Jun 10, 2012

काश, शंघाई की टीम से हिन्दी में गोल्डफिंगर बना पाता!

अचानक परीक्षित का फोन आया- अंकल, नेट पर हो तो जल्दी से शंघाई के प्रीमियर की बुकिंग करा लो। मैंने उसके उकसाने पर 4 टिकटें बुक करा लीं।  आज चौथे दिन भी फिल्म दिमाग पर छाई है। चेन्नै में "लगे रहो मुन्ना भाई" के बाद सिनेमा हाल में यह पहली फिल्म थी जो मैंने देखी। फिर कल रॉवड़ी राठौर भी देखी।


आज शंघाई की दो समीक्षाएं डेक्कन क्रॉनिकल में पढ़ीं। प्रतिष्ठित एवं बेहद वरिष्ठ फिल्म समीक्षक ख़ालिद मोहम्मद ने फिल्म को 50% अंक दिए हैं। यदि मुझे इस पर असहमत होने का हक है तो उनके दिए अंकों से मैं शतप्रतिशत असहमत हूँ। दूसरी समीक्षा सुपर्णा शर्मा की है जो शंघाई को 90% अंक देती है। मैं सुपर्णा शर्मा की समीक्षा को काफी हद तक  सटीक मानता हूँ।
शंघाई फिल्म की शुरुआत जरूर थोड़े हिचकोलों के साथ होती है परंतु जब भूमिका बंध जाती है तो  फिल्म उड़ने लगती है। दर्शक उसकी गति से डरता है, सहमता है मगर उड़ान का पूरा मज़ा लेने का लोभ है कि लगातार बढ़ता जाता है। फिल्म का तकनीकी पक्ष जितना मजबूत है उतना ही कलाकारों का अद्वितीय अभिनय। पटकथा, गीत-संगीत, संपादन सब प्रशंसनीय है।



इमरान हाशमी के अभिनय को लेकर हमेशा मेरे मन में संशय रहा है (भाई संजय मासूम क्षमा करें) मगर शंघाई में उसने जोगी परमार को जिस तरह साकार किया है उससे मैं उसका मुरीद बन गया हूँ...



और अभय देओल का तो कहना ही क्या है! कृष्णन के किरदार में दूसरा कौन है जो इतना परफेक्ट हो सकता था? फारूख शेख के अभिनय पर कुछ कहना तो सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा, अभिनय की इतनी समझ भी मुझमें नहीं है कि उनके बारे में कुछ कह सकूँ।


लेकिन प्रोसेनजीत चटर्जी  ने अहमदी की भूमिका में पृथ्वीराज कपूर और सोहराब मोदी की गरजती आवाज और बलराज साहनी के अभिनय की याद ताज़ा कर दी। कालकी कोचलीन ने भी अपनी भूमिका के साथ बेइंसाफ़ी नहीं होने दी।


भग्गू की भूमिका में पितोबास  त्रिपाठी में मुझे एक और इरफान नज़र आया। निर्देशक दिबाकर बनर्जी को बधाई। 
कुल मिलाकर कह सकता हूँ कि अगर मुझे इस फिल्म की टीम को लेकर फिल्म बनाने के लिए कहा जाए तो बेहिचक मैं हिन्दी में "गोल्डफिंगर" बनाऊँ,  अभय देओल को जेम्स बॉन्ड (सियान कोन्नेरी  ) बना डालूँ, इमरान हाशमी को ओड्डजोब (हेरोल्ड सकाटा) और  प्रोसेनजीत चटर्जी को औरी गोल्डफिंगर (गेर्ट फ़ोरबे) की भूमिका दूँ। फिल्म देखने का मन है तो शंघाई जरूर देखें।  
-अजय मलिक

2007 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्रीमती लता रामचंद्रन, पीआरटी, केंद्रीय विद्यालय आईआईटी मद्रास, लीला प्रवीण का प्रशिक्षण ले रहीं हैं।

केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण उपसंस्थान, लीला हिन्दी कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र, चेन्नै में लीला प्रवीण का प्रशिक्षण ले रहीं श्रीमती लता रामचंद्रन , पीआरटी, केंद्रीय विद्यालय आईआईटी मद्रास, वर्ष 2007 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं। उन्होंने अपने विद्यालय के अनेक शिक्षकों को हिन्दी प्रशिक्षण के लिए प्रेरित किया।
(फोटो सौजन्य  केंद्रीय विद्यालय आईआईटी मद्रास)

