Sep 4, 2009

मेरे गुरु...6 - सज्जनता के सदर

प्रोफेसर कादरी साहब

-अजय मलिक
केंद्रीय विश्वविद्यालय "जामिया मिल्लिया इस्लामिया" नई दिल्ली तक पहुँचने का किस्सा बड़ा ही दिलचस्प है। सोनीपत के एक प्राइवेट स्कूल में विज्ञान अध्यापक की नौकरी लगी। पास के ही एक बड़े हाई स्कूल में हिंदी-संस्कृत के अध्यापक थे डॉ0 टी0 के0 शर्मा यानी त्रिभुवन कान्त शर्मा... उनकी पत्नी डॉ श्रीमती शर्मा भी उसी स्कूल के प्राइमरी सेक्शन में अध्यापक थीं। उन दोनों का यह अज्ञातवास था।

टी. के. शर्मा जी सीआईई यानी केंद्रीय शिक्षा संस्थान से एम एड कर चुके थे और जामिया से मनोविज्ञान में पीएच डी कर रहे थे। उनसे दोस्ती कैसे हुई यह तो स्वयं आज तक मेरी समझ में नहीं आया।

हम दोनों अक्सर सप्ताहांत में शाम को मिलते और दिमागी घोड़े दौड़ाते। अक्सर हमारी चर्चा शिक्षा या मनोविज्ञान को लेकर शुरू होती। मुझे एम एड करने की बड़ी इच्छा थी । असल में मैं मनोविज्ञान का गहन अध्ययन करना चाहता था और इसके लिए जाने क्यों मुझे एम एड ज्यादा सही लगता था।
शर्मा जी ने कहा-"पार्ट टाइम भी कर सकते हो मगर दो साल लगेंगे और मज़ा नहीं आएगा। नौकरी की लालसा छोड़ दो...मन जो कहता है कर डालो।"

मन तो बहुत कुछ कहता था...लेकिन रास्ता कुछ सुझाई नहीं देता था। शर्मा जी ने फिर एक दिन रास्ता बताया- "कहीं से सिर्फ दो सौ रूपए महीने का जुगाड़ करो और दाखिला ले लो।" उन्होंने सी आई ई की प्रवेश प्रक्रिया समझाई और प्रोफेसर दत्ता का संदर्भ दिया। मैंने फॉर्म भर दिया और लिखित प्रवेश परीक्षा के लिए निश्चित दिन सी आई ई जा पंहुचा।

उस समय दस पैसे की एक बालपेन रिफिल आया करती थी। कभी भी चलते-चलते बंद हो जाने की गारंटी वाली ऐसी ही रिफिल के साथ मैंने प्रवेश परीक्षा में लिखना शुरू किया। दो पक्तियां लिखने के बाद ही रिफिल ने अपना वादा निभा दिया और उसके बाद चाँद-सितारे तो डोले मगर रिफिल का रोलर नहीं डोला। अब क्या किया जाए? नज़रें आगे-पीछे, दाएं-बाएँ...सब और घुमाईं मगर हर तरफ सिर्फ लड़कियाँ नज़र आईं। गाँव- देहात का गंवार-देहाती शहरी लड़कियों से कलम के बारे में कैसे पूछे !!

थक-हारकर बिना कुछ लिखे ही कॉपी लौटा दी गई। दोपहर बाद इंटरव्यू के समय प्रोफेसर दत्ता ने पूछा- आपने तो कुछ भी नहीं लिखा ?? मैंने रिफ़िल की रफ़्तार टूटने का किस्सा बयान किया तो उन्होंने हंसते हुए कहा- आपने बताया होता तो एक क्या पचास पेन आपको उपलब्ध कराए जा सकते थे।

वहां से निराश लौटा तो फिर शर्मा जी की शरण स्थली में आगे की राह तलाशने का काम शुरू हुआ। पंद्रह दिन बाद ही जामिया के शिक्षा विभाग का विज्ञापन आया और इस बार मैं दो-तीन पेनों के साथ पहुंचा। किस्मत देखिए कि एक माह के अंदर ही मैं एम एड का विद्यार्थी बन चुका था और मैरिट में पहले तीन को मिलने वाले वज़िफ़े के साथ...

जामिया के शिक्षा विभाग में प्रोफेसर कादरी साहब शिक्षा शास्त्र पढ़ाते थे। वे पक्के गांधीवादी सच्चे गुरु थे और बेहद नेक इंसान भी। इतना सरल स्वभाव की सरलता शरमा जाए। उन्हींने सदैव यही जानने का प्रयास किया कि हम लोगों ने कितना सीखा , -कितना नहीं सीख पाए इसकी कोई चिंता वे नहीं करते थे।

आंतरिक मूल्यांकन के लिए उन्होंने एक टेस्ट लिया। एक हमारे मित्र जो एक सरकारी स्कूल में प्राथमिक शिक्षक थे तथा पार्ट टाइम एम एड कर रहे थे, की अंग्रेजी कुछ ज्यादा ही कमजोर थी। मित्रवर बड़े ही मस्तमौला किस्म के इंसान थे उन्होंने टेस्ट अपनी बेहद निजी अंग्रेजी में लिख दिया।

