-07-2012

समय चुपके से भागता चला जाए है


यूँ तो मुझे शायद हक नहीं है कि कुछ सोचूँ मगर कभी-कभी परिस्थितियाँ मजबूर कर देती हैं, सोचने के लिए और तब न चाहते हुए भी मैं सोचने लगता हूँ। बार-बार भरसक प्रयास करता हूँ कि सोचने का यह कष्टसाध्य क्रम ठहर जाए, थोड़ा विराम ले पर जब एक बार यह शुरू होता है तो फिर क्या मजाल कि रुक जाए। मानो सारा ब्रह्मांड सामने आ जाता है, लोक-परलोक, आकाश-पाताल, स्वर्ग-नर्क कुछ भी तो नहीं छूटता। बस छूट जाता है पसीना और अपार ब्रह्म में न जाने कहाँ खो जाती है नींद। फिर नींद को ढूँढते-ढूँढते कई और चक्कर लग जाते हैं जाने कितने ग्रह, नक्षत्र और तारों के...सितारों के पार, चाँद के उस ओर कहीं कुछ नज़र नहीं आता, थक-हार कर न जाने कब कुछ बेहोशी सी छा जाती है।

कुछ लोग अच्छे लगते हैं, न जाने क्यूँ वे अच्छे लगते है? वे कुछ अच्छा न भी करें तब भी अच्छे लगते हैं। कुछ बुरे लोगों को भी यह अहसास दिलाने की कोशिश मन मारकर करनी पड़ती है कि वे भी अच्छे लगते हैं। वे बुरे क्यूँकर लगते हैं, इसका भी कोई सही-सही जवाब नहीं मिलता। चाहे उन्होंने कुछ बुरा लगने जैसा न भी किया हो तब भी वे बुरे लगते हैं। मन सभी को तो मनमाफिक नहीं पाता, नहीं मानता, और जिन्हें नहीं मानता उनसे मन से बात कैसे की जा सकती है भला! बेमन से बात करना भी तो किसी सज़ा से कम नहीं।

जाति की जाति


मैं जाति की जाति हूँ
जाती नहीं हूँ जाति हूँ
मैं सत्य सती हूँ
आदमी की अति हूँ

जो जाति के बाहर हैं
मैं उनकी भी जाति हूँ
सोते में भी जाति हूँ
रोते में भी जाति हूँ
इतनी बढ़ी जाति हूँ
कि पूरी प्रजाति हूँ
आती हूँ तो जाति हूँ
जाती हूँ तो जाति हूँ

खान पान सांस शरण
आन बान जन्म मरण
हार-जीत मार-पीट 
झूठ-गबन प्रेम-प्रीत
पाठ से पहाड़ तक
चीख से दहाड़ तक   
हर कदम साथ साथ
कहाँ नहीं जाती हूँ !

कहीं पर किराए में
कहीं कुर्सी पाए में
कहीं पर तिराहे में  
ब्याह-शादी-साये में
कफन से दफन तक
मेरी ही पुकार है
जीवन का लक्ष्य-मोक्ष  
जाति की दरकार है

घर हो या घेर हो
बकरी या शेर हो 
खेत या खलिहान हो
दफ्तर या दुकान हो
महल या श्मशान हो
मेरी ही सरकार है
अमीरी बेकार है
गरीबी बेकार है
मेरे बिना जग में
हर आदमी बेकार है 

31-01-2013

डिबिया से डरता... वो घुप्प अँधेरा


बहुत पीछे छूटा
डिबिया से डरता
वो घुप्प अँधेरा
जन्नत से बेहतर
छप्पर की छाया
वो शीतल हवा में  
सँवरता सवेरा

अँधेरे में ज़ोरों से
दिल का धकना
वो बूकल में ठिठुरी
उंगलियों का अकड़ना
गीले मौजों के कैदी  
पावों का फटना
वो पाती की पट-पट 
समझता सन्नाटा...  
वो सिर का मुड़ासा
वो सांकल खड़कना...

