Mar 12, 2025

आइए, आपको ले चलते हैं 1992 में सईद जाफरी के पास :: रिकार्डिंग बहुत पुरानी है मगर ...

यह मेरे जीवन का सबसे यादगार इंटरव्यू था .. 

-अजय मलिक 

 

भूख, मारपीट, अट्ठन्नी और अभिनय


 

करीब 34 साल पहले किए गए नसीरुद्दीन शाह के साक्षात्कार की रिकार्डिंग का अंश


बंबई के मुंबई बनने से पूर्व मेरे द्वारा किया गया यह दूसरा इंटरव्यू था। इससे पहले गुप्ता जी के उकसावे पर चुपके से मैंने शशि कपूर का इंटरव्यू कर डाला था..

इन ऑडियो कैसेट्स को इतने साल तक बचाए रखना आसान नहीं था। 

इंतजार कीजिए अगली पोस्ट का जिसमें आप रूबरू होंगे जनाब सईद जाफरी से 

-अजय मलिक  

Mar 9, 2025

एक बात…दो बात

एक बात...

दो बात,

तीन बात...

बहुत सारी बातें हैं 

कहने, सुनने के लिए।

मगर अजीब गफ़लत है-

कहने वाले की 

कोई सुनता नहीं ।

सुनने वाले से 

कोई कहता नहीं ।

सारा शहर सुनसान सा शान्त है।

फिर भी हर ओर घोर अशान्ति है...

अराजकता के खुले मुँह में 

रसगुल्ला नीरस होकर

बेबस पड़ा है, 

निठल्लापन 

बक-बक करता

मस्त खड़ा है...

बेचारा आदमी

ज़हरीली हवा से

धुले आसमान में 

कुछ ढूँढ रहा है ।

-अजय

असंभव को संभव, बनाकर तो देख !

असंभव को संभव, बनाकर तो देख !

एक बार फिर से, बुलाकर तो देख !

तिरी झुर्रियों से, ख़फ़ा है चाँद भी

तू दिल को दर्पण, दिखाकर तो देख !

कई बरस बीते, याद करते तुझे

यादों से पर्दा, हटाकर तो देख !

सरेआम मुझको, कत्ल करने वाले,

अब नयी दुनियाँ, बसाकर तो देख !

बरसों बरस तक, आज़माया मुझे,

खुद को भी अब, अज़माकर तो देख !

मिरा क्या, मैं तो, गुज़र ही जाऊँगा,

तू कील काँटे, बिछाकर तो देख !

अदब को मेरे, खूब घायल किया,

मुस्कान मिरी तू, मिटाकर तो देख !

-अजय मलिक (c)

Mar 5, 2025

RAJBHASHA : : राजभाषा



मूलत: यह पावर पॉइंट हमारे गुरु समान मित्र श्री शैलेन्द्र नाथ जी (भूतपूर्व महा प्रबंधक, फील्ड गन फेक्ट्री, कानपुर) ने अपनी आवड़ी में तैनाती के दौरान तैयार किया था। मैंने इसमें अपनी ओर से बस थोड़ा बहुत जोड़-घटा कर एक फिल्म के रूप में परिवर्तित किया है। श्री शैलेन्द्र नाथ जी के प्रति कृतज्ञता के साथ एक अनाधिकार चेष्टा ... -अजय मलिक 

 

…ले उड़े…

गाँव तक आए शहर

छाँव तक ले उड़े …

नेता के झूठ, सिर 

पाँव तक ले उड़े …

भूख से मरा कोई 

चाम तक ले उड़े…

सुबह कभी हुई नहीं 

शाम तक ले उड़े…

घाव नित नये दिये

बाम तक ले उड़े…

प्रेम की दुकान से

जाम तक ले उड़े…

न्याय से अन्याय कर

दाम तक ले उड़े…

पाँच सेर नाज पर

काम तक ले उड़े…

अब न कोई ठौर है

छान तक ले उड़े…

देश के करणधार 

कान तक ले उड़े…

आन-बान-शान संग 

जान तक ले उड़े…

-अजय मलिक

Mar 4, 2025

राजभाषा सम्मेलन आगरा 2016 :: न भूतो न भविष्यति-1


 