प्रोफेसर कादरी कई दिन तक हमारे मित्रवर की लिखी बेहद निजी अंग्रेजी को पढ़ने-समझने की कोशिश करते रहे ताकि जैसे भी हो उन्हें पास होने लायक नंबर दिए जा सकें मगर मित्रवर की अंग्रेजी खालिश देशी जो पढ़े-लिखों की समझ में ज़रा कम ही आती थी । थक-हार कर चौथे दिन कादरी साहब ने हमारे मित्रवर को अपने केबिन में बुलाकर बड़े ही सहज भाव से कहा- "आप ज़रा इसे पढ़ कर सुना दीजिए ताकि मैं नंबर दे सकूँ।"

मित्रवर मुस्कराए और बोले - "गुरु जी, आपने अंग्रेज़ी में टेस्ट में लिखने के लिए कहा, -मैंने लिख दिया। अब इसे पढ़ने का काम आपका है। मैं अपनी लिखी अंग्रेजी नहीं पढ़ सकता ।"

मुझे यह किस्सा उन्हीं मित्रवर की जुबानी सुनने को मिला और यह भी कि उन्होंने टेस्ट में कुछ लिखा ही नहीं था बल्कि ऊपर की पंक्ति से पेन गोल-गोल चलाना शुरू किया था और कागज़ के निचले छोर पर ही रुके थे।

कादरी साहब ने यह किस्सा कभी किसी को नहीं बताया, वे अपने हर छात्र के हालात और मज़बूरियों को समझते थे।

ऐसे गुरुवार को सलाम ।

Sep 3, 2009

मेरे गुरु...5 : फिल्मों के ब्रह्मांड-कोश

श्री पी0 के0 नायर
-अजय मलिक
'या जुल -जुलाल, आई बला को टाल " -बस इतना भर बोलने की ही भूमिका मिली थी मुझे। सातवीं या आठवीं में पढ़ता था...महाराणा प्रताप का कोई नाटक था। फिर अभिनेता बनने की सनक चढ़ी। एक पंचसितारा होटल में किसी फिल्म की कास्टिंग का विज्ञापन छपा था। मैं भी पहुँच गया -इंटरव्यू या ऑडिशन के लिए। कुल चार-पांच लोग इंतज़ार करते मिले। मेरा नंबर आया। अन्दर जाकर देखा- तीन लोग थे चयनकर्ता ।
उन्होंने पूछा '-ज़रा अभिनय करके दिखाओ।'
मैंने दिखा दिया और ऐसा अभिनय किया कि चयनकर्ताओं से मुस्कान रोके न रुकी। वो हाथ-पैर मटकाए कि क्या कहने। अच्छा हुआ कि उन्होंने धक्के देकर नहीं निकाला। एक्टर बनने का भूत फिर भी नहीं उतरा।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से फॉर्म मँगा लिया। फॉर्म भरकर स्वयं जमा करने गया...वहां की साज-सज्जा में खो गया। किशोरावस्था का अपना अलग ही नशा होता है।
दशकों बाद फिर एक दिन फिल्म एवं दूरदर्शन संस्थान, पुणे से दाखिले का पत्र मिला। फिल्म रसास्वादन कोर्स के लिए जब वहां गया तो मानों जन्नत पा ली। वह बोधि-वृक्ष देखा जिसके नीचे ऋत्विक घटक कक्षाएं चलाया करते थे. जाने कितने विद्यार्थी उसकी छाया में सोते रहते...इस आशा में कि शायद ऋत्विक घटक की आत्मा का आर्शीवाद उन्हें भी मिल जाए और वे भी उन जैसे महान फिल्मकार बन जाएं।
पाँच-छः सप्ताह में सौ-सवा सौ से ज्यादा लघु-वृत्त-कथा फिल्में देखीं गईं। सुबह नौ बजे से शाम साढ़े पाँच तक व्याख्यान होते और उसके बाद रात ग्यारह- बारह बजे तक फिल्म संग्रहालय के थियेटर में फिल्मों का प्रदर्शन होता,चर्चाएँ चलतीं। कोई छुट्टी नहीं होती थी ...शनिवार-रविवार को भी नहीं। अनेक फिल्मकारों के भी व्याखान हुए। महान फिल्मकार मृणाल सेन जी से प्रमाण-पत्र मिला।
इस दौरान हमें सबसे ज्यादा चिंता रहती थी श्री पी0 के0 नायर जी के व्याख्यान की। उनके व्याख्यान का अधिकाँश भाग मेरे सिर के ऊपर से निकल जाता। आप सोचेंगे उनके व्याख्यान में कोई कमी होगी !! मगर बात बिलकुल उलटी थी। हम ही आधे-अधूरे-चौथाई जैसे कुछ थे और श्री पी0 के0 नायर का मतलब फिल्मों के चलते-फिरते ब्रह्मांड-कोश (विश्वकोश बहुत छोटा शब्द होगा) ...आप सिर्फ नाम लीजिए संसार की किसी भी देश-भाषा-प्रांत की फिल्म का -नायर साहब आपको उसके निर्देशक-कलाकारों-प्रदर्शन के वर्ष- कथावस्तु आदि के बारे में सब कुछ बता देंगे।
उनका व्याख्यान हमारे स्तर से बहुत सी ऊँचा होता था। वे भारतीय फिल्म संग्रहालय के निदेशक के पद से सेवानिवृत हुए थे। उन्होंने कैसे और किन परिस्थितियों में फिल्म संग्रहालय को संमृद्ध बनाया ये उनके अलावा कोई न बता सकता है... न समझ सकता है। वहां हर व्यक्ति उनका आदर करता था और वे हर व्यक्ति में एक महान फिल्मकार देखते थे।
फिल्म संस्थान से निकलने के बाद फिल्म समारोहों में जब भी नायर साहब से मुलाक़ात हुई उनका पहला सवाल होता "- तुम्हारी भी कोई फिल्म इसमें आई है क्या ?"
गोवा में पहली बार हुए भारत के अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव तक मैं समारोहों में जाता रहा और उनका सवाल सुनकर ख्यालों में खोता रहा "क्या मैं भी कभी फिल्मकार बन पाऊँगा ?"
यह सपना हर बार देखा और आँखें खुलने पर यथार्थ के कठोर धरातल ने हमेशा गहरे घाव दिए। परन्तु नायर साहब द्वारा दिखाया जाने वाला यह सपना आज भी आकर्षित करता है। शायद...

