Apr 24, 2020

एक बहुत पुरानी कविता - "अरे बुढ़ापे"


अरे बुढ़ापे 

अरे बुढ़ापे
कब आए तुम
जान न पाया
आज अचानक
देख आपको
बीता कल फिर
सम्मुख आया
और यही बस
मैंने पाया ...

लगा अचानक
जिसे कह रहे
...सपना कल का
झूठ नहीं था

तुम झूठे थे

मैंने कहा -
दिवास्वप्न क्या
मैंने देखा
बस इतना भर
सोच लिया था
आएगा तू
प्यार भरा सा
सत्य नाम की
लिए पताका

सोच लिया था
तू मेरा है
...हो जाएगा
नहीं जानता था
पर इतना
सपना मेरा
छल जाएगा

किया आज जो
तूने हंसकर
सपने में तो
कहीं नहीं था

मैंने देखा
पुनः अचानक।
तू भी वही
पुराना कल है
दिवास्वप्न
तू ही बस छल है

वह कल
जब मैंने था
तुझे शांत
सागर सा सोचा
...धोखा
धोखा ...

भाव हीन सा
निर्मल कोमल
वह कल बीता

सत्य वहीं था

आज कहूं क्या
मेरे जीवन
शब्द नहीं हैं

जिससे मिला
वही सपना था

होता न तो
हो जाता था
- शांत झील की
किसी लहर से
पंछी सा बन
उड़ जाता था
रह जाता था
वही अकेला
दूर सभी से दूर
उद्दिग्न,
आवेश भरा सा
नितांत अकेला;
मैं...

-पर कोमलता
तुझे बधाई
सदा मुझे
तूने ढक दाबा
साथ दिया न
घृणा का तूने

जिससे मिला
लगा अपना है
सब खो बैठा
इसी चाह में

आज लगा कि
सब सपना है
वह भी झूठा

सत्य कहाँ है
वह भी देखा
कब चाहा
लोगों ने मुझको
करता रहा
उसे अनदेखा

नकली चेहरे
हँसते देखे
मन का रोना
किसने देखा

... वासना;
कहाँ छुपाया तुझको
तेरी स्नेहिल सी; रेखा भी
बता तनिक तो

कभी किसी ने देखी!!

जितना अधिक
प्यार से बोला
सब ने उतना ही
मुख खोला

अधिक व्यंग
अत्यधिक दिलासा
सभी साज संग
भरे गीत
स्वरहीन
अदा से कहते
सुनले महत्त्वहीन
अनदेखे

मैंने यह भी
किया सुरक्षित

पास सभी
पहले से भी था
- जलते दिन
चलती लुएं
पाले भरी सुबह
कोहरे की चादर में
रात चांदनी

प्रतीक्षारत
सबके सब बंधित
ठूँठ वृक्ष

बसंती शाम
अकाल मृत्यु भी
रोते बच्चे
बिलखती माएँ
अणु बस से
जलती धरती
फटती चट्टानें
बहता मलवा
किसी शिकारी की
गोली से
घायल मृग शिशु
-और सभी कुछ

किंतु
एक आह सी
सदा खींचकर
इंतजार से
तुझे निहारा
दूर बहुत
जैसे कोई तारा
था तू ।

पर कितना पाखंडी

अरे पाखंडी
तेरी आहटें
हर आहट पर
उदास शाम के
साथ खड़ा तू
कितना भोला
दीख रहा था

सच,
तू प्यारा भी था
मुझको

पर तूने भी
किया वहीं क्यों?
जो जीवन भर
सहता आया
सालता आया

आह! आशा
तू क्यों आई थी
किसने तुझे
सुझाया
यह सब

अरे निराशा...
प्यार भरी
स्नेहिल छवि
कहां गई तू !

अरे मनीषा

भूल गया मैं
भटक गया मैं
रहा अकेला कभी नहीं
ना साथी ही
कोई मिला
मुझे

आए तो भी
चले गए सब
देकर साथ कुरेद
उसके संग
नए घाव
गहरे तीखे

कुछ पहले के
परत पलट कर
पुन: हराकर गए

नई दिवाली
पुराने दाने
सब वादों के
ताने-बाने

विरह वेदना
जो प्यारी थी
आज नहीं है

कहां कामना
कहां रूप अब
यौवन का वह
गर्व कहां अब

बन चिर साथी
साथ खड़े तुम 
झूठे...
कपटी ...