अब घुप्प अंधेरे को
नज़रें तरसती हैं
उंगली की पोरें
अकड़न को मरती हैं
क्यों आँखों में चुभता 
ये तीखा उजाला

क्यों खामोश है दिल   
कहाँ कमली वाला।
कहाँ कमली वाला...  
 -अजय मलिक (c)
  04-03-2013

उजाला ...अजी भाई साहब जी, सुनो तो जी ....


अंधेरा ... इस घनघोर अंधेरे में खड़ा हुआ मैं, उजाले में चलते-फिरते, गुलाटियाँ लगाते, गिलोरियाँ खेलते, गोटियाँ बिठाते कई तरह के चेहरों को, बड़ी आसानी से देख पाता हूँ। मुझे अंधेरे में गुम हो गया मान लिया गया है। मैं शायद ब्रह्मांड का हिस्सा बन गया हूँ... ब्लैक होल में समाकर सब ऊर्जाएँ सबसे बड़ी ऊर्जा का हिस्सा बन जाती हैं। अंधेरा जो सबसे बड़ी ऊर्जा है। अंधेरे से सब उजाले में जाना चाहते हैं ... उजाले से कोई भी अंधेरे में नहीं आना चाहता, मगर आना तो पड़ता है। ऐसा कोई नहीं जो अंधेरे में समाने से बच सके। घर का अंधेरा सब मिटाना चाहते हैं; बाकी किसी जगह बिखरे अंधेरे को कोई देखना तक नहीं चाहता। इस अंधेरे में छुपे रहस्यों को क्यों कोई जानना-समझना-छूना-पहचानना नहीं चाहता।

Apr 27, 2020

खेत पर दो क्षणिकाएँ

(1)

रूठे हुए सब
खेत और खलिहान अपने
चल लौटता हूँ गाँव अपने

(2)

अच्छा हुआ
जो छिन गए
सब खेत अपने
न आँधियों के डर
न ओलों के सपने

अजय मलिक (c)

कोरोना का कहर

उसमें ज़हर है
इसमें ज़हर है
तुझमें ज़हर है
मुझमें ज़हर है
कौन जानता है
किसमें ज़हर है!
हर ओर बस
कोरोना का क़हर है
हवा में
पानी में
दूध में
दवा में
रोटी में
बोटी में
दाल में
चाल में
माल में
रुपये पैसे में
ऐसे वैसे में
हर एक चीज में
बोये गए बीज में
सबमें ज़हर है।
कोरोना का क़हर है
शायद मुँह पर
ढाटा बांधे छुपी
कहीं इंसानियत
बची हो सकती थी,
मगर...
-अजय मलिक (c)

उदासी और प्यार

जब भी उदासी से पूछता हूँ
उसकी मेहरबानी की वजह
वह खिलखिलाकर कहती है
प्यार की वजह नहीं होती
-अजय मलिक (c)

हार को ही हारना है

हार पर हार के बाद
रोज हार हार कर भी
मन कभी नहीं हारता
बस थक जाता है
थोड़े विश्राम के बाद
फिर नई हार को तैयार
सिर उठाए सीना ताने
नयन में निर्भीकता भर
दौड़ता है
अंतत:
एक दिन
हार कर
बिलखकर
झक मारकर
हार को ही
हारना है।
-अजय मलिक (c)

लघु कथा:: सत्तू के दास

लघु कथा:: सत्तू के दास
दास साहब पूरे पैनल से लड़ पड़े थे।यदि सीसीटीवी कैमरे वहाँ लगे होते तो यह कहानी काफ़ी दिलचस्प हो सकती थी । दास साहब का कहना था कि जो भी हो एक उनकी जाति का आदमी ज़रूर सलेक्ट होना चाहिए ।दूसरे दो आदमी दूसरी जाति के सलेक्ट हो चुके हैं , इसलिए यह तीसरा आदमी उनकी जाति से होना चाहिए । हालाँकि दास साहब का यह तर्क पूरी तरह कुतर्क था लेकिन दास साहब के सामने पैनल के दूसरे लोग ज़बान नहीं खोल सकते थे, उन्हें डर था कि कहीं दास जाति की बात उठाकर इस मामले को किसी और रूप में तूल न दे दें।

