Aug 12, 2013

सवाल सिर्फ़ हिंदी का नहीं :: उमेश उपाध्याय

सवाल सिर्फ़ हिंदी का नहीं

बहस हिंदी और अंग्रेज़ी की कतई नहीं है सवाल सारी गैर अंग्रेज़ी भाषाओँ का हैं. अंग्रेजी अब एक खास तरीके से समाज में असमानता को और ज्यादा गहराने वाली भाषा बन गई है. ज्यों ज्यों इन्टरनेट का फैलाव हो रहा है कार्य व्यापार से भारतीय भाषाएँ सिमटती जा रहीं हैं.आज से पचास साल बाद क्या होगा अत्यंत समृद्ध और संपन्न भारतीय भाषाओँ का? क्या वे पुस्तकालयों तक सीमित नहीं रह जायेंगी?
 
सीमा फोन पर जोर जोर से रो रही थी. मैं तुरंत हॉस्टल पहुंचा. उसे चुप कराया. खाना खिलाया. वार्डन से बात करके मैं वापस आकर सोचने लगा कि थोड़े दिन पहले ही तो उसने इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था. कितने उत्साह से अपने माँ बाप के साथ वो मेरे दफ्तर आई थी. छत्तीसगढ़ के सुदूर आदिवासी इलाके से आई सीमा ने बारहवीं कक्षा में 65 प्रतिशत अंक हासिल किये थे. फीस के पैसे के लिए परिवार ने पुश्तेनी ज़मीन का एक टुकड़ा बेचा था. पर इसका उन्हें कोई मलाल नहीं था वे तो बस बेटी का इंजीनियर बनने का सपना पूरा करने के लिए सबसे अच्छे कॉलेज मे एडमिशन चाहते थे. फीस का सारा पैसा नगद लाये थे. गांव के कोई दस बारह लोग उसे दाखिले के बाद रायपुर छोड़ने आये थे. चटक ज़रीदार गुलाबी कुर्ते और हरी पजामी में सीमा बहुत खुश लग रही थी. एक अजीब से स्नेह का नाता बन गया था उसका और मेरा.
मगर धीरे धीरे वह उदास रहने लगी. कक्षाओं से जी चुराने लगी. कभी बीमारी का बहाना तो कभी मन खराब रहने का. एक दिन फुर्सत में उसके साथ बैठा. पता पडा कि उसे क्लास में कुछ समझ नहीं आता. सहपाठियों के सामने उसकी हेठी होती है. उसकी दिक्कत थी कि वो स्कूल में हिंदी मीडियम से पढ़ी थी और इन्जीनियरिंग की पढाई अंग्रेज़ी में होती है. साल पूरा होते होते सीमा पीछे होती गई और फिर उसने कॉलेज छोड़ दिया ....
सीमा अकेली नहीं हैं जो सिर्फ़ भाषाज्ञान के कारण आगे की पढाई छोड़ने पर मजबूर हुई. जांच करने पर मालूम हुआ कि इन्जीनियरिंग जैसे प्रोफेसनल कोर्स बीच में छोड़ने और उनमें पिछड़ने वाले बच्चे विषयज्ञान से ज्यादा अंग्रेजी से घबराते हैं. अंग्रेजी की मार वो झेल नहीं पाते. स्कूली पढाई बीच में छोड़ने के कारण कई हैं पर कॉलेज छोड़ने के पीछे सबसे बड़े कारणों में भाषा की दिक्कत है. जहाँ विद्यालयों में पढाई मातृभाषा में वहीं उच्च शिक्षा ज़्यादातर अंग्रेजी मैं हैं.
देशभर के आंकडे देखे जाएँ तो स्कूलों में दाखिला लेने वाले कोई एक करोड ७० लाख बच्चे पढाई बीच में छोड़ देते हैं. कॉलेज पढाई बीच में छोड़ने वालों की संख्या भी लाखों में है. इसमें भी समाज के वंचित तबकों जैसे पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजातियों के विद्यार्थियों की संख्या सबसे ज्यादा है. अंग्रेजी अब एक खास तरीके से समाज में असमानता को और ज्यादा गहराने वाली भाषा बन गई है.
ये बहस हिंदी और अंग्रेज़ी की कतई नहीं है सवाल सारी गैर अंग्रेज़ी भाषाओँ का हैं. भूमंडलीकरण की आंधी में देश में ही नहीं पूरे विश्व में अंग्रेज़ी का वर्चस्व और फैलाव बढ़ता जा रहा है क्योंकि कम्प्युटर की कोडिंग इसी भाषा में हो रही है. अंग्रेजी का वर्चस्व भयावह है. ज्यों ज्यों इन्टरनेट का फैलाव हो रहा है कार्य व्यापार से भारतीय भाषाएँ सिमटती जा रहीं हैं. ई मेल और एस एम एस पर जैसे जैसे लोग निर्भर होते जा रहे हैं अंग्रेजी सीखना ज़रूरी होता जा रहा है. आज मजबूरी है कि हिंदी टाइप करने के लिए भी रोमन स्क्रिप्ट की ज़रूरत पड़ रही है. ये बाज़ार की भाषा है और बाजार और रोज़गार इसी पर केंद्रित हो गया है. पर क्या आदमी की ज़िंदगी सिर्फ़ पेट भरने तक ही सीमित है? हर भाषा से जुडी होती है संस्कृति, सभ्यता, साहित्य, संस्कार और जीवन की एक शैली. आज अंग्रेजी का समर्थन करने वालों से पूछना चाहिए कि सब कुछ इस भाषा में होने के उपरांत हमारी इस समृद्ध धरोहर का क्या होगा ?
कल्पना कीजिये आज से पचास साल बाद की. क्या होगा अत्यंत समृद्ध और संपन्न भारतीय भाषाओँ का? जब सारा कार्य व्यापार और शिक्षा अंग्रेज़ी में होगी तो हमारी अपनी भाषाएँ – हिंदी, तमिल, बंगला, गुजराती, असमिया, मराठी, तेलुगु, कन्नड़ आदि का क्या होगा? क्या वे पुस्तकालयों तक सीमित नहीं रह जायेंगी.
हिंदी पर चल रही आज की बहस को इसलिए इसे सिर्फ़ आउटसोर्सिंग और कालसेंटर से होने वाली आय से ही जोड़कर मत देखिये. इसे इस व्यापक सन्दर्भ में देखना ज़रूरी है अन्यथा ये मुद्दा भी रोज की चकल्लस वाली राजनीति में फंस कर रह जाएगा. इसीलिये इस बहस से राजनेताओं को बहुत दूर रखने की ज़रूरत है. क्योंकि पहले भी नेताओं ने वोट की राजनीति से जोड़कर हिंदी का बड़ा नुक्सान किया है. उनका ध्यान सदा से वोटों पर रहा है लोंगों पर नहीं. और भाषा का सवाल जुड़ा है लोंगों के वजूद से, उनकी भावनाओं से और उनकी अस्मिता से.
 