Sep 2, 2009

एक चिट्ठी मलयालम में മലയാളിയുടെ ഓണം

मेरे मित्र पूछ रहे हैं कि ओणम के दिन भी सिर्फ़ हिन्दी में चिट्ठी। ब्लॉग हिन्दी का है तो हिन्दी में ही चिट्ठियाँ होनी चाहिए!! चलिए आपकी बात भी रखी जाए...आज ओणम के दिन एक चिट्ठी मलयालम में भी -
നന്മ നിറഞ്ഞ മലയാളി മനസ്സുകള്‍ക്ക്‌ ഇന്ന് പൊന്നോണം പുതു വര്‍ഷം എല്ലാം കൊണ്ടും ആഹ്ളാദ ദിവസങ്ങള്‍ "അത്ത പത്ത്‌ ഓണം അടുത്തല്ലോ നായരേ ചോതി വിളമ്പുവാന്‍ നെല്ല് വേണം" "കാണം വിറ്റും ഓണം ഉണ്ണണം " മനസ്സില്‍ എപ്പോഴോ സ്ഥിരവാസമാകിയ പഴം ചൊല്ല് । ഈ ഓണക്കാലത്ത്‌ വീണ്ടും ഓര്‍മകളിലൂടെ ഓടിയെത്തി ........വരമ്പത്ത് പറക്കും തുമ്പിയെ പിടിക്കാന്‍ ഓടി നടന്ന കാലം ....തോട്ടിലൂടെ ഒഴുകുന്ന തെളിഞ്ഞ വെള്ളം ...ഓടി ഓടി ഒളിക്കുന്ന മാനത്തു കണ്ണി ॥വരമ്പത്ത് അരുകിലൂടെ നിന്നു ചിരിക്കുന്ന തുമ്പപൂവ്‌ ॥വെള്ള പരവതാനി വിരിച്ച് ......എല്ലാം ഒരു ഓര്‍മ മാത്രം ...... അരുകിലൂടെ പച്ചവിരിച്ച് കൈയോന്നി ....... കീഴാനെല്ലി ...........ഓര്‍മകളിലൂടെ ഒരു ഓണം ................ഇന്ന് ഈ ഫ്ലാറ്റി നുള്ളില്‍ എല്ലാം ഒരു ഓര്‍മ മാത്രം ........ എല്ലാ വര്‍ഷവും ഓര്‍മ്മിക്കാന്‍ താലോലിക്കാന്‍ ഓര്‍മയിലെ ഒരു ഓണം കൂടി കടന്നു പോകുന്നു । ഹാപ്പി ഓണം .......