भूलो भाई

भूल सको तो
भूलो भाई
कौन मिला
कब आया
क्यों गले लगा
काहे रूँठा
और किस बेला
ले गया विदाई
-अजय मलिक (c)

सिपाही

सिपाही
न जंग
हारता है,
न जान
आखिरी
साँस तक
वह सिर्फ
लड़ना
और बस
जीतना
जानता है
जंग हो
या जान
-अजय मलिक (c)

न मरे, न ही जीना छोड़ा

दोस्ती का दम
भरने वालों ने
तो ख़ूब
लहुलुहान किया
पर हम भी
क्या हम निकले
न मरे, न ही जीना छोड़ा
-अजय मलिक (c)

गुजरा हुआ जमाना :: नौशाद

Image may contain: one or more people

गुजरा हुआ जमाना :: मालविका तिवारी

Image may contain: 5 people

Image may contain: 1 person

गुजरा हुआ जमाना :: नसीरुद्दीन शाह

Image may contain: 1 person

गुजरा हुआ जमाना :: साई परांजपे

Image may contain: 2 people

गुजरा हुआ जमाना :: सईद जाफरी

Image may contain: 4 people

अँग्रेजी बनाम मंदारिन (चीनी भाषा) :: भारतीय भाषाओं को भी दम दिखाना होगा

पता नहीं क्यों मैं ऐसा सोचने को विवश हूँ...चीन से चलकर कोरोना वायरस विश्व भर में पसर गया, मगर वुहान में नियंत्रित होने के बावजूद नियंत्रण का तरीका वुहान याकि चीन से बाहर नहीं आ सका... क्यों?
क्या इसे चीनी भाषा मंदारिन द्वारा तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय भाषा अँग्रेजी के वर्चस्व को धूल में मिला देने का ठोस प्रमाण नहीं माना जा सकता !!!
चीन अँग्रेजी से सबकुछ लेता है और मंदारिन में सँजो देता है, लेकिन मंदारिन से अँग्रेजी को वापस कुछ नहीं देता ! कहते हैं चीनी भाषाए इशारों की भाषाएँ हैं। उन्हें पूरी तरह कोई नहीं जानता। चीनियों के अलावा अन्य कितने लोग चीनी भाषाओं को जानते हैं?
भारत अँग्रेजी पर अत्यधिक आश्रित देश है। अपनी भारतीय भाषाओं में अपनी समस्याओं पर वैज्ञानिक शोध मुझे लगता है यदि शून्य नहीं भी है तो अधिकतम शून्य से 1 के बीच ही होगा।
अँग्रेजी सोच के साथ जहां अमेरिका कोरोना का रोना रोने तक सीमित है वहीं भारत के माननीय प्रधान मंत्री मोदी जी की 21 दिन सामाजिक दूरी रखने की सोच विशुद्ध भारतीय सोच है।
हमें अँग्रेजी पर आश्रित रहने की मानसिकता से बाहर आना होगा और अपनी भारतीय सोच को भारतीय भाषाओं के माध्यम से स्वीकारते हुए उसके विकास के लिए हर संभव प्रयास करना होगा।
हम अनंतकाल तक संसार के लिए प्रयोगशाला भर बने नहीं रह सकते। हमें अँग्रेजी के साथ-साथ चीनी भाषाओं को भी अपनी पकड़ में लेना होगा। चीनी, रूसी, जापानी, कोरियन भाषाओं से अधिकतम ज्ञान विज्ञान को अपनी भारतीय भाषाओं में सँजोकर आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी और ऐसे हालात पैदा करने होंगे कि अँग्रेजी सहित चीनी, रूसी, कोरियन, जापानी आदि सब भाषाएँ, भारतीय भाषाओं की आश्रित होने को मजबूर हो जाएँ।
हमें चीन से कोरोना के बहाने ही सही, यह चतुराई सीखनी होगी। आज सम्पूर्ण विश्व एक बाजार बन चुका है। इंसानियत का व्यापार नहीं होता। बाजार खरीदने से अधिक बेचने से लाभ कमाता है।
हमें शीघ्रातिशीघ्र अपनी भाषाओं को बाजार के लिए तैयार करना होगा। तभी हम चीनी या अमेरिकी किसी भी वाइरस और उसकी वैक्सीन से अंतिम लड़ाई लड़ने और जीतने में सक्षम हो सकेंगे।

मैं बुरा हूँ !!