अरे बुढ़ापे !!

-अजय मलिक
१४-०१-१९८३
सायं ०३.०८


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वार्षिक कार्यक्रम 2020-21

राजभाषा विभाग द्वारा वर्ष 2020-21 के लिए जारी वार्षिक कार्यक्रम का लिंक नीचे दिया जा रहा है-


(राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार की साइट से साभार)

Sep 15, 2019

हिंदी दिवस २०१९ वेबकास्ट

https://webcast.gov.in/hindi-diwas/ 

Aug 29, 2019

मित्रों की मांग पर "राजभाषा अधिनियम 1963 मूल रूप में "

कई अभिन्न मित्रों ने राजभाषा अधिनियम के मूल पाठ के प्रति जिज्ञासा प्रकट की है। उनकी मांग पर भारत के राजपत्र में 11 मई 1963 को प्रकाशित राजभाषा अधिनियम का मूल पाठ नीचे दिया जा रहा है।
- प्रतिभा मलिक


Aug 26, 2019

हारा नहीं...हारने वालो...और कभी न...मैं हारूँगा...तुम हारोगे।

हारा नहीं
हारने वालो
और कभी न
मैं हारूँगा

तुम हारोगे

घर में घुसकर
ग़द्दारों को
फिर मारूँगा

बस थोड़ा सा
थका हुआ हूँ

भारत भर में
जल नभ थल में
जन जन के
दिल ओ दिमाग़ में
हर सीने के
हर इक राग में
पलकों तक में
बसा हुआ हूँ

शांत नही, बस
चुप बैठा हूँ
बिके हुए
कायर गुर्गों से
लेशमात्र
आक्रांत नहीं हूँ

शांत नहीं हूँ

पल भर का
विश्राम मात्र है

फिर मेरी
हुंकार देखना
दुष्टों का
संहार देखना

गला फाड़ कर
और चार दिन
चोर चोर का
शोर मचा लो
हो हा कर लो
हंस लो गा लो
खा लो पी लो
और चार दिन

बाँग लगालो

बरसाती मेंढक
की मानिंद
टर टर कर लो

फिर शिवाजी
संग्राम देखना
राणा की
तलवार देखना

नहीं मात्र नर
मैं नरेंद्र हूँ
दामोदर हूँ
माँ भारती का
मैं चाकर
मैं सुरेंद्र हूँ
मैं योगी हूँ
लाल कृष्ण हूँ
सदा अटल हूँ
गोलवलकर हूँ
मैं सावरकर
भगत सिंह हूँ
सुखदेव हूँ
मैं बिस्मिल हूँ
गंगा माँ का
राजदुलारा
भारत के
जन जन का
प्यारा, कभी न हारा

मैं शतरंज का
बादशाह हूँ
तुम प्यादों को
पता नहीं है
मैं पटेल हूँ
निर्विवाद हूँ
आज़ाद हूँ
जयहिंद का
मैं सुभाष हूँ

तुम लोदी के
वंशज भर हो

जन जन
दुख की
गाज गिराती
एक ढीली सी
गठरी भर हो

भेड़ चाल हो
बकरी भर हो

सच को समझो
पहचान लो
‘पाक’ साफ़ है
यह जान लो
आज इसी पल
हार मान लो

भारत माँ के
चरणों में नत
मैं बोधी हूँ

सपने में भी
भूल न जाना
मैं ...दी हूँ

-अजय
19/05/2019
प्रात: 10.30

बुरे या बुरे से लगते लोग ...कैसे अच्छे लोगों तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं ...