- उमेश उपाध्याय
(फेसबुक से साभार )

Aug 9, 2013

सभी भारतीयों को तीज और ईद मुबारक



(दोनों चित्र फेसबुक से साभार )

Aug 8, 2013

पीले फूलों का सफर और बेचारा दद्दू सिंह

पता चला कि फूल तो अपनी सही जगह पहुँच गए मगर तीसरी बार भी बेचारे दद्दू सिंह की लाटरी का टिकट नकली ही निकला।
यह कलकत्ता में घटित सच्ची घटना है। दद्दू सिंह एक सरकारी दफ्तर में चपरासी था। बीड़ी पीने का शौकीन दद्दू सिगरेट को तोबा बोलता था। एक दिन सुबह वह पूरी टीम-टाम के साथ आया और साहब के सामने वाली कुर्सी पर तनकर बैठ गया। साहब ने उसके चमचमाते कपड़ों से आ रही तीखे सेंट की ख़ुशबू को बख़ूबी महसूस करते हुए तनिक हैरानी से देखा तो दद्दू सिंह बोला- " पंद्रह लाख की लॉटरी निकाल आई है इसलिए इस्तीफा देना चाहता हूँ।" 
 
(शेष भाग फिर कभी)

नई तस्वीर के साथ एक पुरानी कविता

फोटो - भुवन  (सर्वाधिकार सुरक्षित)

माँ ने कहा-
देख ले बेटा  
भाव यही
मेरे कहने का !