मेरे गुरु-मेरे शिष्य

स्वर्गीय श्री चन्द्रशेखर मेरे गुरु -मेरे शिष्य ...
-प्रतिभा मलिक
बहुत कुछ सोचकर बैठी थी कि आज कुछ लिखना है , बहुत याद आ रही थी उन दिनों की जब आई आई टी, मद्रास में मैंने कंप्यूटर से हिंदी का प्रशिक्षण देना शुरू किया। कंप्यूटर क्लास का पहला दिन और अधिकारियों की कक्षा...कंप्यूटर की जानकारी भी कम थी या यह कहूं कि बिल्कुल थी ही नहीं।
पहला दिन उदघाटन वगैरह में बीत गया। घर में कंप्यूटर पेंटियम-1 था। "लीला" उस में चलता नहीं था। एकांतर दिवसीय क्लास... बीच में गैप मिला तो बड़ी तसल्ली हुई । घर में इनसे कुछ-कुछ जानकारी ली। फिर कक्षा का दूसरा दिन आया। तनाव के कारण रात भर सोई नहीं। कक्षा अढ़ाई बजे थी । भूख-प्यास सब गायब। अंदर ही अंदर डरी हुई थी कि कैसे हो पाएगा । मगर बाहर भनक तक किसी को न होने दी . पाठ्य पुस्तक का एक-एक कोना पता था। मगर कंप्यूटर और ऑन-लाइन प्रशिक्षण का अभ्यास कतई नहीं था ।
धड़ल्ले से कक्षा शुरू की। ऑन-लाइन भी साथ-साथ शुरू कर दिया । चाय का समय हुआ तो थोडा सा आराम मिला। चाय टाइम में एक दूसरे से परिचय का मौका मिला। प्रशिक्षार्थियों में श्री चंद्रशेखर जी भी थे। वे कंप्यूटर के एक्सपर्ट थे और आई आई टी के वरिष्ट फेकल्टी मेंबर। इसी वज़ह से मुझे कपकपी छूट रही थी......... मगर उन्होंने मुझे कंप्यूटर की छोटी-छोटी बातें समझाकर मेरे अंदर का डर भगा दिया। वास्तव में वे मेरे कंप्यूटर गुरु थे ।
हिंदी कक्षा के बाद वे उसी कक्ष में जेनेटिक्स की कक्षा लेते थे ... आर्ट ऑफ़ लिविंग की भी कक्षा लेते थे। कक्षा में सब इंतजार करते थे। बहुत कुछ सीखा मैंने उनसे पॉँच महीने में उन्हें हिंदी सिखाते हुए। परीक्षा के बाद एक माह के लिए कक्षा बंद हो गयी थी। कुछ दिन बाद एक अन्य प्रशिक्षार्थी का फोन आया। -पता चला की वे चल बसे । उस दिन भी वे अपनी साइकिल से जा रहे थे, अचानक दिल का दौरा पड़ा और बस अलविदा। वे राजपालयम के महाराजा परिवार से थे। वास्तव में वे महाराजा ही थे । तीन-चार साल गुजर गए । आज भी आई आई टी कैम्पस में घुसते वक्त हमेशा उनकी स्मृति ताज़ा हो जाती है।

ज़रा जल्दी से अब तक जो सीखा है उस पर एक नज़र डाली जाए

A snapshot for practicing HINDI .
Just click the link below-
Hindi -Hindi

(lingvozone.com के सौजन्य से )

ओणम की हार्दिक शुभकामनाएं നന്മ നിറഞ ഓണമാശംസകള്‍



നന്മ നിറഞ ഓണമാശംസകള്‍



Sep 1, 2009

माडर्न हिंदी व्याकरण पुस्तक निशुल्क डाउनलोड

यह एक 7.20 mb की pdf फाइल है जिसे निशुल्क डाउनलोड किया जा सकता है । इससे अच्छी हिंदी व्याकरण पुस्तक निशुल्क कहीं और मिले तो जरूर बताइएगा।
This is a very good modern Hindi Grammar book written by Mr. O N Koul and its 7.20 mb file can be downloaded free of cost from the link given below- must try it.
Modern Hindi Grammar

(iils.org के सौजन्य से )

मेरे गुरु ...4

प्रो0 के0 कुमार



-अजय मलिक


गोरा-चिट्टा रंग,छरहरा बदन, चांदी की झलक वाली बहुत हल्की-हल्की मूँछें , हर वक्त चेहरे पर मुस्कान, आवाज़ में ऐसी जिंदादिली की मुर्दे भी उठ खड़े हों। वे पढ़ाते थे समायोजन का मनोविज्ञान (साइकोलोजी ऑफ़ एडजस्टमेंट) । एक हिंदी वाला मनोविज्ञान पढ़ने कैसे गया ? इस प्रश्न का यहाँ कोई औचित्य नहीं है । डिप्लोमा इन एड्यूकेशनल एंड वोकेशनल गाइडेंस के दस माह के पाठ्यक्रम में उनके केवल पाँच या छः व्याख्यान होते थे। कभी उन्होंने हाज़री रजिस्टर नहीं रखा, हमेशा उनका व्याख्यान दिसम्बर या जनवरी में सुबह साढ़े नौ बजे से शुरू होता था। यह एक रिकार्ड था कि कभी कोई उनकी कक्षा में अनुपस्थित नहीं हुआ. सब जानते हैं कि दिसम्बर में दिल्ली में कैसी कड़ाके की ठंड पड़ती है। सुबह-सुबह ठंडे-ठंडे पानी से नहाना और भाग-दौड़ कर नए गाजियाबाद रेलवे स्टेशन से रेलगाड़ी पकड़ कर किसी भी कीमत पर साढ़े नौ बजे तक एन सी ई आर टी पहुँचना।
हम सब लगभग तीस-पैंतीस छात्र थे। एक बात जिसमें सब निर्विवाद एकमत होते वह थी प्रो0 कुमार के व्याख्यान के लिए तरसना। सब चाहते कि और दो व्याख्यान हो जाते तो अच्छा होता । मगर... चाहते हुए भी प्रोफेसर साहब वक्त न निकाल पाते ... महीने में तीस दिन उन्हें दौरे पर रहना पड़ता। आतंरिक मूल्यांकन के लिए वे भी टेस्ट लेते । टेस्ट से दो दिन पूर्व वे तीन-चार प्रश्न बाकायदा बोर्ड पर लिख देते और उन्हीं में से दो या तीन प्रश्न वे टेस्ट में पूछते... परन्तु उन प्रश्नों के उत्तर तलाशने में हमारी रातें पुस्तकालय में गुजरतीं । उनके हरेक प्रश्न में वह सारा पाठ्यक्रम, जो वे पढ़ाते - समाया होता। बहुत मुश्किल था उन प्रश्नों के उत्तर लिख पाना। उन्होंने कभी किसी को साठ प्रतिशत से कम अंक नहीं दिए । जिन्हें साठ प्रतिशत मिलते वे पास होने लायक ही नहीं होते थे। अधिकाँश को शत-प्रतिशत अंक मिलते । हम सब जानते थे कि समायोजन का मनोविज्ञान सकारात्मक सोच से शुरू होकर सृजनशीलता पर जाकर ठहरता है। मैंने उनसे अपने छात्रों को शत-प्रतिशत अंक देना सीखा बशर्ते कि वे कक्षाओं में उपस्थित रहे हों। प्रोफेसर केo कुमार साहब के प्रति श्रृद्धा में सदैव बढोतरी ही होती रही । ये अलग बात है कि नकारात्मक सोच से ओत -प्रोत समाज में समायोजित होने में सर्वाधिक कठिनाई सकारात्मक सोच के कारण ही हुई क्योंकि लोग तो ढर्रे पर चलना और चलाना पसंद करते है ...केकड़ों की कहानी तो आपने जरूर सुनी होगी।
काश कि संसार के सभी शिक्षक प्रोफेसर कुमार हो पाते..