एक और लंबे अंतराल के बाद ...किसी दूसरे और भी अधिक लंबे अंतराल के लिए ।  क्या लिखूँ ... यादें , जिनकी कोई थाह ही नहीं है! जीवन के 58 साल ... लगते जरूर हैं कि यूं ही बीत गए ... सच तो बिलकुल ही अलग है, यूं ही बीतते लगते हुए भी काफी लंबे-लंबे दिनों, बड़ी-बड़ी घुप अंधेरी रातों के साथ बीते। अभी भी सब कुछ सरल नहीं है, पर अब आदत पड़ गई है। ...खुद को व्यस्त रखना और समय को गुजार देना याकि समय का अपने सतत प्रवाह के साथ खुद ही गुजर जाना !
लोगों के कितने रूप...अपने आप से शायद वे भी तो सवाल करते होंगे ! शायद जीने के लिए एक दूसरे से बेपरवाह होकर निज स्वार्थ तक सीमित हो जाना ही दुनिया का चलन होगा ! जिन्हें हम मित्र मानते हैं, वे हमें कितना और क्या मानते हैं, ये सोचने की आवश्यकता ही क्यूँ होनी चाहिए भला !
अपने कर्तव्य का ...नौकरी से जुड़े हुए याकि एक नागरिक के नाते या फिर सिर्फ एक इंसान ...आदमी के नाते, अपनी आत्मा या विवेक के सहारे जिसमें दूसरे के अहित से बचने का भाव शामिल हो, मन मलिन महसूस न करे.... पूरी निष्ठा के साथ निर्वाह करते जाना और जीवन जी लेना, इतना कुछ कम तो नहीं !
जीवन के बाद क्या है? कुछ है भी कि नहीं? हो भी तो क्या? इस सब का कोई अर्थ कहीं नज़र नहीं आता। बड़ा अजीब है आदमी... क्या और क्यूँ करता है, कुछ पता नहीं चलता , लेकिन हर बात के लिए तर्क देते चले जाना उसकी फितरत है शायद....
आरोप जैसे कुछ थे 1997 में, आरोप थे और सिर्फ आरोपित भर थे। फिर ये ही क्रम 2007 में दोहराया गया। आरोप बस आरोपित ही साबित होकर रह गए। आगे फिर लगे और मैं फिर लड़ा...फिर आरोप लगाने वाले बेशर्मी से  हों हों कर हंस दिए... इतना ही था उनका जीवन ...
ईश्वर की कृपा का कोई अंत नहीं। वह जीने का संबल हमेशा देता है। गिरने से पहले संभाल कर, फिर से प्रवाह में धकेलता है और मुस्करा कर गायब हो जाता है, अगले गिराव के पड़ाव तक...मैं निराश होकर जब फिर चकराने लगता हूँ तो फिर किसी न किसी रूप में प्रकट हो जाता है ... संभाल लेता है।
कुछ लोगों की नकारात्मक सोच हमें कितना सकारात्मक साबित कर जाती है, इसका प्रमाण हैं-  पिछले 5-6 वर्ष। बुरे या बुरे से लगते लोग ...कैसे अच्छे लोगों तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं ...यह भी एक रहस्य सा ही है...          

Sep 10, 2018

हिन्दी दिवस, 2018 के अवसर पर जारी माननीय गृह मंत्री, भारत का संदेश


Jul 10, 2018

भारतीय भाषाओं के भविष्य को लेकर चिंतित होने की आवश्यकता है।

जनगणना के आंकड़ों के अनुसार  पिछले 10 वर्षों में हिन्दी को मातृभाषा मानने वालों  की संख्या 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हिन्दी के अतिरिक्त केवल तीन ही अन्य भाषाएँ क्रमश: गुजराती, कश्मीरी और मणिपुरी हैं जिनके बोलने वालों की संख्या मामूली तौर पर बढ़ी है। यह घबराहट का विषय है कि तमिल, मलयालम जैसी समृद्ध भाषाओं के बोलने वालों का प्रतिशत घटा है। हमें भारतीय भाषाओं के भविष्य को लेकर चिंतित होने की आवश्यकता है।  
  

सौजन्य : जनगणना निदेशालय

Mar 31, 2018

आपका मनचाहा कुंजीपटल और बहुत सारे कुंजीपटल- आजमाइए तो सही

       कुछ मित्रों की मांग पर एक बार फिर से हम बेहद सरल ढंग से यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि आप अपने कंप्यूटर में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को बिना किसी अतिरिक्त व्यय के कैसे सक्रिय करें तथा कैसे मन चाहा कुंजी पटल रेडीमेड अथवा स्वनिर्मित प्रयोग में लाएँ।

Mar 27, 2018

लिखना लगभग छूट सा गया है। इस बार राजभाषा विभाग का वार्षिक कार्यक्रम भी नहीं डाला। मन उदास है। बहुत उदास...

Jul 8, 2017

लंबा अंतराल 😂बहुत दिन बीत गए 😃कुछ भी नहीं लिखा गया 😊पहले सोचा था, लगातार लिखा करेंगे लेकिन 8 साल के भीतर हालत यह हो गई है कि शायद पिछले 8 महीने में कुछ नहीं लिखा जा सका...