नराकास (बैंक एवं वि॰सं॰), चेन्नै के सदस्य कार्यालयों के कार्मिकों के लिए आयोजित हिन्दी/इंडिक यूनिकोड कार्यशाला

केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण उपसंस्थान, लीला हिन्दी कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र, चेन्नई में नराकास  (बैंक एवं वि॰सं॰), चेन्नै के सदस्य कार्यालयों के कार्मिकों के लिए आयोजित हिन्दी/इंडिक यूनिकोड कार्यशाला के उद्घाटन  अवसर का एक चित्र। 


    [फोटो सौजन्य नराकास  (बैंक एवं वि॰सं॰) ]

May 18, 2012

बेचारा बनवारी

[एक कहानी... ]
             बेचारा बनवारी
  -अजय मलिक


बनवारी की मुसीबतें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं। वे बिजली का बिल जमा करने गए थे। उस दिन बिल जमा करने की आखरी तारीख थी। लंबी कतार में कई घंटे खड़े रहने के बाद जब उनकी बारी आई तो उन्हें जंग जीत लेने जैसा एहसास होने लगा। मगर जल्द ही उन्हें इस विचार को त्याग देना पड़ा और फिर वे आईपीएल की किसी टीम के आखरी ओवर की अंतिम गेंद पर होने वाले चमत्कार या बिजली गिरने जैसी संभावनाओं पर विचार करने लगे।

बिल बाबू ने उन्हें घूर कर देखा और उनका पाँच सौ का कड़क नोट लौटा दिया। बनवारी ने सवाली नज़रों से देखा तो बिल बाबू ने खरखराती आवाज़ में दुलत्ती जमा दी– “आपका ये नोट सही नहीं है”।

बनवारी : “अच्छा-भला तो है, इसमें खराबी क्या है? नया नोट है, आज ही एटीएम से निकाला है”।

बिल बाबू : “नया नोट क्या खराब नहीं हो सकता?... एटीएम क्या हमसे ज्यादा जानता है?”

May 7, 2012

लिनक्स : दा 'BOSS'

कई मित्रों ने पूछा है कि क्या वाकई हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में लिनक्स में यूनिकोड में काम करना संभव है! उनकी शंका का निवारण इस बात से हो जाना चाहिए कि हम सफलतापूर्वक 6 प्रशिक्षण कार्यक्रम इसके बारे में चेन्नई में चला चुके हैं। लिनक्स  'BOSS' यानी भारत ऑपरेटिंग सिस्टम सोल्युशंस के BOSS 4.1 में 3 की-बोर्ड्स के साथ हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में यूनिकोड में काम करने की सुविधा है। जिन की-बोर्ड्स की बात की गई है इनमें इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड भी शामिल है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी नीचे दिए लिंक से प्राप्त की जा सकती है तथा इसी लिंक की सहायता से लगभग 4.2 जीबी के इस ऑपरेटिंग सिस्टम को निशुल्क डाउन लोड भी किया जा सकता है-


(सौजन्य सीडैक चेन्नै)

Apr 30, 2012

प्रवीण परीक्षा द्वितीय प्रश्न पत्र

[सुबह किए वादे के अनुसार प्रवीण परीक्षा का द्वितीय प्रश्न पत्र (नवम्बर 2011) संशोधित कर दिया जा रहा है ]



वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की Definitional Dictionaries तथा अंग्रेज़ी से हिन्दी शब्दार्थ की सुविधा

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की Definitional Dictionaries तथा अंग्रेज़ी से हिन्दी शब्दार्थ की सुविधा का लाभ उठाया जा सकता है।  हिन्दी से अँग्रेजी शब्दार्थ के लिए लिंक नीचे दिया जा रहा है। लिंक को क्लिक करें तथा चित्र में दर्शाए गए स्थान पर अँग्रेजी शब्द टाइप करें और फिर GO क्लिक करें -
                                http://www.cstt.nic.in/#


Definitional Dictionaries में 34 विषयों के पारिभाषिक कोश उपलब्ध हैं जिनमें विस्तृत परिभाषाएँ दी गई हैं। लिंक नीचे दिया जा रहा है-
              http://csttindia.in/

(वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग से साभार)

