Jul 27, 2012

श्रुतलेखन पर कुछ छींटे और कुछ बौछारें

श्रुतलेखन पर श्री रवि रतलामी जी की राय बदली है। राजभाषा विभाग द्वारा सीडैक से तैयार कराए गए कम से कम दो सॉफ्टवेयर्स ऐसे हैं जो उपयोगी और प्रशंसनीय हैं। पहला लीला हिंदी प्रबोध (पुराना पाठ्यक्रम) और दूसरा श्रुतलेखन। रवि जी ने कुछ दिन पूर्व कुछ छींटे मारे थे श्रुतलेखन पर मगर अब निर्मल बौछारों से उन्हें धो-पौंछ दिया है। जब रवि जैसे अनुभवी कंप्यूटर विशेषज्ञ को प्रथम प्रयास में परेशानी हो सकती है तो सामान्य प्रयोगकर्ता का क्या हाल होगा इसे आसानी से समझा जा सकता है। मुझे श्रुतलेखन ने जनवरी 2007 से अब तक बहुत बार थकाया है और बहुत बार अद्वितीय परिणाम दिए हैं। मैं रवि जी के आलेख का लिंक नीचे दे रहा हूँ जिसे श्री विजय प्रभाकर नागरकर जी ने भेजा है। रवि जी के छींटे और बौछारें श्रुतलेखन के प्रयोक्ताओं को बहुत मदद करेंगी, इसी आशा के साथ नीचे लिंक दिया जा रहा है, जरूर पढ़ें-
   http://raviratlami.blogspot.in/2012/07/blog-post_27.html
कृपया ध्यान दें- 
श्रुतलेखन इंस्टालेशन से पूर्व एंटी वायरस सोफ्टवेयर निष्क्रिय कर दें। चिंता न करें, इंस्टालेशन के बाद जब कम्प्युटर रिस्टार्ट होगा तो एंटी वायरस स्वत: पुन: सक्रिय हो जाएगा। यदि वायरस आक्रमण का डर है तो इंस्टालेशन के समय इंटरनेट भी बंद रख सकते हैं।

Jul 26, 2012

हिन्दी सबके लिए का 3 वर्ष का सफर

जितना चाहते थे उसका दस प्रतिशत भी इन तीन वर्षों में नहीं दिया जा सका। बहुत सारा काम पुन: संपादन के लिए शेष है। कुछ ऐसे बहाने हैं जिनका सहारा लेकर कम लिखने या कम पोस्ट करने का तर्क दिया जा सकता है। ... लेकिन जिंदगी में यदि झंझट नहीं होंगे तो फिर इसे जिंदगी ही कौन कहेगा! हमें गर्दन और पीठ की परवाह न करते हुए, पीठ पर पड़ने वाले कोडों की संख्या में हुई वृद्धि के अनुपात में और अधिक घंटे काम करना चाहिए था जो नहीं किया जा सका।

ज्यादा समय कोडों की चिंता और पीठ के दर्द को सहलाने में नष्ट हुआ जिसकी भरपाई मुश्किल है। 

मगर असफलताओं के बीच जीने भर के लिए आक्सीजन की कमी तो नहीं है। एक रूखे से ब्लॉग को पिछले 3 वर्षों के दौरान औसतन 70 पाठकों ने प्रतिदिन देखा... हमारे लिए इतना भी चलते जाने के लिए कम तो नहीं है। इस स्नेह के लिए विनम्र आभार।   

आपका मनचाहा कुंजीपटल ... संपादित

आपका मनचाहा कुंजीपटल ... आलेख कुछ नई जानकारियों को जोड़ते हुए पुन: संपादित कर दिया गया है। माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैड्ग्वेज इनपुट टूल अब भाषा इंडिया डॉट कॉम के मुख पृष्ठ पर स्थानांतरित हो गया है जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा है-
http://www.bhashaindia.com/_layouts/ilit/Hindi.aspx


हिन्दी आसान ट्यूटर की जानकारी तथा डाउनलोड लिंक तो पहले ही दिया जा चुका है। अब भाषा इंडिया डॉट कॉम पर भी 12 भारतीय भाषाओं केलिए Indic Inscript Tutor सॉफ्टवेयर दिए गए हैं। हिन्दी का लिंक नीचे दिया जा रहा है-


    
(सौजन्य भाषा इंडिया डॉट कॉम)

Jul 25, 2012

दो अखबारों की एक ख़बर

 'हिन्दी सबके लिए' का कल से चौथा वर्ष शुरू हो रहा है। इस पूर्व संध्या पर चेन्नई के दो स्थानीय समाचार पत्रों में छपी एक ख़बर के लिंक नीचे दिए जा रहे हैं। ये लिंक्स मैंने 18 जगह भेजे और प्रत्योत्तर में माननीय अग्रवाल साहब एक संदेश मिला। एक परम मित्र ने फोन पर लंबी बात की। उनसे लगभग रोज ही बात होती है और अगले दिन तक विदा लेने से पूर्व डबल्यूडबल्यूएफ़ और हिन्दी में समानता पर चर्चा होती है। ये लिंक यहाँ इसलिए दिए जा रहे हैं क्योंकि कुछ लोग अभी भी नहीं मानते कि हिन्दी सबके लिए है। मित्रो, अपनी माँ और मौसी को अपना मानें या न मानें, सच्चाई तो बदली नहीं जा सकती...   
http://www.deccanchronicle.com/channels/cities/chennai/why-should-lic-staff-sign-hindi-asks-mk-392