कई बार लगता है
कि मैं बहुत बुरा हूँ
फिर लगता है कि
इतना भी बुरा नहीं हूँ
कि बुराइयों से
लड़ भी न सकूँ
-अजय मलिक (c)

मैं और नदी

मैं
नदी की ओर
जाता हूँ, नहाता हूँ,
उसमें घर बनाता हूँ
और नदी को
खा जाता हूँ

लोग
गाँव के घर से
शहर जाते हैं
महल बनाते हैं
झोपड़ी में जीते हैं
और सड़क पर
मर जाते हैं

शहर
गाँव की ओर
लपकते हैं
लहलहाते खेत
पलकें झपकते ही
पथरा जाते हैं
-अजय मलिक (c)

हिन्दी प्रशिक्षण रोस्टर रजिस्टर

वर्ष १९९६ में यह रोस्टर रजिस्टर आईं आई टी, मुंबई से मिला था।अक्सर मुझसे रोस्टर का प्रपत्र माँगा जाता है। पुराने कबाड़ से निकला यह प्रपत्र उपयोगी हो सकता है।

No photo description available.

No photo description available.

एक पुरानी ग़ज़ल

Image may contain: text

गर्म पानी की भाँप में साँस लेना कोरोना वायरस को मार देता है...

Apr 24, 2020

मैं ढोता हूँ ...


मैं ढोता हूँ ...

मैं अपने कंधों पर
रोज अकेला,
अपनी लाश को
श्मशान घाट तक
ढोता हूँ
चिता सजाता हूँ और
दाह संस्कार के बाद
थके हारे कदमों से
लौट आता हूँ
घर पर फिर से
मेरी लाश
मेरी प्रतीक्षा में,
पलकें बिछाए मिलती है
मैं क्यों रोज मरता
याकि मार दिया जाता हूँ
रोज़ दाह संस्कार के बाद भी
मेरी लाश
मेरा पीछा छोड़ने से
क्यों कतराती है

अजय मलिक 
१७/०४/२००७ कोचिन

जी लेने दो


जी लेने दो

तुम ख़ुद को,
ख़ुदा कहो
ईसा कहो
पैग़म्बर या
अल्लाह कहो
तुम जो चाहो
जैसे चाहो, बनो
जिसे चाहो, चुप
या चिल्ला कर
पुकारो, बुलाओ,
आठों पहर आवाज़ दो
जन्नत की चाह में
जिओ कि मर जाओ
हमें कोई एतराज़ नहीं है

बस इस दुनिया को
दुनिया ही रहने दो
जहन्नुम न बनाओ

हमें, जय श्री राम
राम राम कहने दो
मर्यादाओं में क़ैद
मौन साधना में रत
मामूली इंसान रहने दो
स्वर्ग नरक सब तुम ले लो
हमें ये दुनिया प्रिय है
हमें इसी दुनिया में
प्यार मुहब्बत से
बस मरने तक,
जी लेने दो

-अजय मलिक 
चेन्नई 02-04-2020

एक बहुत पुरानी कविता - "अरे बुढ़ापे"


अरे बुढ़ापे 

अरे बुढ़ापे
कब आए तुम
जान न पाया
आज अचानक
देख आपको
बीता कल फिर
सम्मुख आया
और यही बस
मैंने पाया ...