प्रवीण परीक्षा प्रथम प्रश्न पत्र

[ दूरदराज़ के इलाकों में कार्यरत कई मित्रों  की शिकायत थी कि प्रवीण परीक्षा का कोई प्रश्न पत्र 'हिन्दी सबके लिए' में नहीं दिया गया है। उनकी माँग पर प्रवीण परीक्षा नवम्बर 2011 के प्रथम प्रश्न पत्र की सामग्री दो पृष्ठों में संपादित कर दी जा रही है। द्वितीय प्रश्न पत्र की सामग्री भी एक-दो दिन में दे दी जाएगी।] 

Apr 24, 2012

जनाब वसीम बरेलवी जी की एक ग़ज़ल पेश है

अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मेरी अह्द-ए-वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा

-वसीम बरेलवी

हिंदी सीखने के लिए दो नए लिंक

1
बहुत दिन बाद आज फिर से दो नए लिंक निशुल्क हिंदी सीखने के लिए यहाँ दिए जा रहे हैं। पहला लिंक केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की वेबसाइट से आपको  जोड़ेगा। इस साइट पर आपको "ऑनलाइन हिंदी भाषा दक्षता प्रमाणपत्र पाठावली" मिलेगी। यह पाठ्यक्रम हिंदी शिक्षण योजना के पुराने प्रबोध,  प्रवीण पाठ्यक्रमों का संगम जैसा है। पाथावली मेन कुछ नूतन तथा आकर्षक प्रयोग किए गए हैं जिनका लाभ हिंदी शिक्षण योजना के प्रबोध, प्रवीण के प्रशिक्षार्थी भी उठा सकते हैं। एक बार जरूर आज़माएँ- बस एक क्लिक की ही तो बात है-

(सौजन्य केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा)

2
दूसरा लिंक केंद्रीय हिंदी निदेशालय के ऑनलाइन पाठ्यक्रम का है जिसे सीडैक ने तैयार किया है। राजभाषा विभाग के लीला हिंदी पाठ्यक्रम भी सीडैक ने ही तैयार किए हैं अत: कुछ समानता का एहसास अवश्य होगा। एक बार परखने में क्या जाता है-  
 (सौजन्य सीएचडी एवं सीडैक)
 

Apr 17, 2012

एक कहानी ऐसी भी.......

(यह कहानी श्री महेंद्र कुमार जी ने मुझे अप्रेल 2010 में ईमेल द्वारा भेजी थी। कहानी "बरहा देवनागरी" फॉन्ट में थी और मेरे लिए इसे यूनिकोड में परिवर्तित कर पाना एवरेस्ट फतह कर पाने जैसा हो गया। श्री जगदीप दाँगी जी से राजभाषा समूह पर एक पोस्ट आई जिसमें सुझाव दिया गया कि उनके द्वारा तैयार प्रखर देवनागरी फॉन्ट कन्वर्टर से बरहा फॉन्ट में बने दस्तावेज़ों को भी शत-प्रतिशत शुद्धता के साथ यूनिकोड में कन्वर्ट किया जा सकता है। प्रखर के डेमो वर्जन का प्रयोग मैं प्रशिक्षण के दौरान काफी समय से कर रहा था मगर आज मुझे प्रखर फॉन्ट कन्वर्टर की मूल प्रति प्राप्त हुई और परिणाम आपके सामने है।  दो साल बाद मैं अपने प्रयास में कितना सफल हुआ और प्रखर की प्रखरता कैसी है जरूर बताइएगा । श्री महेंद्र कुमार जी केंद्रीय विद्यालय सीएलआरआई, चेन्नई में हिन्दी शिक्षक हैं, किसी जमाने में इप्टा से जुड़े रहे हैं और हाल ही में उनकी एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई है।      -अजय मलिक )
एक कहानी ऐसी भी.......