http://www.thehindu.com/news/states/tamil-nadu/article3663329.ece

Jul 20, 2012

धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल! - अज्ञेय


(अज्ञेय जी की यह कविता मुझे अत्यधिक पसंद है। कल नेट पर यह कविता मुझे मिल गई। जहाँ से मिली वहाँ भी श्रद्धेय अज्ञेय जी के एक परम भक्त के प्रयासों से ही डाली गई होगी। मुझे अब तक अपने जीवन में अज्ञेय जी के प्रति मुझसे अधिक श्रद्धावान दो ही महानुभाव मिले - एक मुंबई में और एक कोचिन में। इसका यह मतलब नहीं कि अज्ञेय जी के प्रति श्रद्धा रखने वालों की कमी है, बस उनके प्रति समर्पित लोग मौन ज्यादा रहते हैं और अपने मन के किसी भी कोने में कोई झरोखा तक नहीं छोड़ते किसी के झाँकने के लिए।  अज्ञेय जी की इस कविता से मैं स्वर्गीय राजेश खन्ना यानी काका को श्रद्धांजलि दे रहा हूँ.........  -अजय मलिक) 

(1)

धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!
तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल!

जब ईसा को दे कर सूली जनता न समाती थी फूली,
हँसती थी अपने भाई की तिकटी पर देख देह झूली,
ताने दे-दे कर कहते थे सैनिक उस को बेबस पा कर :
''
ले अब पुकार उस ईश्वर को-बेटे को मुक्त करे आ कर!''

जब तख्ते पर कर-बद्ध टँगे, नरवर के कपड़े खून-रँगे,
पाँसे के दाँव लगा कर वे सब आपस में थे बाँट रहे,
तब जिस ने करुणा से भर कर उस जगत्पिता से आग्रह कर
माँगा था, ''मुझे यही वर दे : इन के अपराध क्षमा कर दे!''

वह अन्त समय विश्वास-भरी जग से घिर कर संन्यास-भरी
अपनी पीड़ा की तड़पन में भी पर-पीड़ा से त्रास-भरी
ईसा की सब सहने वाली चिर-जागरुक रहने वाली
यातना तुझे आदर्श बने कटु सुन मीठा कहने वाली!

तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल-
धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!

(2)

धक्-धक् धक्-धक् ओ मेरे दिल!
तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल!

बोधी तरु की छाया नीचे जिज्ञासु बने-आँखें मीचे-
थे नेत्र खुल गये गौतम के जब प्रज्ञा के तारे चमके;
सिद्धार्थ हुआ, जब बुद्ध बना, जगती ने यह सन्देश सुना-
''
तू संघबद्ध हो जा मानव! अब शरण धर्म की आ, मानव!''

जिस आत्मदान से तड़प रही गोपा ने थी वह बात कही-
जिस साहस से निज द्वार खड़े उस ने प्रियतम की भीख सही-
''तू अन्धकार में मेरा था, आलोक देख कर चला गया;
वह साधन तेरे गौरव का गौरव द्वारा ही छला गया-

पर मैं अबला हूँ  इसीलिए, कहती हूँ, प्रणत प्रणाम किये,
मैं तो उस मोह-निशा में भी ओ मेरे राजा! तेरी थी;
अब तुझ से पा कर ज्ञान नया यह एकनिष्ठ मन जान गया
मैं महाश्रमण की चेरी हूँ-ओ मेरे भिक्षुक! तेरी हूँ!''

वह मर्माहत, वह चिर-कातर, पर आत्मदान को चिर-तत्पर,
युग-युग से सदा पुकार रहा औदार्य-भरा नारी का उर!
तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल-
धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!

(3)

धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!
तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल!

बीते युग में जब किसी दिवस प्रेयसि के आग्रह से बेबस,
उस आदिम आदम ने पागल, चख लिया ज्ञान का वर्जित फल,
अपमानित विधि हुंकार उठी, हो वज्रहस्त फुफकार उठी,
अनिवार्य शाप के अंकुश से धरती में एक पुकार उठी :

''
तू मुक्त न होगा जीने से, भव का कड़वा रस पीने से-
तू अपना नरक बनावेगा अपने ही खून-पसीने से!''
तब तुझ में जो दु:सह स्पन्दन कर उठा एक व्याकुल क्रन्दन :
''
हम नन्दन से निर्वासित हैं, ईश्वर-आश्रय से वंचित हैं;

पर मैं तो हूँ पर तुम तो हो-हम साथी हैं, फिर हो सो हो!
गौरव विधि का होगा क्योंकर मेरी-तेरी पूजा खो कर?''
उस स्पन्दन ही से मान-भरे, ओ उर मेरे अरमान-भरे,
ओ मानस मेरे मतवाले-ओ पौरुष के अभिमान-भरे!

तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल,
धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!

- सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन 'अज्ञेय' 

Jul 12, 2012

राष्ट्रभाषा : मनन, मंथन, मंतव्य

यहाँ विकिबुक्स के एक लेख, जिसे अनेक लेखों का संकलन कहा जा सकता है, लिंक दिया जा रहा है-


http://hi.wikibooks.org/wiki/AF


समय हो तो जरूर पढ़ें, समय न हो तो अवश्य पढ़ें

(सौजन्य विकिबुक्स)

लीला गहन प्राज्ञ पाठ्यक्रम ऑनलाइन परीक्षा की लिखित भाग की परीक्षा के लिए नमूना प्रश्न पत्र


Jun 23, 2012

कारक

(भारत कोश के सौजन्य से) 

Jun 17, 2012

'फादर्स डे' पर काका हाथरसी की एक कविता


फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸
लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।
कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸
दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।
कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸
मौज कर रहे पुत्र¸ हडि्डयां घिसते फादर।

पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸
होते रहु दो साल तक फस्ट इयर में फेल।
फस्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸
साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।
कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸
मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।

प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸
लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।
मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸
शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें 'काका कवि' राय¸ भयंकर तुमको देता¸
बन सकते हो इसी तरह 'बिगड़े दिल नेता।' 
- काका हाथरसी
(कविता कोश के सौजन्य से )

पूछ लूँ मैं नाम तेरा ....... - अज्ञेय


( अज्ञेय जी की इस कविता को न जाने कितने बरसों से ढूंढ रहा था मैं..."पूर्वा" में पढ़ी इस कविता के कुछ अंश मुझे सदा याद रहे मगर पूरी कविता याद करने-गुनगुनाने की चाह हमेशा बनी रही। आज अचानक मुझे यह कविता दास्तां-ए-समीर नामक ब्लॉग पर मिल गई। समीर जी को धन्यवाद)

पूछ लूँ मैं नाम तेरा,
मिलन रजनी हो चुकी, विच्छेद का अब है सवेरा!
जा रहा हूँ और कितनी देर अब विश्राम होगा,
तू सदय है किन्तु तुझको और भी तो काम होगा!
प्यार का साथी बना था, विघ्न बनने तक रुकूँ क्यों?
समझ ले स्वीकार कर ले, यह कृतज्ञ प्रणाम मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


और होगा मूर्ख जिसने चिर-मिलन की आस पाली-
'पा चुका अपना चुका' - है कौन ऐसा भाग्यशाली ?
इस तड़ित को बाँध लेना, दैव से मैंने न माँगा-
मूर्ख उतना हूँ नही, इतना नहीं है भाग्य मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


श्वाँस की हैं दो क्रियाएँ - खींचना फिर छोड़ देना,
कब भला संभव हमे इस अनुक्रम को तोड़ देना?
श्वाँस की उस संधि सा है इस जगत में प्यार का पल,
रुक सकेगा कौन कब तक बीच पथ में डाल डेरा?
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


घूमते हैं गगन में जो दीखते हैं स्वच्छंद तारे,
एक आँचल में पड़े भी अलग रहते हैं बिचारे-
भूल में पल भर भले छू जाएँ उनकी मेखलाएँ-
दास मैं भी हूँ नियति का क्या भला विश्वास मेरा!
पूछ लूँ मै नाम तेरा!


प्रेम को चिर एक्य कोई मूढ़ होगा तो कहेगा,
विरह की पीड़ा न हो तो प्रेम क्या जीता रहेगा?
जो सदा बांधे रहे वह एक कारावास होगा-
घर वही है जो थके का रैन भर का हो बसेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


प्रकृत भी है अनुभूति; वह रस-दायिनी निष्पाप भी है,
मार्ग उसका रोकना ही पाप भी है, शाप भी है;
मिलन हो, मुख चूम लें; आई विदा, ले राह अपनी-
मैं न पूछूं, तुम न जानो, क्या रहा अंजाम मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


रात बीती, यद्यपि उसमें संग भी था, रंग भी था,
अलग अंगों में हमारे, स्फूर्त एक अनंग भी था;
तीन की उस एकता में प्रलय ने तांडव किया था-
सृष्टि-भर को एक क्षण भर बाहुओं का बाँध घेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


सोच मत, 'यह प्रश्न क्यों, जब अलग ही हैं मार्ग अपने?'
सच नहीं होते, इसी से भूलता है कौन सपने?
मोह हमको है नहीं पर द्वार आशा का खुला है-
क्या पता फिर सामना हो जाए तेरा और मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


कौन हम-तुम? दुःख और सुख होते रहे, होते रहेंगे;
जान कर परिचय परस्पर हम किसे जाकर कहेंगे?
पूछता हूँ क्योंकि आगे जानता हूँ क्या बदा है-
प्रेम जग का, और केवल नाम तेरा, नाम मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


मिलन रजनी हो चुकी, विच्छेद का अब है सवेरा.....!!


सचिदानंद हीरानंद वात्सायन 'अज्ञेय' 