Dec 27, 2016

तुझे याद है, भूल गया मैं !

मेरे कविता संग्रह "कोई हँसी बेचने आया था" की तीसरी महत्वपूर्ण रचना प्रस्तुत है-

तुझे याद है
भूल गया मैं !


तेरी आँखों का
निर्मल जल
हरदम हँसता
वो कोमल मन
अरे सलोनी
क्या कहती थी-
घास फूँस
मिट्टी सा जीवन !


मन में पर्वत
धँसा लिया था
अटल चेतना
खूँटे जैसी
कण कण
तुझको
बसा लिया था
तुझे याद है
भूल गया मैं !


पल पल
धरती घूम रही है
हर चक्कर पर
झूम रही है
अपना भी
चक्कर आएगा
किसे पता है
इस दुनिया में
कौन कहाँ कब
रह जाएगा !
तुझे याद है
भूल गया मैं !


यह काया तो
धरी धरा संग
मन परवश
यह चिर यौवन
पर्वत को भी
पिघलाएगा
और अचानक
उड़ जाएगा
जब तक
धरती को भाएगा
कहीं दूर
किस ग्रह के
तल में
फिर चेतन हो
मुसकाएगा


तेरी यादें
तेरे संग हैं
तेरे सपने
मेरी यादें
तेरे संग हैं
मेरे सपने
बस तब तक
जब तक हम
इस धरती पर हैं


तुझे याद है
भूल गया मैं !
मुझे याद है
भूल गया मैं !

- अजय मलिक (c)

जो सुख मिले


अज्ञेय जी की उपर्युक्त कविता पर आधारित कुछ पंक्तियाँ

जो सुख मिले
वो कह दिये
जो दुख मिले
वो भी कहे
और सह लिये


हर स्निग्ध अनुभूति के
हरेक स्पर्श को
हमने जिया
हर नदी के
संग संग

बह लिए

आधे थे और
अधूरे ही रहे
यों बीते दिन
बीते, पर हम
सदा रीते ही 

रह लिए

न चाहकर भी
अनचाहे बने
पर मिट न सके
कभी किसी भी
आँख में हम
टिक न सके


सागर तट
की चाह में
हम बेबस
बरसों बरस
जिये, ज़ख्म
सह लिए

 
-अजय मलिक (c)

आने दे कुछ याद उसे भी

कविता संग्रह "कोई हँसी बेचने आया था..." की दूसरी प्रमुख कविता

आने दे कुछ याद उसे भी
मन वैरागी रोना छोड़
कौन तेरा वो अपना मन है

उसका मन है उसकी ताने
क्यों रूंठा है वो ही जाने
अपना तो दिल साफ़ सुबह सा
रात विरह की फिर बीतेगी
निकलेगा हर तह का तोड़

मन वैरागी रोना छोड़
आने दे कुछ याद उसे भी

सबकी क़िस्मत लिखी हुई है
चौपड़ पग पग बिछी हुई है
हार जीत दोनों संग आते
जिसको जो मिलना वो पाते
तू क़िस्मत का तकना छोड़

मन वैरागी रोना छोड़
आने दे कुछ याद उसे भी

अगर साज सचमुच सच्चा है
सरगम से क्या घबराएगा
पत्थर दिल धड़केगा कैसे
तन भी पत्थर हो जाएगा
एक तार बस फिर से जोड़

मन वैरागी रोना छोड़
आने दे कुछ याद उसे भी
कौन तेरा वो अपना मन है

-अजय मलिक (c)

Dec 25, 2016

कोई हँसी बेचने आया था...

मित्रों, इस कविता को पूरा करने के प्रयास में लगभग बत्तीस महीने लग चुके हैं। यह मेरे कविता संग्रह "कोई हँसी बेचने आया था" की शीर्षक कविता होगी । कृपया पसंद आए तो आशीर्वाद दें। ...
-अजय मलिक

कोई हँसी बेचने आया था
और दर्द थमाकर चला गया
जीने की तमन्ना थी हमको
वो मौत थमाकर चला गया

कुछ दूर चला बहलाने को
फिर दिशा बदल ली जाने को
देकर सपने, जन्नत दिखला
ख़ुदगर्ज़, सताकर चला गया

लिख हर पत्ते पर नाम अपना
टूटे दिल का बनकर सपना 
कुछ पल संग में हँसकर गाकर
तकलीफ़ बढ़ाकर चला गया

