Apr 27, 2020

गुजरा हुआ जमाना :: शशि कपूर






गुजरा हुआ जमाना :: नसीरुद्दीन शाह









गुजरा हुआ जमाना :: गुलजार



गुजरा हुआ जमाना :: शम्मी कपूर



अँग्रेजी बनाम मंदारिन (चीनी भाषा) :: भारतीय भाषाओं को भी दम दिखाना होगा

पता नहीं क्यों मैं ऐसा सोचने को विवश हूँ...चीन से चलकर कोरोना वायरस विश्व भर में पसर गया, मगर वुहान में नियंत्रित होने के बावजूद नियंत्रण का तरीका वुहान याकि चीन से बाहर नहीं आ सका... क्यों?
क्या इसे चीनी भाषा मंदारिन द्वारा तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय भाषा अँग्रेजी के वर्चस्व को धूल में मिला देने का ठोस प्रमाण नहीं माना जा सकता !!!
चीन अँग्रेजी से सबकुछ लेता है और मंदारिन में सँजो देता है, लेकिन मंदारिन से अँग्रेजी को वापस कुछ नहीं देता ! कहते हैं चीनी भाषाए इशारों की भाषाएँ हैं। उन्हें पूरी तरह कोई नहीं जानता। चीनियों के अलावा अन्य कितने लोग चीनी भाषाओं को जानते हैं?
भारत अँग्रेजी पर अत्यधिक आश्रित देश है। अपनी भारतीय भाषाओं में अपनी समस्याओं पर वैज्ञानिक शोध मुझे लगता है यदि शून्य नहीं भी है तो अधिकतम शून्य से 1 के बीच ही होगा।
अँग्रेजी सोच के साथ जहां अमेरिका कोरोना का रोना रोने तक सीमित है वहीं भारत के माननीय प्रधान मंत्री मोदी जी की 21 दिन सामाजिक दूरी रखने की सोच विशुद्ध भारतीय सोच है।
हमें अँग्रेजी पर आश्रित रहने की मानसिकता से बाहर आना होगा और अपनी भारतीय सोच को भारतीय भाषाओं के माध्यम से स्वीकारते हुए उसके विकास के लिए हर संभव प्रयास करना होगा।
हम अनंतकाल तक संसार के लिए प्रयोगशाला भर बने नहीं रह सकते। हमें अँग्रेजी के साथ-साथ चीनी भाषाओं को भी अपनी पकड़ में लेना होगा। चीनी, रूसी, जापानी, कोरियन भाषाओं से अधिकतम ज्ञान विज्ञान को अपनी भारतीय भाषाओं में सँजोकर आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी और ऐसे हालात पैदा करने होंगे कि अँग्रेजी सहित चीनी, रूसी, कोरियन, जापानी आदि सब भाषाएँ, भारतीय भाषाओं की आश्रित होने को मजबूर हो जाएँ।
हमें चीन से कोरोना के बहाने ही सही, यह चतुराई सीखनी होगी। आज सम्पूर्ण विश्व एक बाजार बन चुका है। इंसानियत का व्यापार नहीं होता। बाजार खरीदने से अधिक बेचने से लाभ कमाता है।
हमें शीघ्रातिशीघ्र अपनी भाषाओं को बाजार के लिए तैयार करना होगा। तभी हम चीनी या अमेरिकी किसी भी वाइरस और उसकी वैक्सीन से अंतिम लड़ाई लड़ने और जीतने में सक्षम हो सकेंगे।

मैं बुरा हूँ !!

कई बार लगता है
कि मैं बहुत बुरा हूँ
फिर लगता है कि
इतना भी बुरा नहीं हूँ
कि बुराइयों से
लड़ भी न सकूँ
-अजय मलिक (c)

मैं और नदी

मैं
नदी की ओर
जाता हूँ, नहाता हूँ,
उसमें घर बनाता हूँ
और नदी को
खा जाता हूँ

लोग
गाँव के घर से
शहर जाते हैं
महल बनाते हैं
झोपड़ी में जीते हैं
और सड़क पर
मर जाते हैं

शहर
गाँव की ओर
लपकते हैं
लहलहाते खेत
पलकें झपकते ही
पथरा जाते हैं
-अजय मलिक (c)

हिन्दी प्रशिक्षण रोस्टर रजिस्टर

वर्ष १९९६ में यह रोस्टर रजिस्टर आईं आई टी, मुंबई से मिला था।अक्सर मुझसे रोस्टर का प्रपत्र माँगा जाता है। पुराने कबाड़ से निकला यह प्रपत्र उपयोगी हो सकता है।

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एक पुरानी ग़ज़ल

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गर्म पानी की भाँप में साँस लेना कोरोना वायरस को मार देता है...

Apr 24, 2020

मैं ढोता हूँ ...


मैं ढोता हूँ ...