Jun 16, 2012

हमारे देश में साक्षरता 1901 से 2011 तक


गीतायन के गीत : फ़िल्मी गीतों से हिंदी सीखने का मंत्र

बहुत दिन बीत गए कोई नया लिंक दिए। आवारा फिल्म का एक संवाद है-"मेरी सूरत ही कुछ ऐसी है"। मित्रो मेरी सूरत और सीरत दोनों ही कुछ ऐसी हैं कि भाई लोग बीच-बीच में उलझाते रहते हैं। बहुत सारी वह ऊर्जा जिसका सदुपयोग कुछ नया करने में होना चाहिए उसे भाई लोगों द्वारा खड़ी की जाने वाली नई-नई बाधाओं को पार करने और स्वयं को जिंदा रखने की जद्दोजहद में करना पड़ता है। जब मैं त्रिवेन्द्रम में था तो डॉ. धर्मवीर जी अक्सर कहा करते  थे- "ये लोग जानते हैं कि तुम कुछ नया कर सकते हो, इसलिए जीवन भर तुम्हें उलझाए रखेंगे"। 
बहरहाल आज एक और लिंक पेश है। गीतायन का यह लिंक आपको 11000 हिंदी फ़िल्मी गीतों को रोमन और देवनागरी में पढ़ने कि सुविधा देता है। iTrans Song Book (ISB) के नाम से संग्रह किए गए ये गीत  कई मायनों में लाजवाब हैं। देवनागरी में इतनी सही वर्तनी में इन गीतों का मिलना अन्यत्र शायद ही कहीं संभव हो सके। गीतायन के 19 वर्षों से जारी इस प्रयास का आप भी लाभ उठाइए और गुनगुनाइए उन सदाबहार गीतों को जो दशकों से आपको सम्मोहित करते चले आ रहे हैं।



    

बस जरा नीचे दिए लिंक को क्लिक कीजिए -

गीतायन.कॉम/

(http://www.giitaayan.com के सौजन्य से) 

प्रवीण एवं प्राज्ञ पाठ्यक्रम की सहायक सामग्री संपादित

हमारी यह कोशिश रही है कि हिंदीतर भाषी हिन्दी प्रेमी विद्यार्थियों के साथ-साथ हमारे मित्र सहकर्मियों के रोज़मर्रा के कार्यालयीन दायित्वों के निर्वाह के लिए भी "हिंदी सबके लिए" सहायक सिद्ध हो सके। इसी क्रम में पिछले दिनों प्रवीण के पाठ सारांशों में दो और पाठों के सारांश सरल शब्दों में तैयार कर जोड़े गए हैं।
प्राज्ञ पाठ्यक्रम के मसौदा लेखन भाग के विभिन्न मसौदों का अलाइनमेंट यानी संरेखण भी गूगल क्रोम की सहायता से सही करने की कोशिश की गई है। अभी भी इसमें बहुत सुधार की आवश्यकता है और हम वादा करते हैं कि आगे भी हम निरंतर सुधार की यह प्रक्रिया जारी रखेंगे।  

Jun 10, 2012

काश, शंघाई की टीम से हिन्दी में गोल्डफिंगर बना पाता!

अचानक परीक्षित का फोन आया- अंकल, नेट पर हो तो जल्दी से शंघाई के प्रीमियर की बुकिंग करा लो। मैंने उसके उकसाने पर 4 टिकटें बुक करा लीं।  आज चौथे दिन भी फिल्म दिमाग पर छाई है। चेन्नै में "लगे रहो मुन्ना भाई" के बाद सिनेमा हाल में यह पहली फिल्म थी जो मैंने देखी। फिर कल रॉवड़ी राठौर भी देखी।


आज शंघाई की दो समीक्षाएं डेक्कन क्रॉनिकल में पढ़ीं। प्रतिष्ठित एवं बेहद वरिष्ठ फिल्म समीक्षक ख़ालिद मोहम्मद ने फिल्म को 50% अंक दिए हैं। यदि मुझे इस पर असहमत होने का हक है तो उनके दिए अंकों से मैं शतप्रतिशत असहमत हूँ। दूसरी समीक्षा सुपर्णा शर्मा की है जो शंघाई को 90% अंक देती है। मैं सुपर्णा शर्मा की समीक्षा को काफी हद तक  सटीक मानता हूँ।
शंघाई फिल्म की शुरुआत जरूर थोड़े हिचकोलों के साथ होती है परंतु जब भूमिका बंध जाती है तो  फिल्म उड़ने लगती है। दर्शक उसकी गति से डरता है, सहमता है मगर उड़ान का पूरा मज़ा लेने का लोभ है कि लगातार बढ़ता जाता है। फिल्म का तकनीकी पक्ष जितना मजबूत है उतना ही कलाकारों का अद्वितीय अभिनय। पटकथा, गीत-संगीत, संपादन सब प्रशंसनीय है।



इमरान हाशमी के अभिनय को लेकर हमेशा मेरे मन में संशय रहा है (भाई संजय मासूम क्षमा करें) मगर शंघाई में उसने जोगी परमार को जिस तरह साकार किया है उससे मैं उसका मुरीद बन गया हूँ...



और अभय देओल का तो कहना ही क्या है! कृष्णन के किरदार में दूसरा कौन है जो इतना परफेक्ट हो सकता था? फारूख शेख के अभिनय पर कुछ कहना तो सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा, अभिनय की इतनी समझ भी मुझमें नहीं है कि उनके बारे में कुछ कह सकूँ।


लेकिन प्रोसेनजीत चटर्जी  ने अहमदी की भूमिका में पृथ्वीराज कपूर और सोहराब मोदी की गरजती आवाज और बलराज साहनी के अभिनय की याद ताज़ा कर दी। कालकी कोचलीन ने भी अपनी भूमिका के साथ बेइंसाफ़ी नहीं होने दी।


भग्गू की भूमिका में पितोबास  त्रिपाठी में मुझे एक और इरफान नज़र आया। निर्देशक दिबाकर बनर्जी को बधाई। 
कुल मिलाकर कह सकता हूँ कि अगर मुझे इस फिल्म की टीम को लेकर फिल्म बनाने के लिए कहा जाए तो बेहिचक मैं हिन्दी में "गोल्डफिंगर" बनाऊँ,  अभय देओल को जेम्स बॉन्ड (सियान कोन्नेरी  ) बना डालूँ, इमरान हाशमी को ओड्डजोब (हेरोल्ड सकाटा) और  प्रोसेनजीत चटर्जी को औरी गोल्डफिंगर (गेर्ट फ़ोरबे) की भूमिका दूँ। फिल्म देखने का मन है तो शंघाई जरूर देखें।  
-अजय मलिक