मैंने देखा-
बारिश में चुप
भीग रहा था
पंछी नीड़विहीन अकेला !


- अजय मलिक (c)

Jul 27, 2013

पांचवें वर्ष की शुरुआत सिर्फ श्यामरुद्र पाठक से...

[ मित्रो,
"हिंदी सबके लिए" को कल चार वर्ष हो गए। अपनी भाषाओं के लिए हम बस हाथ-पैर मारने की कोशिश करने का बहाना सा करते रहे। यदि कुछ कर पाते तो मन में संतोष होता, नहीं कर पाए तो निराशा न भी सही मन उदासी से छलक-छलक जा रहा है। इस जुलाई में कुछ भी नहीं लिखा जा सका। बस जिस एक भारतीय इंसान के बारे में सोचता रहा उसी से इस पांचवें वर्ष की शुरुआत करना चाहता हूँ। मैं सोचता रहा कि "हम भारत के लोग" जिनके लिए विधान यानी हमारा संविधान बना क्या उनमें श्याम रुद्र पाठक नाम का विशुद्ध भारतीय इंसान शामिल नहीं है? मेरे पास कोई जवाब नहीं है। कई बार मन में यह विचार आया कि मुझे भी श्याम रुद्र पाठक होना चाहिए मगर इतनी हिम्मत, इतनी समझ, इतना धैर्य, इतनी शक्ति मुझमें नहीं है। कई बार नौकरी छोड़कर श्यामरुद्र पाठक के साथ जाकर खड़े होने का मन भी हुआ ...
 
श्यामरुद्र पाठक से मिले शायद दो दशक बीत गए... फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने श्यामरुद्र पाठक के बारे में बहुत सारी जानकारी और बहुत सारे चित्र दिए हैं। हिंदी सबके लिए के मित्रों तक पहुंचाने के उद्देश्य से उपर्युक्त समस्त सामग्री यहाँ साभार दी जा रही है।]


 
चित्र क्रमश: 1. अदालत में दंडाधिकारी के सामने अपने वकीलों के साथ अपनी बात रखते पाठक जी। 2. लगभग 250 दिनों बाद मिले पति से बतियातीं मंजू जी। 3. श्यामरुद्र पाठक जी
(सभी चित्र राहुल देव जी के फेसबुक पृष्ठ से साभार )

सौ करोड़ से ज्यादा भारतीयों के अपनी भाषा में न्याय पाने, होते देखने, उस प्रक्रिया में शामिल होने और उससे अवगत होने के बुनियादी अधिकार के लिए ऐतिहासिक और अभूतपूर्व लड़ाई लड़ने वाले श्यामरूद्र पाठक को गलत, झूठे, मनगढंत आरोप लगा कर तिहाड़ जेल में भेजे जाने, वहां सामान्य अपराधियों के साथ रखकर शारीरिक और मानसिक यंत्रणा दिए जाने, फिर एक सप्ताह के बाद परसों 24 जुलाई को पहली बार अदालत में पेश किए जाने तक के समय में सारी भाषाओं तो क्या हिन्दी के अधिकांश अखबारों, चैनलों, लेखकों, विद्वानों, दुकानदारों, मठाधीशों को उनकी सुध लेने की जरूरत़ महसूस नहीं हुई।