लगा अचानक
जिसे कह रहे
...सपना कल का
झूठ नहीं था

तुम झूठे थे

मैंने कहा -
दिवास्वप्न क्या
मैंने देखा
बस इतना भर
सोच लिया था
आएगा तू
प्यार भरा सा
सत्य नाम की
लिए पताका

सोच लिया था
तू मेरा है
...हो जाएगा
नहीं जानता था
पर इतना
सपना मेरा
छल जाएगा

किया आज जो
तूने हंसकर
सपने में तो
कहीं नहीं था

मैंने देखा
पुनः अचानक।
तू भी वही
पुराना कल है
दिवास्वप्न
तू ही बस छल है

वह कल
जब मैंने था
तुझे शांत
सागर सा सोचा
...धोखा
धोखा ...

भाव हीन सा
निर्मल कोमल
वह कल बीता

सत्य वहीं था

आज कहूं क्या
मेरे जीवन
शब्द नहीं हैं

जिससे मिला
वही सपना था

होता न तो
हो जाता था
- शांत झील की
किसी लहर से
पंछी सा बन
उड़ जाता था
रह जाता था
वही अकेला
दूर सभी से दूर
उद्दिग्न,
आवेश भरा सा
नितांत अकेला;
मैं...

-पर कोमलता
तुझे बधाई
सदा मुझे
तूने ढक दाबा
साथ दिया न
घृणा का तूने

जिससे मिला
लगा अपना है
सब खो बैठा
इसी चाह में

आज लगा कि
सब सपना है
वह भी झूठा

सत्य कहाँ है
वह भी देखा
कब चाहा
लोगों ने मुझको
करता रहा
उसे अनदेखा

नकली चेहरे
हँसते देखे
मन का रोना
किसने देखा

... वासना;
कहाँ छुपाया तुझको
तेरी स्नेहिल सी; रेखा भी
बता तनिक तो

कभी किसी ने देखी!!

जितना अधिक
प्यार से बोला
सब ने उतना ही
मुख खोला

अधिक व्यंग
अत्यधिक दिलासा
सभी साज संग
भरे गीत
स्वरहीन
अदा से कहते
सुनले महत्त्वहीन
अनदेखे

मैंने यह भी
किया सुरक्षित

पास सभी
पहले से भी था
- जलते दिन
चलती लुएं
पाले भरी सुबह
कोहरे की चादर में
रात चांदनी

प्रतीक्षारत
सबके सब बंधित
ठूँठ वृक्ष

बसंती शाम
अकाल मृत्यु भी
रोते बच्चे
बिलखती माएँ
अणु बस से
जलती धरती
फटती चट्टानें
बहता मलवा
किसी शिकारी की
गोली से
घायल मृग शिशु
-और सभी कुछ

किंतु
एक आह सी
सदा खींचकर
इंतजार से
तुझे निहारा
दूर बहुत
जैसे कोई तारा
था तू ।

पर कितना पाखंडी

अरे पाखंडी
तेरी आहटें
हर आहट पर
उदास शाम के
साथ खड़ा तू
कितना भोला
दीख रहा था

सच,
तू प्यारा भी था
मुझको

पर तूने भी
किया वहीं क्यों?
जो जीवन भर
सहता आया
सालता आया

आह! आशा
तू क्यों आई थी
किसने तुझे
सुझाया
यह सब

अरे निराशा...
प्यार भरी
स्नेहिल छवि
कहां गई तू !

अरे मनीषा

भूल गया मैं
भटक गया मैं
रहा अकेला कभी नहीं
ना साथी ही
कोई मिला
मुझे

आए तो भी
चले गए सब
देकर साथ कुरेद
उसके संग
नए घाव
गहरे तीखे

कुछ पहले के
परत पलट कर
पुन: हराकर गए

नई दिवाली
पुराने दाने
सब वादों के
ताने-बाने

विरह वेदना
जो प्यारी थी
आज नहीं है

कहां कामना
कहां रूप अब
यौवन का वह
गर्व कहां अब

बन चिर साथी
साथ खड़े तुम 
झूठे...
कपटी ...

अरे बुढ़ापे !!

-अजय मलिक
१४-०१-१९८३
सायं ०३.०८