2007 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्रीमती लता रामचंद्रन, पीआरटी, केंद्रीय विद्यालय आईआईटी मद्रास, लीला प्रवीण का प्रशिक्षण ले रहीं हैं।

केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण उपसंस्थान, लीला हिन्दी कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र, चेन्नै में लीला प्रवीण का प्रशिक्षण ले रहीं श्रीमती लता रामचंद्रन , पीआरटी, केंद्रीय विद्यालय आईआईटी मद्रास, वर्ष 2007 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं। उन्होंने अपने विद्यालय के अनेक शिक्षकों को हिन्दी प्रशिक्षण के लिए प्रेरित किया।
(फोटो सौजन्य  केंद्रीय विद्यालय आईआईटी मद्रास)

नराकास (बैंक एवं वि॰सं॰), चेन्नै के सदस्य कार्यालयों के कार्मिकों के लिए आयोजित हिन्दी/इंडिक यूनिकोड कार्यशाला

केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण उपसंस्थान, लीला हिन्दी कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र, चेन्नई में नराकास  (बैंक एवं वि॰सं॰), चेन्नै के सदस्य कार्यालयों के कार्मिकों के लिए आयोजित हिन्दी/इंडिक यूनिकोड कार्यशाला के उद्घाटन  अवसर का एक चित्र। 


    [फोटो सौजन्य नराकास  (बैंक एवं वि॰सं॰) ]

May 18, 2012

बेचारा बनवारी

[एक कहानी... ]
             बेचारा बनवारी
  -अजय मलिक


बनवारी की मुसीबतें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं। वे बिजली का बिल जमा करने गए थे। उस दिन बिल जमा करने की आखरी तारीख थी। लंबी कतार में कई घंटे खड़े रहने के बाद जब उनकी बारी आई तो उन्हें जंग जीत लेने जैसा एहसास होने लगा। मगर जल्द ही उन्हें इस विचार को त्याग देना पड़ा और फिर वे आईपीएल की किसी टीम के आखरी ओवर की अंतिम गेंद पर होने वाले चमत्कार या बिजली गिरने जैसी संभावनाओं पर विचार करने लगे।

बिल बाबू ने उन्हें घूर कर देखा और उनका पाँच सौ का कड़क नोट लौटा दिया। बनवारी ने सवाली नज़रों से देखा तो बिल बाबू ने खरखराती आवाज़ में दुलत्ती जमा दी– “आपका ये नोट सही नहीं है”।

बनवारी : “अच्छा-भला तो है, इसमें खराबी क्या है? नया नोट है, आज ही एटीएम से निकाला है”।

बिल बाबू : “नया नोट क्या खराब नहीं हो सकता?... एटीएम क्या हमसे ज्यादा जानता है?”

May 7, 2012

लिनक्स : दा 'BOSS'

कई मित्रों ने पूछा है कि क्या वाकई हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में लिनक्स में यूनिकोड में काम करना संभव है! उनकी शंका का निवारण इस बात से हो जाना चाहिए कि हम सफलतापूर्वक 6 प्रशिक्षण कार्यक्रम इसके बारे में चेन्नई में चला चुके हैं। लिनक्स  'BOSS' यानी भारत ऑपरेटिंग सिस्टम सोल्युशंस के BOSS 4.1 में 3 की-बोर्ड्स के साथ हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में यूनिकोड में काम करने की सुविधा है। जिन की-बोर्ड्स की बात की गई है इनमें इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड भी शामिल है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी नीचे दिए लिंक से प्राप्त की जा सकती है तथा इसी लिंक की सहायता से लगभग 4.2 जीबी के इस ऑपरेटिंग सिस्टम को निशुल्क डाउन लोड भी किया जा सकता है-


(सौजन्य सीडैक चेन्नै)

Apr 30, 2012

प्रवीण परीक्षा द्वितीय प्रश्न पत्र

[सुबह किए वादे के अनुसार प्रवीण परीक्षा का द्वितीय प्रश्न पत्र (नवम्बर 2011) संशोधित कर दिया जा रहा है ]



वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की Definitional Dictionaries तथा अंग्रेज़ी से हिन्दी शब्दार्थ की सुविधा

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की Definitional Dictionaries तथा अंग्रेज़ी से हिन्दी शब्दार्थ की सुविधा का लाभ उठाया जा सकता है।  हिन्दी से अँग्रेजी शब्दार्थ के लिए लिंक नीचे दिया जा रहा है। लिंक को क्लिक करें तथा चित्र में दर्शाए गए स्थान पर अँग्रेजी शब्द टाइप करें और फिर GO क्लिक करें -
                                http://www.cstt.nic.in/#


Definitional Dictionaries में 34 विषयों के पारिभाषिक कोश उपलब्ध हैं जिनमें विस्तृत परिभाषाएँ दी गई हैं। लिंक नीचे दिया जा रहा है-
              http://csttindia.in/

(वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग से साभार)