जिस दिल्ली में रोज कम से कम आधा दर्जन साहित्यिक गोष्ठियां, कविता-कहानी पाठ, लोकार्पण, सम्मान आदि के कार्यक्रम अकेली हिन्दी में ही होते हैं, दर्जनों सरकारी-गैरसरकारी हिन्दी और अन्य भाषाओं की अकादमियां, संस्थाएं हैं, हजारों लेखक हैं, एक करोड़ से ज्यादा भारतीय भाषाभाषी हैं, चंद हजार हिन्दी शिक्षक हैं, छात्र हैं - उसमें उसका हाल पूछने, उसका साथ देने, उसकी गैरकानूनी गिरफ्तारी का विरोध करने मुश्किल से डेढ़ सौ लोग रहे।

Jul 7, 2013

हिन्दी सबके लिए के कुछ उपयोगी पुराने चिट्ठे





























Jul 5, 2013

गिराऊ संगठन जिंदाबाद...

वह चलते-चलते अचानक गिर पड़ा था। कुछ चक्कर सा आया था और फिर जो समझ में आया वह अस्पताल के सघन चिकित्सा कक्ष में आक्सीज़न मास्क का खुरदरापन भर था। दो दिन पहले ही डाक्टर ने उसे चेताया था कि लगातार तनाव में रहने के कारण उसके दिमाग की नसें कमजोर हो चली हैं और उसे लंबे अवकाश और नियमित इलाज़ की जरूरत है। सघन चिकित्सा कक्ष के वातानुकूलित और जीवाणुरहित माहौल में अभी वह सही से साँसे संभालने की कोशिश कर ही रहा था कि दरवाजा हल्का सा खुला और उससे बाहर मच रहा हंगामा उसके कानों में झनझनाने लगा।

बाहर हंगामा करने वालों की चिल्लाहट में उनकी बेबसी और छटपटाहट साफ झलक रही थी। उनका कहना था – “ आखिर ये गिर कैसे सकता है… ये ही क्यों गिरा ? हम क्यों नहीं गिरे? यह आदमी गिरने में भी हमसे बाजी मार लेना चाहता है। ये हो ही नहीं सकता कि यह हमसे अधिक गिर जाए। हम सदाबहार गिराकु हैं। हम इस हद तक गिरे हुए हैं कि हमने और अधिक नीचे गिरने के लिए गहराई नाम की चीज़ ही नहीं छोड़ी है। हम पैदायशी गिरे हुए हैं और जन्म से आज तक लगातार गिरते आ रहे हैं। गिरने का ऐसा कोई दाव-पेंच नहीं है जिसका वृहद ज्ञान और अभ्यास हमें न हो। गिरने की किसी भी प्रतियोगिता में आज तक हमसे अधिक गिर कर हमें कोई नहीं हरा सका है। गिरने में हमने सबको हजारों मील पीछे छोड़ा है। फिर भी हमें कभी किसी ने आक्सीजन नहीं दिलवाई, हमें कोई अस्पताल नहीं लाया। एक ये है कि साला चुपके से हमारे गिराऊ और गिरावट भरे क्षेत्र पर भी कब्जा जमा लेना चाहता है। हमने इसकी हर बात बर्दाश्त की है। हमने इसे गिराने की भी हर संभव कोशिश की पर यह नहीं गिरा। हमने लगड़ी, टँगड़ी सब लगाई पर ये चिकना घड़ा नहीं गिरा। और आज चुपचाप गिर गया। गिरना था तो हमारे गिराने से गिरता, हमारे तरीके और सलीके से गिरता... मगर नहीं जनाब, हमें बताना या गिरने में हमसे मदद मांगना तो दूर, दुष्ट ने किसी को कानों-कान खबर तक नहीं होने दी, चुपके से गिर गया। इसे हर काम अपने आप करना है, ये हमें नीचा दिखाना चाहता है। ... पर गिरने के मामले में हम अपने संगठन का नाम बदनाम करने की किसी भी जानी-अनजानी कोशिश को कामयाब नहीं होने देंगे। इसे वातानुकूलित गहन चिकित्सा कक्ष से बाहर निकलवाकर ही दम लेंगे। एक बार बाहर आ जाए तो इसे बताएं कि गिरने वाले कैसे और क्या होते हैं”।
गिरा हुआ आदमी मुर्दाबाद...
गिराऊ संगठन... जिंदाबाद
गिराऊ एकता... ज़िन्दाबाद 
चुप-चुप गिरना
नहीं चलेगा... नहीं चलेगा...
हमारी गिरावट अमर रहे...अमर रहे 
गिरावट को चुनौती
नहीं चलेगी... नहीं चलेगी... नहीं चलेगी
इसके बाद तेज़ होते हुए नारों के शोर में उसकी चेतना धूमिल हो गई।  
   