कट जाती थीं शामें वीरानी
पी लेते थे चुप हर नाकामी
कर चकाचौंध, महफ़िल सुलगा
वो जाम चुराकर चला गया

हमने जब सीना चाक किया
उसकी ख़ातिर सब ख़ाक किया 
तब वो पत्थर दिल चाँद मेरा 
घुप रात थमाकर चला गया

कोई हँसी बेचने आया था
और दर्द थमाकर चला गया

अजय मलिक (c)

Dec 22, 2016

अक्तूबर से दिसंबर तक 2016

अक्तूबर 2016 में चेन्नई से आया था । कई मित्रों से मिलना संभव नहीं हो सका था। कुछ बेहद व्यस्त थे और मिल पाने में असमर्थ थे । अक्तूबर 2016 दुबारा नहीं आएगा और आना चाहिए भी नहीं क्योंकि यह उतना प्रीतिकर...उतना सुकून भरा नहीं था, जितना इसे होना चाहिए था । कोलकाता आकर एक अंधी गली की कभी न खत्म होने वाली दौड़ में शामिल हो गया । दिवाली पर शायद पहली बार हमारे बच्चे अकेले रहे । मैं कोलकाता में, पत्नी गाजियाबाद में, बेटी हॉस्टल में और बेटा चेन्नई के घर में। बहुत कम लोगों को शुभकामना संदेश भेजे... और मिले उनसे भी कम । कुछ ऐसे मित्र जो कभी नहीं भूलते थे वे भी भूल गए ।
खुद को काम में डुबा देने के सिवाय दूसरा कोई चारा भी न था। सिर पर काम आया भी इतना था कि कल्पना नहीं की जा सकती। पच्चीस शहरों में अस्सी निरीक्षण और दिन सिर्फ पाँच जो बढ़कर नौ हो गए थे। नवंबर की शुरुआत दुखद रही ...यहाँ भी कल्पना से परे कुछ ऐसा घटित हुआ कि स्वास्थ्य पर असर डाल गया। किसी भी स्थिति में रक्तचाप से बचा रहने वाला आदमी अचानक उच्च रक्तचाप का शिकार हो गया। मन हुआ कि सब छोड़-छाड़ कर वापस चेन्नई लौटा जाए। 16 नवंबर तक चक्कर खाते सिर के साथ घूमता रहा और मन के बिना यानी बेमन से...
1986 में हिन्दी आंदोलन से जब पूरी तरह जुडा था तब कभी पछतावा होगा यह नहीं सोचा था मगर नवम्बर 2016 में वे दिन याद आए जब पहली बार राजभाषा कार्यान्वयन में आया था...तीस साल बाद मुझे लगा कि मैं हार गया हूँ ... दुनिया से, हिन्दी वालों से, अपने मन से और तन से भी ...
मैं सिवाय समय के किसी को दोष नहीं देना चाहता मगर यदि ऐसे ही चलता रहा तो सब समाप्त हो जाएगा...अपनी भाषाएँ हम बचा नहीं पाएंगे।
बच्चों के जन्मदिन एक से तीस नवंबर के बीच पड़ते हैं ... इस बरस पहली बार बच्चों के जन्मदिन पर माता-पिता साथ नहीं रहे।
दिसंबर तो दिल दहला देने वाला निकला... चेन्नई के ऐसे-ऐसे दरख्त ढह गए, जिनके कभी हिलने की भी संभावना नहीं थी। तूफान ने सब लील लिया। कई बार कोई संदेश तक नहीं मिला... तूफानी हवाएँ अनेक शीशे के शामियाने उड़ा ले गईं...  कुछ स्टील के स्तंभ जिनकी नींव बेहद पुख्ता थी वे भी उखड़ गए। मन, जब टूटने पर आया तो टूटता ही चला गया, सब कुछ बिखर सा गया।
ये दिसंबर भी बीत ही जाएगा... बस इतना ही कहूँगा कि वर्ष 2016 एक घाव सा दे गया । भरोसा कई जगह से टूटा । 2017 की शुरुआत चेन्नई से करूंगा...कुछ साँसे फिर सँजोऊंगा , शायद कोई रास्ता निकले ।
बार बार लगता है कि नौकरी की यात्रा के थमने का वक्त आ गया है।
-अजय मलिक          

तू रुख़ बदल ...