प्रवीण परीक्षा प्रथम प्रश्न पत्र

[ दूरदराज़ के इलाकों में कार्यरत कई मित्रों  की शिकायत थी कि प्रवीण परीक्षा का कोई प्रश्न पत्र 'हिन्दी सबके लिए' में नहीं दिया गया है। उनकी माँग पर प्रवीण परीक्षा नवम्बर 2011 के प्रथम प्रश्न पत्र की सामग्री दो पृष्ठों में संपादित कर दी जा रही है। द्वितीय प्रश्न पत्र की सामग्री भी एक-दो दिन में दे दी जाएगी।] 

Apr 24, 2012

जनाब वसीम बरेलवी जी की एक ग़ज़ल पेश है

अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मेरी अह्द-ए-वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा

-वसीम बरेलवी

हिंदी सीखने के लिए दो नए लिंक

1
बहुत दिन बाद आज फिर से दो नए लिंक निशुल्क हिंदी सीखने के लिए यहाँ दिए जा रहे हैं। पहला लिंक केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की वेबसाइट से आपको  जोड़ेगा। इस साइट पर आपको "ऑनलाइन हिंदी भाषा दक्षता प्रमाणपत्र पाठावली" मिलेगी। यह पाठ्यक्रम हिंदी शिक्षण योजना के पुराने प्रबोध,  प्रवीण पाठ्यक्रमों का संगम जैसा है। पाथावली मेन कुछ नूतन तथा आकर्षक प्रयोग किए गए हैं जिनका लाभ हिंदी शिक्षण योजना के प्रबोध, प्रवीण के प्रशिक्षार्थी भी उठा सकते हैं। एक बार जरूर आज़माएँ- बस एक क्लिक की ही तो बात है-

(सौजन्य केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा)

2
दूसरा लिंक केंद्रीय हिंदी निदेशालय के ऑनलाइन पाठ्यक्रम का है जिसे सीडैक ने तैयार किया है। राजभाषा विभाग के लीला हिंदी पाठ्यक्रम भी सीडैक ने ही तैयार किए हैं अत: कुछ समानता का एहसास अवश्य होगा। एक बार परखने में क्या जाता है-  
 (सौजन्य सीएचडी एवं सीडैक)
 

Apr 17, 2012

एक कहानी ऐसी भी.......

(यह कहानी श्री महेंद्र कुमार जी ने मुझे अप्रेल 2010 में ईमेल द्वारा भेजी थी। कहानी "बरहा देवनागरी" फॉन्ट में थी और मेरे लिए इसे यूनिकोड में परिवर्तित कर पाना एवरेस्ट फतह कर पाने जैसा हो गया। श्री जगदीप दाँगी जी से राजभाषा समूह पर एक पोस्ट आई जिसमें सुझाव दिया गया कि उनके द्वारा तैयार प्रखर देवनागरी फॉन्ट कन्वर्टर से बरहा फॉन्ट में बने दस्तावेज़ों को भी शत-प्रतिशत शुद्धता के साथ यूनिकोड में कन्वर्ट किया जा सकता है। प्रखर के डेमो वर्जन का प्रयोग मैं प्रशिक्षण के दौरान काफी समय से कर रहा था मगर आज मुझे प्रखर फॉन्ट कन्वर्टर की मूल प्रति प्राप्त हुई और परिणाम आपके सामने है।  दो साल बाद मैं अपने प्रयास में कितना सफल हुआ और प्रखर की प्रखरता कैसी है जरूर बताइएगा । श्री महेंद्र कुमार जी केंद्रीय विद्यालय सीएलआरआई, चेन्नई में हिन्दी शिक्षक हैं, किसी जमाने में इप्टा से जुड़े रहे हैं और हाल ही में उनकी एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई है।      -अजय मलिक )
एक कहानी ऐसी भी.......

                   महेन्द्र कुमार

शहर का 'इलियट बीच'..... शाम का समय । अक्सर वहाँ सुबह-शाम सैलानी आते । बड़ी चहल-पहल रहती, रौनक रहती । यही वह उपयुक्त जगह थी जिसके एक कोने में बैठकर वे दोनों दोस्त घंटों समय बिताते । यह उनके मिलने और सुख-दुख बाँटने के लिए शायद इस शहर का सर्वाधिक सुरक्षित कोना था । आज भी बड़े उत्साह के साथ शर्मा जी ने आवाज लगाई थी उन्हें, टहलने में साथ देने के लिए । लेकिन पता नहीं क्यों मास्टर साहब ने अपना उत्साह ही नहीं दिखाया । सूनी आँखों से समुद्र की उठती-गिरती लहरों को निहारते हुए उन्होंने शर्मा जी को ही अपने पास बुलाया...... और बैठने के लिए कहा । शर्मा जी ने देखा कि वे काफी उदास और गुमसुम बैठे हैं । इसलिए उन्हें निराश न करने की इच्छा से सोचा कि चलो थोड़ी देर बैठकर गपशप कर लेते हैं फिर......। यह सोचकर कि  "जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहीं बिलोकत पातक भारी", बैठ गए । और पूछा कि आखिर बात क्या है? क्यों आज बड़े गंभीर बने बैठे हैं? कहीं स्कूल में किसी से अनबन तो नहीं हो गई? वैसे स्वभाव से मास्टर साहब बड़े ही धीर-गंभीर व्यक्ति  थे ।