-अजय मलिक (c)

Jul 2, 2013

ऑफिस 2013 : पीडीऍफ़ से वर्ड परिवर्तक भी

माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस 2013 में पीडीऍफ़ दस्तावेज़ को संपादन योग्य वर्ड दस्तावेज़ में बदलने की सुविधा भी दी गई है। माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस 2013 स्थापित करने के बाद किसी भी पीडीऍफ़ दस्तावेज़ को माउस के दाएँ  क्लिक के द्वारा सम्पादन योग्य वर्ड दस्तावेज़ में संजोया यानी सेव किया जा सकता है। यह ओसीआर की तरह नहीं है, क्योंकि यह स्कैन अथवा फोटो (जे पी जी आदि ) को पाठ यानी टेक्स में परिवर्तित नहीं करता। किन्तु इसे पीडीएफ से वर्ड परिवर्तक / कन्वर्टर कहा जा सकता है। 


-अजय मलिक 

Jul 1, 2013

सुधा गुप्ता की कविता : "पीले गुलाब"





उन सबके लिए जिन्हें पीले गुलाब पसंद हैं...

Jun 24, 2013

इस संबंध में कानून अभी मौन है


एक नाग और साँप में अंतर तो सिर्फ सपेरे ही बता सकते हैं। एक आम आदमी के लिए नाग और साँप में कोई विशेष अंतर नहीं है। उसके आस-पास अनेक साँप पल-बढ़ रहे हैं और उसके मन में साँपों को लेकर एक जन्मजात स्वाभाविक डर भी है। वह सोचता है कि जितना हो सके साँपों से दूर रहे, मगर यहाँ साँप इतने ज्यादा हैं कि उनसे दूर रह पाना असंभव हैं। साँप के दंश से बचने की गुंजाइश कम है मगर  बचाव के लिए भी साँप को मारना दंडनीय अपराध है। साँप अगर डस ले और डसा हुआ मर जाए, तब भी साँप को मारना कानूनन जुर्म है। साँपों के संरक्षण के लिए अनेक संस्थाएं हैं और उन्हें बेहिसाब पैसा और सुविधाएं भी इस नेक काम के लिए मिलते हैं। साँपों को बचाकर रखना और आदमी को साँप के काटे जाने लायक बनाना हमारे धर्मनिरपेक्ष समाज का विधि द्वारा विधानित धर्म है। सदियों से आदमी साँपों को खोज-खोजकर मारता आया है। कभी डर से मारता है तो कभी डसे जाने के बाद मारता है मगर आदमी साँपों को मारता जरूर रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। आदमी को हर कीमत पर साँपों को पालना होगा, साँप के साथ रहना होगा और इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना होगा कि साँप के जहरीले दातों पर एक खरोंच तक न आए। जहरीले दांतों की सुरक्षा और पैनेपन को बनाए रखने के साथ-साथ यह भी पक्का करना होगा कि साँप की नैसर्गिक प्रवृत्तियों पर किसी भी तरह की कोई आंच न आए। साँप के काटने की आदत बरकरार रखने के लिए समय-समय पर साँप से कटवाना भी होगा। इससे दो लाभ होंगे एक तो साँप स्वस्थ रहेगा और दूसरे काटे जाने पर जो आदमी मर जाएगा उसे साँपों के साथ रहने की मजबूरी के नरक से मुक्ति मिलेगी। जो डसे जाने पर भी नहीं मरेगा और जीने का हौसला बनाए रखेगा, उसे धीरे-धीरे विष सहन करने की आदत पड़ जाएगी। आदमी भी अंतत: विषैला बन जाएगा। तब अगर आदमी भी पलटकर साँप को डंक मारने लगे और साँप आदमी के जहर से मर जाए तो क्या होगा? क्या तब भी आदमी को दंड दिया जाएगा? इस संबंध में कानून अभी मौन है।       