Aug 31, 2009

मेरे गुरु...3

स्वर्गीय डॉ0 उदय नारायण तिवारी
-अजय मलिक
वर्ष १९८३: एक सनक सवार हुई थी यह जानने की कि भाषा की उत्पत्ति कैसे हुई ? एम. ए. कर चुका था और काम-धाम कुछ मिला नहीं था। दुनियादारी का अता -पता तक नहीं था। दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी के दो- तीन दोस्तों के कार्ड लिए हुए थे और जो भी मिल जाए पढ़ डालने की धुन सवार थी । चाहे जो हो जाए पर इस बात का पक्का इरादा बनाया हुआ था कि भाषा की उत्पत्ति का पता लगाए बिना चैन से पानी भी नहीं पीना है। एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के जॉब के लिए रोजगार दफ्तर के मार्फ़त बुलावा आया ।
वहाँ पूछा गया -"कैसे बेचेंगे हमारी दवाइयाँ ?"
अपना उत्तर भी लाज़वाब था -" दवा की सारी अच्छाइयाँ और खामियाँ बताएंगे।"
उन्होंने कहा -"जाइए, चले जाइए।"
हमने भी वापस अपना झोला संभाल लिया और फ़िर से भाषा की उत्पत्ति की खोज शुरू हो गई ।
एक जगह गए और मिन्नत की कि इस विषय के डॉक्टर बनवा दीजिए ...हमारे गाइड बन जाइए या फ़िर हमें किसी भी तरह का शिष्य बना लीजिए। उन्होंने कहा-" नौकरी करते हो ?" नकारात्मक उत्तर मिलने पर उन्होंने कहा-"बिना नौकरी के पी एच डी कैसे कर पाओगे?"
वहाँ से वापस आकर फ़िर किताबों से हाथापाई शुरू कर दी। इसी दौरान भाषा विज्ञान पर मैक्समूलर की कुछ मोटी-मोटी पुस्तकें हाथ लगीं। अब मैक्समूलर ने हिंदी में कब लिखा? इस पर आप मत जाइए । मैं भी हम से मैं पर आ जाता हूँ। उन पुस्तकों का अनुवाद किया था डॉ उदय नारायण तिवारी जी ने । मैंने उन्हीं पुस्तकों से उनका जबलपुर विश्वविद्यालय का पता लिया और जिन मुद्दों पर मेरी नासमझी में असहमति थी उनपर लंबा चौड़ा पत्र लिख मारा।
करीब दो सप्ताह बाद एक पोस्टकार्ड मिला "6 अलोपी बाग़ , दारागंज , इलाहाबाद से।" इतनी सुंदर लिखावट की ख़ुद की गंदी लिखावट पर बेहद शर्म आई। सबसे पहले ठीक उसी दिन अपनी लिखावट पर ध्यान देना शुरू किया और सफलता भी पाई। पोस्टकार्ड में संक्षेप में बहुत कुछ लिखा गया था। एक तो यही कि जबलपु विश्वविद्यालय के कुलपति के पद से वे लगभग बारह वर्ष पूर्व सेवानिवृत हो चुके थे। दूसरा जो अनमोल आर्शीवाद था "तुम्हारी प्रगति कोई रोक नहीं सकता।"
नई दिल्ली में विश्व हिंदी सम्मलेन के दौरान भी उन्होंने मिलने के लिए बुलाया किंतु वे दो दिन पहले ही किसी कारण वश लौट गए। चिट्ठी-पत्री जारी रही । फ़िर प्रताप ट्रेक्टर्स लिमिटेड से एक नौकरी के टेस्ट का बुलावा आया। हाथरस से चाचा ने रेलगाड़ी में लखनऊ के लिए बिठा दिया । वहाँ से बस पकड़कर जाने कहाँ-कहाँ होकर प्रताप गढ़ पहुंचा। वहाँ जो होना था हुआ। लौटते समय सोचा क्यों न इलाहाबाद भी देख लिया जाए।
इलाहाबाद बस अड्डे से एक रिक्शा लिया और अलोपी बाग़ जा पहुँचा । उनकी आयु अस्सी से ऊपर थी । खाना बनाकर निपटे ही थे। उनकी अस्वस्थ पत्नी किसी और के हाथ का बना नहीं खाती थीं। उनके बिस्तर पर नई पुस्तकों -पत्रिकाओं का ढेर लगा था । दो रूपए मुझे थमाकर बोले-
ज़रा बाहर हलवाई की दुकान से कुछ ले आओ।
मैंने कहा- मगर रुपयों की क्या ज़रूरत है।
-जरुरत क्यों नहीं है ??
मैं डेढ़ रूपए के बेसन के लड्डू ले आया। उन्होंने एक गिलास पानी लाकर दिया। उन्होंने समझाया -" भाषा की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए कई जन्म लेने पड़ सकते हैं , कोई ऐसा विषय चुनो जो इसी जन्म में पूरा हो जाए।" गाइड के लिए उन्होंने डॉ भोलानाथ तिवारी जी तथा डॉ जे सी राय जी के नाम सुझाए।
मैंने कहा -पर मैं तो नौकरी-वोंकरी नहीं करता ...
मुझे इतने बड़े लोग अपना शिष्य स्वीकारेंगे भला!!
बोले- "दोनों हमारे शिष्य हैं ।"
उन्होंने लिखा और स्वीकारा भी गया... मगर मैं ही इस योग्य साबित नहीं हो सका। धीरे-धीरे भाषा की उत्पत्ति का नशा उतर गया। आज भी उनके तीन पत्र मेरे पास अमूल्य निधि की तरह हैं।
ऐसे गुरुवर को प्रणाम।