       "नहीं । अनबन क्यों होगी"- बड़ा संक्षिप्त सा उत्तर दिया उन्होंने । तो आखिर वजह क्या है इस गंभीरता की? शर्मा जी ने फिर से सवाल किया ।

Apr 15, 2012

ये कभी भी जाति का विनाश नहीं होने देगें -हस्तक्षेप.कॉम

उपर्युक्त विषय पर हस्तक्षेप . कॉम  पर एक बेहद विचारोत्तेजक लेख है जिसका लिंक निचे दिया जा रहा है-


http://hastakshep.com/?p=17419

Apr 5, 2012

ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है

(जनाब वसीम बरेलवी की एक ग़ज़ल कविताकोश से साभार)


उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है
परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है

मैं क़तरा होके तूफानों से जंग लड़ता हूँ
मुझे बचाना समंदर की जिम्मेदारी है

कोई बताये ये उसके गुरूर-ए-बेजा को
वो जंग हमने लड़ी ही नहीं जो हारी है

दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत
ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है

-वसीम बरेलवी

यदि लैड्ग्वेज बार अक्षम (डिसेबिल) हो जाए ...

कंप्यूटर पर हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में कामकाज का प्रशिक्षण पूरा करके गए एक मित्र ने अपने कंप्यूटर के  विंडोज एक्सपी में भारतीय भाषाएँ यूनिकोड सक्रिय कर लिया। उन्होंने आईएमई-1 तथा माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैड्ग्वेज इनपुट टूल भी इन्स्टाल कर लिया किन्तु टास्क बार पर EN नहीं दिखाई दिया। उन्हों ने फोन पर संपर्क किया तो हमने लैड्ग्वेज बार क्लिक करने के लिए कहा तो जवाब आया लैड्ग्वेज बार तो डिसेबिल है - (नीचे दी गई तस्वीर देखें )



उनके जवाब से थोड़ी उलझन हुई। उनसे निवेदन किया कि जरा एडवांस्ड विकल्प क्लिक करें और नीचे दिए गए चित्र में सिस्टम कोन्फ़िग्रेशन का जो चयन हुआ दिखाई दे रहा  है उसे रद्द यानी डिसलेक्ट करें - 




अब अप्लाई और OK क्लिक करें। अब आपकी लैड्ग्वेज बार नीचे दिए चित्र की तरह सक्रिय हो जाएगी-

अब लैड्ग्वेज बार क्लिक करें और इस विषय पर हमारे 19 अक्तूबर 2011 के आलेख के अनुसार आगे बढ़ें। बस आपकी समस्या का समाधान हो गया।  


Mar 30, 2012

राजभाषा विभाग ने जारी किया वर्ष 2012-13 का वार्षिक कार्यक्रम

राजभाषा विभाग ने वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए वार्षिक कार्यक्रम जारी कर दिया है। इस कार्यक्रम में वर्ष 2011-12 के वार्षिक कार्यक्रम की बजाय लक्ष्यों का आधार वर्ष 2010-11 के कार्यक्रम को बनाया गया लगता है। ज्यादा कुछ बदलाव तो नहीं है लेकिन विदेश स्थित कार्यालयों का वर्ष में एक बार संयुक्त निरीक्षण किए जाने का भी लक्ष्य है। यह निरीक्षण संबंधित मंत्रालय/कार्यालय/उपक्रम के अधिकारियों तथा राजभाषा विभाग के अधिकारियों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा। गृह राज्य मंत्री द्वारा जारी इस कार्यक्रम में हिन्दी में शत-प्रतिशत कार्य करने के लिए विनिर्दिष्ट किए जाने वाले अनुभागों के लिए 40%, 30% तथा 20% का लक्ष्य क्रमश: क, ख और ग क्षेत्र के लिए रखा गया है। कुछ वर्ष पहले तक यह लक्ष्य न्यूनतम 8 अनुभागों का हुआ करता था। विस्तृत कार्यक्रम राजभाषा विभाग की वेबसाइट के नीचे दिए लिंक से डाउन लोड किया जा सकता है- 





Mar 29, 2012

आई फोन और हिन्दी/ इंडिक यूनिकोड के लिए क्विलपैड का कमाल

क्विल पैड टच के जरिये आई फोन में हिंदी यूनिकोड में संदेश लिखना बेहद कमाल का अनुभव है। भारतीय लिपियों की विशिष्टता के कारण, विशेषकर मात्राओं के कारण टंकण की जो समस्या आती है उसका बड़ा ही प्यारा समाधान  क्विल पैड टच ने उपलब्ध कराया है। टच स्क्रीन पर जब भी मात्रा लगानी हो तो टाइप करने की बजाय अंगुली से अपनी लिखावट में मात्रा लगा दीजिए काम हो जाएगा, कुछ भी ढूढ़ने ने की आवश्यकता नहीं है। टच क्विलपैड की  इस करामात को नीचे दिए चित्रों से आसानी से समझा जा सकता है-





काश, ब्लैकबेरी भी रिम में कुछ ऐसा कर दे तो बात बन जाए। 
-अजय मलिक  

Mar 12, 2012

"मुझे जीने दो" के बाद "पान सिंह तोमर"