मैं अपने कंधों पर
रोज अकेला,
अपनी लाश को
श्मशान घाट तक
ढोता हूँ
चिता सजाता हूँ और
दाह संस्कार के बाद
थके हारे कदमों से
लौट आता हूँ
घर पर फिर से
मेरी लाश
मेरी प्रतीक्षा में,
पलकें बिछाए मिलती है
मैं क्यों रोज मरता
याकि मार दिया जाता हूँ
रोज़ दाह संस्कार के बाद भी
मेरी लाश
मेरा पीछा छोड़ने से
क्यों कतराती है

अजय मलिक 
१७/०४/२००७ कोचिन

जी लेने दो


जी लेने दो

तुम ख़ुद को,
ख़ुदा कहो
ईसा कहो
पैग़म्बर या
अल्लाह कहो
तुम जो चाहो
जैसे चाहो, बनो
जिसे चाहो, चुप
या चिल्ला कर
पुकारो, बुलाओ,
आठों पहर आवाज़ दो
जन्नत की चाह में
जिओ कि मर जाओ
हमें कोई एतराज़ नहीं है

बस इस दुनिया को
दुनिया ही रहने दो
जहन्नुम न बनाओ

हमें, जय श्री राम
राम राम कहने दो
मर्यादाओं में क़ैद
मौन साधना में रत
मामूली इंसान रहने दो
स्वर्ग नरक सब तुम ले लो
हमें ये दुनिया प्रिय है
हमें इसी दुनिया में
प्यार मुहब्बत से
बस मरने तक,
जी लेने दो

-अजय मलिक 
चेन्नई 02-04-2020

एक बहुत पुरानी कविता - "अरे बुढ़ापे"


अरे बुढ़ापे 

अरे बुढ़ापे
कब आए तुम
जान न पाया
आज अचानक
देख आपको
बीता कल फिर
सम्मुख आया
और यही बस
मैंने पाया ...

लगा अचानक
जिसे कह रहे
...सपना कल का
झूठ नहीं था

तुम झूठे थे

मैंने कहा -
दिवास्वप्न क्या
मैंने देखा
बस इतना भर
सोच लिया था
आएगा तू
प्यार भरा सा
सत्य नाम की
लिए पताका

सोच लिया था
तू मेरा है
...हो जाएगा
नहीं जानता था
पर इतना
सपना मेरा
छल जाएगा

किया आज जो
तूने हंसकर
सपने में तो
कहीं नहीं था

मैंने देखा
पुनः अचानक।
तू भी वही
पुराना कल है
दिवास्वप्न
तू ही बस छल है

वह कल
जब मैंने था
तुझे शांत
सागर सा सोचा
...धोखा
धोखा ...

भाव हीन सा
निर्मल कोमल
वह कल बीता

सत्य वहीं था

आज कहूं क्या
मेरे जीवन
शब्द नहीं हैं

जिससे मिला
वही सपना था

होता न तो
हो जाता था
- शांत झील की
किसी लहर से
पंछी सा बन
उड़ जाता था
रह जाता था
वही अकेला
दूर सभी से दूर
उद्दिग्न,
आवेश भरा सा
नितांत अकेला;
मैं...

-पर कोमलता
तुझे बधाई
सदा मुझे
तूने ढक दाबा
साथ दिया न
घृणा का तूने

जिससे मिला
लगा अपना है
सब खो बैठा
इसी चाह में

आज लगा कि
सब सपना है
वह भी झूठा

सत्य कहाँ है
वह भी देखा
कब चाहा
लोगों ने मुझको
करता रहा
उसे अनदेखा

नकली चेहरे
हँसते देखे
मन का रोना
किसने देखा

... वासना;
कहाँ छुपाया तुझको
तेरी स्नेहिल सी; रेखा भी
बता तनिक तो

कभी किसी ने देखी!!

जितना अधिक
प्यार से बोला
सब ने उतना ही
मुख खोला

अधिक व्यंग
अत्यधिक दिलासा
सभी साज संग
भरे गीत
स्वरहीन
अदा से कहते
सुनले महत्त्वहीन
अनदेखे

मैंने यह भी
किया सुरक्षित

पास सभी
पहले से भी था
- जलते दिन
औ’ चलती लुएं
पाले भरी सुबह
कोहरे की चादर में
रात चांदनी

प्रतीक्षारत
सबके सब बंधित
ठूँठ वृक्ष

बसंती शाम
अकाल मृत्यु भी
रोते बच्चे
बिलखती माएँ
अणु बस से
जलती धरती
फटती चट्टानें
बहता मलवा
किसी शिकारी की
गोली से
घायल मृग शिशु
-और सभी कुछ

किंतु
एक आह सी
सदा खींचकर
इंतजार से
तुझे निहारा
दूर बहुत
जैसे कोई तारा
था तू ।

पर कितना पाखंडी

अरे पाखंडी
तेरी आहटें
हर आहट पर
उदास शाम के
साथ खड़ा तू
कितना भोला
दीख रहा था

सच,
तू प्यारा भी था
मुझको

पर तूने भी
किया वहीं क्यों?
जो जीवन भर
सहता आया
सालता आया

आह! आशा
तू क्यों आई थी
किसने तुझे
सुझाया
यह सब

अरे निराशा...
प्यार भरी
स्नेहिल छवि
कहां गई तू !

अरे मनीषा

भूल गया मैं
भटक गया मैं
रहा अकेला कभी नहीं
ना साथी ही
कोई मिला
मुझे

आए तो भी
चले गए सब
देकर साथ कुरेद
उसके संग
नए घाव
गहरे तीखे

कुछ पहले के
परत पलट कर
पुन: हराकर गए

नई दिवाली
पुराने दाने
सब वादों के
ताने-बाने

विरह वेदना
जो प्यारी थी
आज नहीं है

कहां कामना
कहां रूप अब
यौवन का वह
गर्व कहां अब

बन चिर साथी
साथ खड़े तुम 
झूठे...
कपटी ...

अरे बुढ़ापे !!

-अजय मलिक
१४-०१-१९८३
सायं ०३.०८