                   महेन्द्र कुमार

शहर का 'इलियट बीच'..... शाम का समय । अक्सर वहाँ सुबह-शाम सैलानी आते । बड़ी चहल-पहल रहती, रौनक रहती । यही वह उपयुक्त जगह थी जिसके एक कोने में बैठकर वे दोनों दोस्त घंटों समय बिताते । यह उनके मिलने और सुख-दुख बाँटने के लिए शायद इस शहर का सर्वाधिक सुरक्षित कोना था । आज भी बड़े उत्साह के साथ शर्मा जी ने आवाज लगाई थी उन्हें, टहलने में साथ देने के लिए । लेकिन पता नहीं क्यों मास्टर साहब ने अपना उत्साह ही नहीं दिखाया । सूनी आँखों से समुद्र की उठती-गिरती लहरों को निहारते हुए उन्होंने शर्मा जी को ही अपने पास बुलाया...... और बैठने के लिए कहा । शर्मा जी ने देखा कि वे काफी उदास और गुमसुम बैठे हैं । इसलिए उन्हें निराश न करने की इच्छा से सोचा कि चलो थोड़ी देर बैठकर गपशप कर लेते हैं फिर......। यह सोचकर कि  "जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहीं बिलोकत पातक भारी", बैठ गए । और पूछा कि आखिर बात क्या है? क्यों आज बड़े गंभीर बने बैठे हैं? कहीं स्कूल में किसी से अनबन तो नहीं हो गई? वैसे स्वभाव से मास्टर साहब बड़े ही धीर-गंभीर व्यक्ति  थे ।

       "नहीं । अनबन क्यों होगी"- बड़ा संक्षिप्त सा उत्तर दिया उन्होंने । तो आखिर वजह क्या है इस गंभीरता की? शर्मा जी ने फिर से सवाल किया ।

Apr 15, 2012

ये कभी भी जाति का विनाश नहीं होने देगें -हस्तक्षेप.कॉम

उपर्युक्त विषय पर हस्तक्षेप . कॉम  पर एक बेहद विचारोत्तेजक लेख है जिसका लिंक निचे दिया जा रहा है-


http://hastakshep.com/?p=17419

Apr 5, 2012

ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है

(जनाब वसीम बरेलवी की एक ग़ज़ल कविताकोश से साभार)


उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है
परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है

मैं क़तरा होके तूफानों से जंग लड़ता हूँ
मुझे बचाना समंदर की जिम्मेदारी है

कोई बताये ये उसके गुरूर-ए-बेजा को
वो जंग हमने लड़ी ही नहीं जो हारी है

दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत
ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है

-वसीम बरेलवी

यदि लैड्ग्वेज बार अक्षम (डिसेबिल) हो जाए ...

कंप्यूटर पर हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में कामकाज का प्रशिक्षण पूरा करके गए एक मित्र ने अपने कंप्यूटर के  विंडोज एक्सपी में भारतीय भाषाएँ यूनिकोड सक्रिय कर लिया। उन्होंने आईएमई-1 तथा माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैड्ग्वेज इनपुट टूल भी इन्स्टाल कर लिया किन्तु टास्क बार पर EN नहीं दिखाई दिया। उन्हों ने फोन पर संपर्क किया तो हमने लैड्ग्वेज बार क्लिक करने के लिए कहा तो जवाब आया लैड्ग्वेज बार तो डिसेबिल है - (नीचे दी गई तस्वीर देखें )



उनके जवाब से थोड़ी उलझन हुई। उनसे निवेदन किया कि जरा एडवांस्ड विकल्प क्लिक करें और नीचे दिए गए चित्र में सिस्टम कोन्फ़िग्रेशन का जो चयन हुआ दिखाई दे रहा  है उसे रद्द यानी डिसलेक्ट करें - 




अब अप्लाई और OK क्लिक करें। अब आपकी लैड्ग्वेज बार नीचे दिए चित्र की तरह सक्रिय हो जाएगी-

अब लैड्ग्वेज बार क्लिक करें और इस विषय पर हमारे 19 अक्तूबर 2011 के आलेख के अनुसार आगे बढ़ें। बस आपकी समस्या का समाधान हो गया।  


Mar 30, 2012

राजभाषा विभाग ने जारी किया वर्ष 2012-13 का वार्षिक कार्यक्रम

राजभाषा विभाग ने वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए वार्षिक कार्यक्रम जारी कर दिया है। इस कार्यक्रम में वर्ष 2011-12 के वार्षिक कार्यक्रम की बजाय लक्ष्यों का आधार वर्ष 2010-11 के कार्यक्रम को बनाया गया लगता है। ज्यादा कुछ बदलाव तो नहीं है लेकिन विदेश स्थित कार्यालयों का वर्ष में एक बार संयुक्त निरीक्षण किए जाने का भी लक्ष्य है। यह निरीक्षण संबंधित मंत्रालय/कार्यालय/उपक्रम के अधिकारियों तथा राजभाषा विभाग के अधिकारियों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा। गृह राज्य मंत्री द्वारा जारी इस कार्यक्रम में हिन्दी में शत-प्रतिशत कार्य करने के लिए विनिर्दिष्ट किए जाने वाले अनुभागों के लिए 40%, 30% तथा 20% का लक्ष्य क्रमश: क, ख और ग क्षेत्र के लिए रखा गया है। कुछ वर्ष पहले तक यह लक्ष्य न्यूनतम 8 अनुभागों का हुआ करता था। विस्तृत कार्यक्रम राजभाषा विभाग की वेबसाइट के नीचे दिए लिंक से डाउन लोड किया जा सकता है- 