            ज़रूरी नहीं कि मेरी बात पर विश्वास किया जाए याकि मेरे कथन से सहमत हुआ जाए... मगर मुझे लगता है कि दुर्खीम और कारलाइल के सिद्धांतों को समेटती पान सिंह तोमर भारतीय समाज, राजनीति और व्यवस्था पर उठने वाले हर सवाल का जवाब ढूँढती है और इतनी गहराई से ढूँढती है कि स्वयं जवाब मुँह छुपाने को विवश हो जाता है। इसे सिर्फ एक फिल्म कहकर या दो-तीन घंटे का मनोरंजन मानकर भुलाया नहीं जा सकता। इसमें हर वह बात है जो सेल्यूलाइड पर जिंदगी उकेरने के लिए चाहिए। डाकुओं के जीवन पर 'मुझे जीने दो' के बाद शायद यह पहली फिल्म है जो मुझे जीने दो से कई कदम, कई फ़र्लांग, कई मील आगे पहुँच गई है। किसी भी मैडल को मौत  इस रूप में तो नहीं ही मिलनी चाहिए।  काश व्यवस्था और आदमी के बीच इतनी खाई न खिची होती! सभी कलाकारों, निर्देशक, पटकथा लेखक, सिनेमेटोग्राफर को और हर उस शख्स को जो इस फिल्म से जुड़ा है - बधाई। यदि फिल्म देखने का मन है तो पहले 'पान सिंह तोमर' पर विचार करें...  
-अजय मलिक

Mar 10, 2012

25 बरस पहले का हिन्दी जुनून जो आज भी जीने नहीं देता


इंग्लैंड में अंग्रेज़ी कैसे लागू की गई

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति डॉ गणपति चंद्र गुप्त का यह आलेख सितंबर 1985 में धर्मयुग में प्रकाशित हुआ था। आज भी इस आलेख के मायने नहीं बदले हैं।


सदाबहार संगीतकार रवि को श्रद्धांजलि

मेरे पास शब्द नहीं हैं, बस सितंबर 1993 में धर्मयुग में प्रकाशित एक आलेख यहाँ दे रहा हूँ।


Mar 7, 2012

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ

Mar 4, 2012

पान सिंह तोमर, इरफान और बीहड़

कई दिनों से लगातार पान सिंह तोमर की चर्चा सुन रहा हूँ। जब भी इंटरनेट खोलता हूँ तो इरफान नज़र आता है। हर ओर उसकी तारीफ़ों के पुल बाँधे जा रहे हैं... बहुत खुशी होती है उसके अभिनय की तारीफ़ें सुनकर। कभी इरफान से मेरा भी परिचय हुआ करता था... इस ख्याल से खुशी ओर बढ़ जाती है। पान सिंह तोमर फिल्म अभी देख तो नहीं पाया हूँ मगर बहुत जल्दी देखूंगा।
2
आजकल सूखी नदियों में भी बिना पानी उफान आ रहा है। कुछ लोगों ने मान लिया है कि अब नदियों में पानी की जरूरत ही नहीं बची है। भुरभुराती रेत के व्यापार में जो नफा है वह पानी की सिंचाई से उगने वाली फसलों में कहाँ? मगर नदियों का रेत बिना पानी, अधिक दिनों तक नहीं ठहरता। रेत पानी के आने से आता है, रेत के साथ पानी नहीं आता। रेत से किरकिराई आँखें पानी के बिना साफ नहीं हो सकतीं... सुकून पानी से ही मिलता है, रेत अंतत: या तो उड़ जाता है या आँखों की रोशनी लील जाता है। 
3 
न्याय और अन्याय की बाजीगरी से आँखें चौंधियाना छोड़ चुकी हैं। अब थकी हुई आँखों में अंधेरा उतना नहीं चुभता जितनी रोशनी चुभती है। आँखें अंधेरे की आदी हो चली हैं मगर मन अब भी उजाले की आशा लगाए बैठा है। मन की मुराद कभी पूरी होती है भला। मौन सबसे बड़ा हथियार हो सकता है मगर चुप रहने की आदत विकसित ही नहीं हो पाई। अंत में हर बार इसी निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि ईमानदार हो या बे-ईमान सब पैदा होते हैं और अंतत: मर ही जाते हैं, ये दुनिया चलती चली जाती है। जीने के लिए ईमानदारी या बे-इमानी कोई तो बहाना चाहिए...
4 
कुछ लोगों के साथ न्याय हो गया और इसी न्याय के साथ कुछ ऐसे लोग जिनके साथ न्याय करते हुए सुधार का अवसर दिया गया था उन्हें फिर कबाब, शबाब और साक़ी के साथ मयखाने भिजवा दिया गया। नागरिक, समाज और सामाजिक व्यवस्था में कहीं कुछ बड़े... बहुत बड़े परिवर्तन की आवश्यकता है... मगर पूरा विश्व ही अशांति की चपेट में है। तीन लोगों की फिर से आवश्यकता है- गांधी, सुभाष और सरदार पटेल
5 
कल की चिंता में आज को समाप्त कर देना और फिर कल फिर से बीते हुए इस आज की मूर्खताओं का चिंतन करते हुए ज़िंदगी बर्बाद करना, अर्थहीन है मगर आदमी ऐसे ही तो जीता है।
एक बीहड़ है हर शहर में, हर गाँव में, हर कस्बे में और हर आदमी के दिल में और दिमाग सिर्फ दुकान भर रह गए हैं...

Mar 3, 2012

सी टी बी और सीएचटीआई पर हिन्दी समाचार पत्रों में छपी कुछ खबरें




क्रमश: नई दुनियाँ, दैनिक हिंदुस्तान और दैनिक भास्कर से साभार