Jun 23, 2013

कुत्ते की दुम का कॉपी राइट


कुत्ते की दुम पर किसका सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसकी जानकारी मुझे नहीं है। कुछ कहते हुए डर रहा हूँ कि कॉपी राइट उल्लंघन के किसी चक्कर में न पड़ जाऊँ। कुत्ते की दुम की कहानी सभी जानते हैं मगर यह कोई नहीं बताता कि इस पर सर्वाधिकार यानी कॉपी राइट किसका है। जिनका भी है वे मुझे क्षमा करते हुए बताएं कि उन्हें यह वहम कब हुआ कि जब बारह बरस तक टेढ़ी दुम सीधी नली अर्थात पाइप में थी तब वह किसी एक वर्ष, किसी एक दिन, किसी एक क्षण के लिए सीधी हो गई थी?  पाइप में सीधापन था मगर दुम तो वही घुमावदार टेढ़ी की टेढ़ी ही रही होगी। सीधी नली के सीधेपन से जनाब गच्चा खा गए होंगे और वहम के शिकार हो गए होंगे कि दुम भी सीधी हो गई है। कुत्ते की वह दुम ही क्या जो सीधी हो जाए। ये और बात है कि टेढ़ी, तिरछी दुम से प्रभावित होकर आजकल पाइपें हर तरह  की तिरछी-घुमावदार-स्प्रिंगदार आने लगी हैं। दुम को बारह बरस की बजाय तेरह, चौदह, बीस बरस या अपने जीवन के बाकी बचे-खुचे वर्षों तक भी किसी भी कठोरतम धातु, प्लास्टिक, फाइबर वगैरा की नली में रखिए, चाहें तो सीमेंटिड करा लीजिए, अगर वह असली दुम है तो हर तरह की पाइप को बदल डालेगी मगर अपना स्वाभाविक टेढ़ापन कभी न छोड़ेगी। हो सकता है इतने सालों में पाइप ही गल-गला कर धुआँ-धुआँ हो जाए। कुत्ते की दुम अमर है, उसका टेढ़ापन अजर-अमर है। उसका कोई सानी नहीं, उसका मुक़ाबला कोई कर ही नहीं सकता। उसके सात्विक टेढ़ेपन का सर्वाधिकार भी सुरक्षित है। आखिर दुम कुत्ते की जो है। दुम से कुत्ता है या कुत्ते से दुम है, इसका आंकलन आप कीजिए। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि आजकल विज्ञान ने इतनी तरक्की तो कर ही ली है कि बारह साल में सैंकड़ों बिना दुम वाले कुत्तों की नई नस्लें विकसित की जा सकती हैं। समस्या दुम नहीं बल्कि उसका टेढ़ापन है जिसे दुम के रहते सही नहीं किया जा सकता। इसलिए या तो बिना दुम वाला कुत्ता विकसित कीजिए या फिर कुत्ते की दुम को जड़मूल से उखाड़ फेंकिए । बारह साल के चक्कर को छोड़िए और सीधी नली को भी इतनी लंबी तपस्या के धर्मसंकट से बचाइए। मगर आप ऐसा कर तभी सकते हैं जब आपको दुम हिलाने वाले कुत्ते नापसंद हों। कुत्ते की वफादारी की परिचायक भी तो हिलती हुई दुम ही होती है और जब वह हिलेगी तो अपना स्वभाव छोड़कर टेढ़ी हुए बिना कैसे रह सकती है भला? 
- अजय मलिक     