पसंदीदा गायकों,शायरों, गीतकारों, संगीतकारों के गीत पढ़िए -

मुकेश,
मोहम्मद रफी,
लता मंगेशकर,
किशोर कुमार,
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सहगल
गीता दत्त,
Suman Kalyanpur,
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Usha Khanna
Ghulam Haider
Jaidev
समीर
हसरत जयपुरी
Sahir Ludhianvi
Shakeel Badayuni
मजरुह सुलतानपुरी
गुलशन बावारा

(gr8lyrics. com के सौजन्य से )

लेकिन रोमन लिपि से देवनागरी में कैसे आएगा ??

यही तो समस्या है...
अरे भाई , थोडी सी लिखने की प्रेक्टिस (अभ्यास) करने में क्या जाता है!!
-नहीं करनी ...
सब कुछ पका-पकाया चाहिए..
-है ना ??
अब जैसे अमानुष फ़िल्म का गाना रोमन में है -

gam ki dava to pyar hai gam ki dava sharaab nahi
thukaraao na hamara pyaar itne to ham kharab nahi
gam ki dava to ...
jata hai jo jaane do aata hai vo aane do
beeti baatein beet gayi nayi bahaaren aane do
bagiya mein phool hazaaron hain ek hi to gulaab nahi
gam ki dava to ...
ghaav jiya ke bhar denge toota dil ham jodenge
ban ke rahenge saathi ham saath kabhi na chhodenge
ab koi tumko sata sake itni kisi mein taab nahi
gam ki dava to ...

इसे देवनागरी में बदलिए फ़ौरन

तो इसके लिए just click the link below-

Editor

(quillpad के सौजन्य से )
you will get quillpad window. - copy and paste your roman script song and your job is done...


यौर सोंग इस रेडी इन देवनागरी

गम की दवा तो प्यार है गम की दवा शराब नही
ठुकराव ना हमारा प्यार इतने तो हम खराब नही
गम की दवा तो ...

जाता है जो जाने दो आता है वो आने दो
बीती बातें बीत गयी नयी बहारें आने दो
बगिया में फूल हज़ारों हैं एक ही तो गुलाब नहीं
गम की दवा तो ...

घाव जिया के भर देंगे टूटा दिल हम जोडेंगे
बन के रहेंगे साथी हम साथ कभी ना छोडेंगे
अब कोई तुमको सता सके इतनी किसी में ताब नही
गम की दवा तो ...

हिन्दी फिल्मी गीत देवनागरी या रोमन में...

अब आप हिन्दी के अक्षर पहचानने लगे हैं मगर औपचारिक शिक्षण यानी पाठ-दर-पाठ से बोर होने लगे हैं । हिन्दी फिल्में आपको बेहद पसंद हैं । यदि हिंदी फिल्मों के गाने देवनागरी या रोमन लिपि में मिल जाते तो पढ़ने में मज़ा आता। एक ओर म्यूजिक सुना जाता दूसरी ओर लिखा हुआ गाना पढ़/गा भी लेते ... कैसे भला---

Now you are able to recognize Hindi alphabets , can read too.