तू रुख़ बदल
राहें बदल
मन की सब
चाहें बदल
 
दुनिया बदल
नज़रें बदल
तेवर बदल
बिछुए बदल
ज़ेवर बदल
 
ये भी बदल
वो भी बदल
जो भी बदल
जमकर बदल
सब कुछ बदल
 
पर ना बदल
चुपचाप यूं
 
कहकर बदल
खुलकर बदल
मिलकर बदल
 
मुझको बदल
खुद को बदल  
                                                                                     -अजय मलिक (c)

Dec 21, 2016

एक लघु कथा - "बैंच"

बैंच

                    -अजय मलिक (c) 


अस्सी साल की उम्र कम नहीं होती और वह हँसते -हँसते कब पचासी पार कर गई, पता ही नहीं चला। हर सुबह पार्क की इसी बैंच पर आकर घंटों बैठ कर वह चलती-फिरती ज़िंदगी को देखती रहती है। बैंच भी उसी की तरह बुढ़ा गई है मगर उसके चेहरे की तरह झुर्रियां नहीं आई हैं। बैंच घिसकर चमकने लगी है, वह होले से बैंच के चिकनेपन को महसूस करने के लिए खुरदुरी सूखी अंगुलियों से सहलाती है।

दस साल हो गए पति को गुज़रे। तब कभी-कभी दोनों इस बैंच पर आकर बैठते थे, तब अंगुलियों में इतना खुरदरापन नहीं था। पति ने कभी उन अंगुलियों पर ध्यान नहीं दिया। उसने कभी इसकी शिकायत भी नहीं की। चालीस बरस पहले किसी ने कहा था-तुम्हारी ये कोमल अंगुलियाँ कितनी सुंदर हैं, हमेशा हँसती रहती हैं। तब से वह ख़ुद भी हँसने लगी। एक दिन हँसते -हँसते वह बोल पड़ी- अगला जन्म तुम्हें सौंपती हूँ, इस जन्म का हिसाब तो औरों ने कर दिया...अब बाकी कुछ भी नहीं है।

जाने क्यों वह जीना नहीं चाहता था और अगले जन्म की भी चाह नहीं रखता था। उसकी अंगुलियों के हँसने का राज बताकर चुपके से बहुत जल्दी चला गया। पति को कभी उसके हँसने का रहस्य पता नहीं चल सका।

वह अभी भी जीते रहना चाहती है दो जन्मों के बराबर। उसे उन दोनों के लिए इसी जन्म में जी लेना होगा। हँसते-हँसते उसका अन्तर्मन कितना चिकना हो गया है, ठीक इस बैंच की तरह। हँसी की इस चादर पर कोई दुख नहीं ठहरता...

 

Oct 3, 2016

बहुत दिन बीते ...

जुलाई 2009 की 26 तारीख को बीते लंबा समय गुजर गया। 'हिन्दी सबके लिए' के सफर का आठवाँ साल शुरू हो गया । लिखना पढ़ना काफी कम हो गया। हिन्दी के नाम पर तकनीकी स्तर पर भी लगभग स्थिरता छाई है। मुझे नहीं लग रहा है कि कहीं कुछ नया हो रहा है। अब हमें इनस्क्रिप्ट कुंजी पटल पर अधिक ध्यान देना चाहिए। जो नए हैं और हिन्दी टाइपिंग सीखना चाहते हैं उन्हें इनस्क्रिप्ट पर सीखना चाहिए, तभी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं का का कुछ भला हो सकता है। 
भारतीय भाषाओं के मशीनी अनुवाद और आवाज से पाठ यानी स्पीच टू टेक्स्ट पर ठोस काम होना चाहिए। हिन्दी या देवनागरी में प्रोग्रामिंग की पूछ तो शायद ही हो मगर वर्तमान उपलब्ध साधनों को कैसे भारतीय भाषाओं के प्रयोग के लिए और बेहतर बनाया जाए इस पर चिंतन होना चाहिए।
संवैधानिक स्तर पर अनुच्छेद 351 हिन्दी को जन-जन की भाषा बनाने का पक्षधर है और वह हिन्दी हिंगलिश कदापि नहीं हो सकती है। संविधान हिन्दी में अङ्ग्रेज़ी शब्दों के घालमेल की इजाज़त नहीं देता। यदि भाषाओं के मामले में कुछ और समय राजनीति चली तो कोई भी भारतीय भाषा जिंदा नहीं बचेगी। अब समय आ गया है जब भारतीय भाषाओं पर जानबूझकर अँग्रेजी लादने को अपराध घोषित किया जाए।  
हमें अपनी भाषाओं के मामले में अब संभलना ही होगा। भारतीय भाषाओं को नौकरी से अँग्रेजी की तरह जोड़े बिना जनता की मानसिकता को बदलना संभव नहीं है।
-अजय
  