Mar 29, 2012

आई फोन और हिन्दी/ इंडिक यूनिकोड के लिए क्विलपैड का कमाल

क्विल पैड टच के जरिये आई फोन में हिंदी यूनिकोड में संदेश लिखना बेहद कमाल का अनुभव है। भारतीय लिपियों की विशिष्टता के कारण, विशेषकर मात्राओं के कारण टंकण की जो समस्या आती है उसका बड़ा ही प्यारा समाधान  क्विल पैड टच ने उपलब्ध कराया है। टच स्क्रीन पर जब भी मात्रा लगानी हो तो टाइप करने की बजाय अंगुली से अपनी लिखावट में मात्रा लगा दीजिए काम हो जाएगा, कुछ भी ढूढ़ने ने की आवश्यकता नहीं है। टच क्विलपैड की  इस करामात को नीचे दिए चित्रों से आसानी से समझा जा सकता है-





काश, ब्लैकबेरी भी रिम में कुछ ऐसा कर दे तो बात बन जाए। 
-अजय मलिक  

Mar 12, 2012

"मुझे जीने दो" के बाद "पान सिंह तोमर"

            ज़रूरी नहीं कि मेरी बात पर विश्वास किया जाए याकि मेरे कथन से सहमत हुआ जाए... मगर मुझे लगता है कि दुर्खीम और कारलाइल के सिद्धांतों को समेटती पान सिंह तोमर भारतीय समाज, राजनीति और व्यवस्था पर उठने वाले हर सवाल का जवाब ढूँढती है और इतनी गहराई से ढूँढती है कि स्वयं जवाब मुँह छुपाने को विवश हो जाता है। इसे सिर्फ एक फिल्म कहकर या दो-तीन घंटे का मनोरंजन मानकर भुलाया नहीं जा सकता। इसमें हर वह बात है जो सेल्यूलाइड पर जिंदगी उकेरने के लिए चाहिए। डाकुओं के जीवन पर 'मुझे जीने दो' के बाद शायद यह पहली फिल्म है जो मुझे जीने दो से कई कदम, कई फ़र्लांग, कई मील आगे पहुँच गई है। किसी भी मैडल को मौत  इस रूप में तो नहीं ही मिलनी चाहिए।  काश व्यवस्था और आदमी के बीच इतनी खाई न खिची होती! सभी कलाकारों, निर्देशक, पटकथा लेखक, सिनेमेटोग्राफर को और हर उस शख्स को जो इस फिल्म से जुड़ा है - बधाई। यदि फिल्म देखने का मन है तो पहले 'पान सिंह तोमर' पर विचार करें...  
-अजय मलिक

Mar 10, 2012

25 बरस पहले का हिन्दी जुनून जो आज भी जीने नहीं देता


इंग्लैंड में अंग्रेज़ी कैसे लागू की गई

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति डॉ गणपति चंद्र गुप्त का यह आलेख सितंबर 1985 में धर्मयुग में प्रकाशित हुआ था। आज भी इस आलेख के मायने नहीं बदले हैं।


सदाबहार संगीतकार रवि को श्रद्धांजलि

मेरे पास शब्द नहीं हैं, बस सितंबर 1993 में धर्मयुग में प्रकाशित एक आलेख यहाँ दे रहा हूँ।