But... formal Hindi lessons are too boring!!

Is it not possible to have some other interesting way to learn Hindi … like reading some Hindi songs along with music in your music box or playing the same song in i-pod!!!
-Oh yes, this is very much possible… read the song given below-

आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया
के मेरे दिल पे पड़ा था कोई ग़म का साया
आप ने याद दिलाया ...

मैं भी क्या चीज़ हूँ खाया था कभी तीर कोई
दर्द अब जा के उठा चोट लगे देर हुई
तुमको हमदर्द जो पाया तो मुझे याद आया
के मेरे दिल पे पड़ा था कोई ग़म का साया ...

मैं ज़मीं पर हूँ न समझा न परखना चाहा
आसमाँ पर ये कदम झूम के रखना चाहा
आज जो सर को झुकाया तो मुझे याद आया
के मेरे दिल पे पड़ा था कोई ग़म का साया ...

मैं ने भी सोच लिया साथ निभाने के लिये
दूर तक आऊंगी मैं तुमको मनाने के लिये
दिल ने एहसास दिलाया तो मुझे याद आया
के मेरे दिल पे पड़ा था कोई ग़म का साया ...


ठीक ऐसे ही ना ...
You want this way only ...
तो फ़िर देर किस बात की !!
gr8lyrics के द्वारा यह सुविधा निशुल्क उपलब्ध कराई गई है ।

Is it correct ?
THEN...

Decide the song ... recall the first alphabet of the song and ... click the appropriate alphabet below … select the song and read or sing along with the music of your player -

a b c d e f g h i j k l m n o p q r s t u v w x y z others

(gr8lyrics. com के सौजन्य से )

Aug 30, 2009

अँग्रेज़ी कहावते और हिंदी भावार्थ - लिंक

हिंदी वेबसाइट पर अनेक अँग्रेज़ी कहावतें हिंदी भावार्थ के साथ दी गई हैं ।
just click the LINK below-



English Proverbs with Hindi meanings

(हिंदी वेबसाइट के सौजन्य से )

सरल हिंदी-अंग्रेजी व्याकरण Simple Grammar

हिंदी वेबसाइट द्वारा बड़ी ही सरल हिंदी और अंग्रेज़ी व्याकरण निशुल्क उपलब्ध कराई गई है । यह उन हिंदी भाषियों के लिए भी उपयोगी है जो जल्दी से भूली-बिसरी हिन्दी या अंग्रेज़ी व्याकरण की बातें दोहरा लेना चाहते हैं। इस वेबसाइट पर और भी बहुत सी उपयोगी जानकारियाँ हैं हिंदी सीखने वालों के लिए।
The Noun
The Pronoun
The Adjective
The Verb
Verb with incomplete predication
Tense
हिंदीAND ENGLISH GRAMMAR

(हिंदी वेबसाइट के सौजन्य से )

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Aug 29, 2009

गुमनामी के नाम : विलंब के लिए खेद है.

अशिष्ट जी की पिछले कुछ दिनों से कोई ख़बर नहीं है। वे लापता हैं और हम मज़बूर हैं गुमनामी के नाम की अगली कड़ी न दे पाने के लिए । हमने वादा किया था २९ अगस्त से पहले प्रकाशित करने का मगर अशिष्ट जी के नाम से उनके पते का पता नहीं चलता । हमें पूरी उम्मीद है कि वे हमारे ब्लॉग को ज़रूर देख रहे होंगे और जल्दी ही हमें गुमनाम होने से बचा लेंगे।

सामान्य हिंदी पाठ्यक्रम निशुल्क डाउनलोड

Byki का यह कोर्स बस दो मिनट में डाउनलोड और स्थापित यानी इंस्टाल किया जा सकता है । यह बोलचाल की हिंदी के आम प्रयोग में आने वाले शब्दों तक सीमित है और बोलता भी है। मुफ्त में इसे भी आजमाया जा सकता है। ज़रा आप भी परखिए। FOR डाउनलोड just click the LINK below -
Hindi: Byki Express for Windows
(Byki.com के सौजन्य से )

Aug 28, 2009

हिंदी की एक सम्पूर्ण पाठशाला

हिंदी की बिंदी हर छोटे-बड़े विद्यार्थी के लिए एक सम्पूर्ण पाठशाला की तरह लगती है ।
HINDI KI BINDI : An important Hindi school for every one. Just try and enjoy this also-
http://www.hindikibindi.com/

Hindi Ki Bindi-for all age of ...