Jun 22, 2013

"एक पत्र पुत्र के नाम अर्थात प्रबंधन सूत्र" - शैलेंद्र नाथ

(श्री शैलेंद्र नाथ, भारी वाहन निर्माणी में अपर महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। हिंदी एवं अङ्ग्रेज़ी साहित्य में उनकी पैठ अच्छे-अच्छे साहित्य के विद्यार्थियों को मात देने वाली है। नई-नई भाषाएँ सीखना भी उनका शगल है। यद्यपि इस आलेख का मूल शीर्षक 'पिता का पत्र पुत्र के नाम' है किन्तु मुझे लगा कि इसे 'प्रबंधन सूत्र' शीर्षक भी दिया जा सकता है। यह आलेख राजभाषा ज्ञानधारा ब्लॉग पर दिसंबर, 2012 में प्रकाशित हुआ था। थोड़ा सा संपादित करने के बाद इसे साभार यहाँ दिया जा रहा है।)
पिता का पत्र पुत्र के नाम
- शैलेंद्र नाथ
                                                                                                                                                                                                                                                                                                        
मेरे प्‍यारे बेटे,
                हाँ, मैं तुम्‍हें अब भी "मेरे प्‍यारे बेटे" कह कर सम्‍बोधित कर रहा हूँ यद्यपि अब तुम किशोर हो चुके हो। ऐसा इसलिए क्‍योंकि पिता के लिए एक बच्‍चा, बच्‍चा ही रहता है, इस बात का ध्‍यान किए बिना कि वह बच्‍चा कितना और कितना दूर तक वि‍कसित हो चुका है।
                क्‍योंकि हर इंसान में कहीं न कहीं एक बच्‍चा छुपा होता है। विशेषत: तुममें अभी भी काफी बाल-सुलभ सरलता, निष्‍कपटता और गुण बचे हैं, यद्यपि अब तुम उम्र में बड़े हो गए हो। सच पूछा जाए तो मेरी इच्‍छा है कि जब तक तुम इस पृथ्‍वी पर हो, तब तक ये गुण तुममें विद्यमान रहें।
                इसलिए कि आप एक बच्‍चे से आदमी को निकाल सकते हैं लेकिन एक आदमी से बच्‍चा या बचपना नहीं निकाल सकते। इसलिए कि, जैसा कि विलियम वर्डस्‍वर्थ ने कहा है, "बच्‍चा ही मुनष्‍य का पिता होता है।” यद्यपि मैं तुम्‍हारा पिता हूँ, तम्‍हारे में पितृत्‍व के बीज हैं। तुममें अभी भी वो तत्‍व हैं जिन्‍हें जीवन और वर्षों ने मुझसे छीन लिया है और इस प्रकार तुम मेरे पिता हो।
                इसलिए जब मैं तुमकों “प्‍यारे बेटे’ कह कर सम्‍बोधित करता हूँ तो तुम अपने को कमज़ोर मत समझो बल्कि तुम अनन्‍त संभावनाओं,सकारात्‍मकता, कोमलता एवं आंतरिक शक्ति से युक्‍त एक प्राणी हो।

Jun 7, 2013

"कंप्यूटर पर हिंदी में काम करने के लिए बेसिक प्रशिक्षण कायर्क्रम" वर्ष 2013-14

राजभाषा विभाग द्वारा वर्ष 2013-14 में आयोजित किए जाने वाले "कंप्यूटर पर हिंदी में काम करने के लिए बेसिक प्रशिक्षण कायर्क्रम" का कलेंडर जारी कर दिया गया है। पूरे देश में कुल 100 कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें से 9 कार्यक्रम चेन्नई में आयोजित किए जाएंगे। इन 9 कार्यक्रमों में से 3 कार्यक्रम आयोजित करने का दायित्व मुझे मिला है। इन 03 कार्यक्रमों का विस्तृत विवरण नीचे दिया जा रहा है-
 
 
पूरे देश में आयोजित होने वाले सभी कार्यक्रमों का विवरण राजभाषा विभाग की वेब साइट के नीचे दिए लिंक पर उपलब्ध है-
 

http://www.rajbhasha.nic.in/comptrg201314.pdf

(सौजन्य www.rajbhasha.gov.in)