Aug 21, 2016

माइक्रोसॉफ़्ट ऑफिस 2016 के साथ स्थापित करें हिन्दी वर्तनी शोधक

माइक्रोसॉफ़्ट ऑफिस 2016 के साथ स्थापित करने के लिए माइक्रोसॉफ़्ट द्वारा बेहतरीन  हिन्दी वर्तनी शोधक भी उपलब्ध कराया गया है। इसमें अँग्रेजी वर्तनी शोधक जैसी लगभग सभी सुविधाएं हैं। यह वर्ड और पावर पॉइंट दोनों मेन काम करता है। हिंदी पर्यायवाची शब्दों का भी अच्छा भंडार है। ऑफिस 2016 में अनेक अन्य सुविधाओं के साथ ऑफिस 2013 की सभी खूबियाँ हैं। पीडीएफ़ को सम्पादन योग्य वर्ड दस्तावेज़ में सेव करने की सुविधा है। पिक्चर मैनेजर यहाँ भी गायब है।

Jun 18, 2016

गूगल हिंदी वॉइस टाइपिंग का मज़ा ....अब ऑफलाइन भी उपलब्ध है।

लीजिए जनाब आपकी सारी मुश्किलों का हल मिल गया है। अब हिंदी वॉइस टाइपिंग ऑफलाइन भी उपलब्ध है ।
यह सुविधा एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम वाले सभी मोबाइल फोनों पर उपलब्ध है । आपको केवल अपने फोन की सेटिंग में जाकर लैंग्वेज एवं इनपुट को क्लिक करना है और उसमें ऑफलाइन वॉइस टाइपिंग को सेलेक्ट करना है। उसके बाद हिंदी भाषा को भी चुन लेना है। आपका फोन करीब तेरे 14 mb की फाइल्स को डाउनलोड करेगा और उसके बाद उसे इंस्टॉल करने के लिए करीब 30 mb की जगह चाहिए। बस हो गई आपकी बल्ले-बल्ले। इससे अगर किसी हिंदी आशुलिपिक या हिंदी टंकक की नौकरी पर बन जाए मेरा मतलब किसी की नौकरी खतरे में पड़ जाए तो  कृपया मुझे दोष मत दीजिएगा । न ही google इसके लिए दोषी ठहराया जाएगा ।
"जय राम जी  की"

May 11, 2016

राजभाषा संबंधी रिपोर्टिंग प्रणाली

मण्डल कार्यालय और उससे बड़े कार्यालयों से समेकित रिपोर्ट यानी सभी अधीनस्थ कार्यालयों की रिपोर्ट के आंकड़ों को मिलाकर तैयार की गई रिपोर्ट ही भेजी जानी चाहिए / अपलोड होनी चाहिए। 

राजभाषा नीति मुख्य बिंदु



विभिन्न समितियाँ


जाँच बिंदु


आवश्यक आदेश : work originally in Hindi.. "English version will follow"


Apr 25, 2016

सूचना प्रौद्योगिकी और राजभाषा कार्यान्वयन









Apr 13, 2016

हिंदी टाइपिंग सीखने के कुछ सोफ्टवेयर्स और ऑनलाइन हिंदी टंकण गति के परीक्षण

बहुत दिन बाद फिर से मुखातिब हूँ। कुछ लिंक्स यहाँ दिए जा रहे हैं जो इनस्क्रिप्ट हिंदी टंकण सॉफ्टवेयर्स से संबन्धित हैं तथा कुछ ऑनलाइन हिंदी टंकण की गति परखने के उपकरणों के हैं। कई कार्यालय हिंदी टाइपिंग टेस्ट के लिए विशेषज्ञों के लिए परेशान रहते हैं उनके लिए ये सामग्री उपयोगी हो सकती है-


हिंदी टाइपिंग ट्यूटर -
ऑन लाइन हिंदी टाइपिंग टेस्ट -