ताज़ा तरीन हिन्दी समाचार पढ़ने की सुविधा

यदि आप ताज़ा हिन्दी खबरें पढ़ना चाहते हैं तो नीचे क्लिक कीजिए यहाँ आपको हिन्दी में कई अन्य सुविधाएं भी मिलेंगी ।
just click the link below-
Hindi

Aug 27, 2009

मेरे गुरु ... 2 : डॉ कुँअर बेचैन

-अजय मलिक
वर्ष 1987 : अप्रेल या मई का महीना था । रात के ग्यारह बज चुके थे । शाम के सात बजे से चिंतन जारी था मगर ऊहापोह की स्थिति बनी रही। लगभग सवा ग्यारह बजे उन्होंने कहा -" जब कदम बढ़ा दिया है तो पीछे क्यों हटाना ... डिग्री तो सभी को मिल जाती है ...एक साल बेकार जाता है- जाए - बात तो रह जाएगी , परिवर्तन का प्रयास सभी नहीं कर पाते ..."
अगले दिन मैंने अपनी एम एड की परीक्षा का पर्चा हिंदी में लिख दिया था। जामिया-मिल्लिया-इस्लामिया में पहली बार ऐसा हुआ था । परीक्षा अंग्रेज़ी में लिखने की बाध्यता थी मगर किसी ने चुनौती दी थी - "हिंदी में लिखने पर हिला दिए जाओगे।"
'फ्रायड का मनोविश्लेषण एवं सामाजिक संबंध ' विषय पर एक पर्चा क्या हिंदी में पढ़ा मुझे सचमुच का हिंदी-जाति-वाला जैसा कुछ बना दिया गया। एरिक्सन के व्यक्तित्व के विकास के सिद्धांत पर खूब पढ़-लिखकर आतंरिक मूल्यांकन के लिए जो अंग्रेज़ी में लिखा गया था उसे यह कहकर काट दिया गया कि इंडियन राइटर्स की कोई प्रामाणिकता नहीं है । विदेशी विद्वानों की तीन किताबें लाकर दिखाई गईं तो जवाब मिला - 'ऐसा तो नहीं पढ़ाया गया था ...आपकी समझ में अंग्रेज़ी नहीं आती है।'
मैंने कच्चा इरादा बनाया था । साहस कम था। क़र्ज़ लेकर पढ़ाई करना और भविष्य को दाव पर लगा देना ... उस हिचकिचाहट से निकाला था डॉ कुँअर बेचैन जी के उस रात के निर्णय ने। हम आठ लड़के थे ...सात फेल हो गए या कर दिए गए यह मानकर कि वे हिंदी आन्दोलन में मेरे साथ थे। मेरा परीक्षाफल रोक लिया गया ...आठ माह बाद क्यों और कैसे आनन-फानन में मुझे न्यूनतम अंकों के साथ पास घोषित किया गया ये बहुत लम्बी कहानी है।
बात डॉ कुँअर बेचैन जी की चल रही थी। यदि गुरु मात्र कक्षा में पढ़ाने वाले ही हो सकते हैं तो फिर बेचैन साहब मेरे गुरु नहीं हो सकते। पर क्या वाकई 'गुरु' शब्द इतना सीमित-संकुचित अर्थ रखता है ? मैं ऐसा नहीं मानता । जब एक-दो कक्षाओं में बी एस सी के दौरान वे पढ़ाने आए थे तब हम पढ़ने वाले नहीं हुआ करते थे -वर्ष 1978-79 में गाजियाबाद में एम एम एच कालिज में कोई पढ़ता था भला!!
किसी ने एक दिन दूर से दिखाकर कहा था- 'ये बहुत बड़े कवि हैं।'
मैंने कहा -' ठीक है।'
फिर गाँव में हल चलाने का दौर शुरू हुआ । अज्ञेय जी का बीबीसी से साक्षात्कार सुना ... सुबह-सुबह कंधे पर हल, हाथ में बैलों की पगैहा और बगल में पड़ौसी का ट्रांजिस्टर ..कोई क्या कल्पना करेगा। कुछ लिखा और पता नहीं कैसे बेचैन साहब को भेज दिया । गाँव में उनकी चिट्ठी आई ...फिर मुलाक़ात ...उनकी कोशिश कि मुझ बेसुरे को सुर में पिरोया जाए और मैं ग़ज़ल को गटक जाने वाला...इस मामले में हम दोनों ही अपनी-अपनी जगह शायद असफल ही रहे मगर मेरे व्यक्तित्व में एक दृढ़ता आने लगी । एक कवि ने कब और कैसे मुझे सिपाही बना दिया -बयान कर पाना मुश्किल है । आज भी जब बुरी तरह उलझ जाता हूँ तो उनपर जिम्मेदारी डाल कर मुक्त हो जाता हूँ। एक ऐसे गुरु जिन्होंने कभी खाली हाथ नहीं जाने दिया । कवि सम्मलेन देखने - सुनने शुरू किए उनके साथ... छोड़े उनके साथ और फिरसे शुरू किए उनके साथ। पीएचडी अधूरी रह गई ...क्योंकि मैं वह सम्पूर्णता नहीं ला पाया जो मुझे चाहिए थी गुरु जी ने बहुत चाहा, बहुत सराहा भी पर मैं उनके शिष्य के रूप में अपने अन्दर जो परफेक्शन लाना चाहता था वह लाया हुआ महसूस नहीं कर सका। उन्होंने बहुत कहा -"परफेक्शन के लिए और बहुत से मौंके आयेंगे। " मगर मुझे वह पंक्ति भुलाए नहीं भूलती- "डिग्री तो सभी पा जाते हैं..."

Aug 26, 2009

हिंदी संयुक्त व्यंजन Hindi/Consonant combinations

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Combinations (Conjuncts)

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