Mar 7, 2012

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ

Mar 4, 2012

पान सिंह तोमर, इरफान और बीहड़

कई दिनों से लगातार पान सिंह तोमर की चर्चा सुन रहा हूँ। जब भी इंटरनेट खोलता हूँ तो इरफान नज़र आता है। हर ओर उसकी तारीफ़ों के पुल बाँधे जा रहे हैं... बहुत खुशी होती है उसके अभिनय की तारीफ़ें सुनकर। कभी इरफान से मेरा भी परिचय हुआ करता था... इस ख्याल से खुशी ओर बढ़ जाती है। पान सिंह तोमर फिल्म अभी देख तो नहीं पाया हूँ मगर बहुत जल्दी देखूंगा।
2
आजकल सूखी नदियों में भी बिना पानी उफान आ रहा है। कुछ लोगों ने मान लिया है कि अब नदियों में पानी की जरूरत ही नहीं बची है। भुरभुराती रेत के व्यापार में जो नफा है वह पानी की सिंचाई से उगने वाली फसलों में कहाँ? मगर नदियों का रेत बिना पानी, अधिक दिनों तक नहीं ठहरता। रेत पानी के आने से आता है, रेत के साथ पानी नहीं आता। रेत से किरकिराई आँखें पानी के बिना साफ नहीं हो सकतीं... सुकून पानी से ही मिलता है, रेत अंतत: या तो उड़ जाता है या आँखों की रोशनी लील जाता है। 
3 
न्याय और अन्याय की बाजीगरी से आँखें चौंधियाना छोड़ चुकी हैं। अब थकी हुई आँखों में अंधेरा उतना नहीं चुभता जितनी रोशनी चुभती है। आँखें अंधेरे की आदी हो चली हैं मगर मन अब भी उजाले की आशा लगाए बैठा है। मन की मुराद कभी पूरी होती है भला। मौन सबसे बड़ा हथियार हो सकता है मगर चुप रहने की आदत विकसित ही नहीं हो पाई। अंत में हर बार इसी निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि ईमानदार हो या बे-ईमान सब पैदा होते हैं और अंतत: मर ही जाते हैं, ये दुनिया चलती चली जाती है। जीने के लिए ईमानदारी या बे-इमानी कोई तो बहाना चाहिए...
4 
कुछ लोगों के साथ न्याय हो गया और इसी न्याय के साथ कुछ ऐसे लोग जिनके साथ न्याय करते हुए सुधार का अवसर दिया गया था उन्हें फिर कबाब, शबाब और साक़ी के साथ मयखाने भिजवा दिया गया। नागरिक, समाज और सामाजिक व्यवस्था में कहीं कुछ बड़े... बहुत बड़े परिवर्तन की आवश्यकता है... मगर पूरा विश्व ही अशांति की चपेट में है। तीन लोगों की फिर से आवश्यकता है- गांधी, सुभाष और सरदार पटेल
5 
कल की चिंता में आज को समाप्त कर देना और फिर कल फिर से बीते हुए इस आज की मूर्खताओं का चिंतन करते हुए ज़िंदगी बर्बाद करना, अर्थहीन है मगर आदमी ऐसे ही तो जीता है।
एक बीहड़ है हर शहर में, हर गाँव में, हर कस्बे में और हर आदमी के दिल में और दिमाग सिर्फ दुकान भर रह गए हैं...

Mar 3, 2012

सी टी बी और सीएचटीआई पर हिन्दी समाचार पत्रों में छपी कुछ खबरें




क्रमश: नई दुनियाँ, दैनिक हिंदुस्तान और दैनिक भास्कर से साभार

Feb 25, 2012

Ace अनुवादक के बाद अनुवादकों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न