राजभाषा सम्मेलन आगरा 2016 :: न भूतो न भविष्यति-2 .. . धन्यवाद ज्ञापन


 

संघ की राजभाषा नीति :: संवैधानिक प्रावधान :: पॉवर पॉइंट फिल्म


 

राजभाषा अधिनियम 1963 (यथा संशोधित 1967) की धारा 3(3) के पॉवर पॉइंट की फिल्म


 

स्वर्गीय रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' जी का एक पत्र


 

मेरे गुरु और गुरुजी का आशीर्वाद



 

कार्यसाधक ज्ञान



 

Mar 3, 2025

बंबई मेरा परदेश




 

गुजरा हुआ जमाना :: चाणक्य का चंद्रगुप्त उर्फ़ बीसवीं सदी का डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी :: आवरण कथा


 






गुजरा हुआ जमाना :: रवि उर्फ बाम्बे रवि






गुजरा हुआ जमाना :: नौशाद 2


 

गुजरा हुआ जमाना :: रघुवीर यादव

 


कह देना था ..

 

अगर चाह में
कहीं खोट था !
कह देना था ।
 
नहीं निभाना
अगर लक्ष्य था !
कह देना था ।
 
झूठे वादे
क्यूँ करने थे !
कह देना था ।
 
राह तुम्हारी
अगर अलग थी !
कह देना था ।
 
मुझे बांध कर
जो पाना था !
कह देना था ।
 
मुझे मारना
गर मकसद था !
कह देना था ।
 
हँसी खुशी भी 
मैं मर जाता !
कह देना था ।

-अजय मलिक 

क्यूँ, याद बहुत आते हैं ?

 

वो मीत जो मिले नहीं,

वो गीत जो सुने नहीं, 

वो फूल जो खिले नहीं,

वो शूल जो चुभे नहीं,

वो होंठ जो हिले नहीं.. !

क्यूँ , दिल धडकाते हैं !

क्यूँ, याद बहुत आते हैं ?

-अजय मलिक 

दो दिन उधार लिए :: अजय मलिक

 

दो दिन उधार लिए,

चुपचाप सोने के लिए । 

एक रात नींद आई नहीं 

और एक रात मैं जगता रहा,

यह जानने के लिए कि आख़िर 

ये नींद आती है, तो कहाँ से,

कैसे और किस रास्ते से !!!

-अजय मलिक 


पूछते हैं लोग अक्सर..

 

पूछते हैं 
लोग अक्सर
घर कहाँ है ?

क्या  बताऊँ !

दरिया के
रिसते किनारे,
ख़ाली खड़ी 
इन बस्तियों में,
दर कहाँ है !
घर कहाँ है !
 
बचपन की
ठंडी रातों में
तड़पता,
मेरी यादों में 
सिसकता
.. बचपन.. 

गाँव का 
टप-टप टपकता,
वो ओसारा.. 
अब कहाँ है !
घर कहाँ है !
 
मैं कहाँ हूँ !

 
-अजय मलिक

एक महाभोज :: अजय मलिक

 

कल पुन:हुआ 
एक महाभोज,
रानी ने परसे
सहस्र भोज । 
 
कर दिया दान
सारा समान । 
 
राजा ने सौंपे
सारे अस्त्र शस्त्र ,
सबको बाँटे 
सब निजी वस्त्र  । 
 
कुछ पल काँपे 
पुलकित होकर,
महके उजाड़
उपवन होकर । 
 
आँसू का भी
अभिमान बहा,
दृग खुले भिचीं
पलकें भारी.. 
रानी की हँसी 
मन मान गया, 
राजा की साँसें
जग जान गया,
दिल हार गया
सब कुछ देकर। 
 
फिर डोल गयी
वसुधा महान.. 
सबने पाया
जो जी चाहा । 
जीवन का यह
अद्भुत महाभोज,
रानी ने परसे 
सहस्र भोज । 


-अजय मलिक