अब आपसे क्या छुपाना , इस पोस्ट के बाद बहुत सारे मित्र कोसेंगे मगर क्या करूँ बात ही कुछ ऐसी है कि चुप रह ही नहीं सकता। आज कई घंटों से Ace अनुवादक सॉफ्टवेयर के परीक्षण संस्करण पर लगा हूँ और इस छोटे से सॉफ्टवेयर का कायल सा हो गया हूँ।  इसका आकार मात्र 2.09 एम बी है और जनाब काम ऐसा कि अनुवादकों की नौकरी पर प्रश्न चिह्न लगा जाए । मैं जानता हूँ इसके बाद अनुवाद करनेवाले, अनुवाद सिखाने वाले और अनुवाद का व्यापार चलाने वाले मुझे नहीं छोड़ेंगे...
आज मुझे कई तरह के शकों ने भी घेर लिया है... आखिर क्या वजह है कि मंत्र राजभाषा अपनी पूर्णता यानी पर्फ़ेक्सन तक नहीं पहुँच पाया... क्या यह 80-90 प्रतिशत पर्फ़ेक्सन नहीं पा सकता था? यह इन्स्टालेशन  की जटिलताओं में क्यों घिर कर रह गया? गूगल ट्रांसलेट क्यों तेजी से बढ़ा...
बहरहाल एक वरिष्ठ एवं अनुभवी अधिकारी से आज मिलने का सौभाग्य मिला और उन्होंने जो बताया, उस पर एक बार तो यकीन ही नहीं आया...
उन्होंने कहा -पीडीएफ तक का अनुवाद कर देता है...
हालांकि AceTranslator के परीक्षण संस्करण से पीडीएफ का अनुवाद तो संभव नहीं हो सका मगर जनाब हिंदी से अङ्ग्रेज़ी, अँग्रेजीसे हिंदी, हिंदी से तमिल, कन्नड़, तेलुगू, बांग्ला, गुजराती भाषाओं और इन भाषाओं से हिंदी, अँग्रेजी और विश्व की अन्य अनेक भाषाओं में जो अनुवाद इस सॉफ्टवेयर ने किया वह बस थोड़ा सा ही सुधार चाहता है। कहना तो यही चाहता हूँ कि अब तक जितने अनुवाद सॉफ्टवेयर देखे या आजमाए उनमें सबसे बेहतरीन मैंने AceTranslator को पाया...
लिंक नीचे दे रहा हूँ जो भी चाहे, डाउन लोड कर आजमाए-


  
-अजय मलिक

Feb 23, 2012

केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान/ केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो / क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय में कार्यरत अधिकारियों/कर्मचारियों की स्थानतारण नीति (15-02-2012)



इक बार कहो तुम मेरी हो - इब्ने इंशा


इक बार कहो तुम मेरी हो  

-इब्ने इंशा

हम घूम चुके बस्ती-बन में
इक आस का फाँस लिए मन में
कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो
जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में
कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो


दीद=दर्शन; सेरी=तॄप्ति; सूद-ख़सारे=लाभ-हानि

(कविताकोश के सौजन्य से)

नर हो, न निराश करो मन को - मैथिलीशरण गुप्त


मेरे  बहुत  सारे  मित्र  निराश, उदास, बदहवास से लग रहे हैं. उन सब के लिए  मैथिलीशरण गुप्त जी की बचपन में पढ़ी यह कविता प्रस्तुत है -  


नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को


संभलों कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो,
न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को


निज़ गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को


प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को


किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को


करके विधि वाद न खेद करो
निज़ लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो 



(कविताकोश के सौजन्य से )

Feb 4, 2012

दिल्लीवालों की लू उतार दी आशा भोंसले व तीजन बाई ने

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ये दोनों देवियाँ 'लिम्का बुक ऑफ रेकार्ड' के कार्यक्रम में दिल्ली आई थीं. संगीत संबंधी यह कार्यक्रम पूरी तरह अंग्रेजी में चल रहा था. यह कोई अपवाद नहीं था. आजकल दिल्ली में कोई भी कार्यक्रम यदि किसी पांच-सितारा होटल या इंडिया इंटरनेशनल सेंटर जैसी जगहों पर होता है तो वहां हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा के इस्तेमाल का प्रश्न ही नहीं उठता. इस कार्यक्रम में भी सभी वक्तागण एक के बाद एक अंग्रेजी झाड़ रहे थे. मंच संचालक भी अंग्रेजी बोल रहा था.
जब तीजनबाई के बोलने की बारी आई तो उन्होंने कहा कि यहां का माहौल देखकर मैं तो डर गई हूं
आप लोग क्या-क्या बोलते रहे, मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा. मैं तो अंग्रेजी बिल्कुल भी नहीं जानती
तीजनबाई को सम्मानित करने के लिए बुलाया गया था लेकिन जो कुछ वहां हो रहा था, वह उनका अपमान ही था लेकिन श्रोताओं में से कोई भी उठकर कुछ नहीं बोला. तीजनबाई के बोलने के बावजूद कार्यक्रम बड़ी बेशर्मी से अंग्रेजी में ही चलता रहा. इस पर आशा भोंसले झल्ला गईं.

उन्होंने कहा कि मुझे पहली बार पता चला कि दिल्ली में सिर्फ अंग्रेजी बोली जाती है.  लोग अपनी भाषाओं में बात करने में भी शर्म महसूस करते हैं. उन्होंने कहा मैं अभी लंदन से ही लौटी हूं. वहां लोग अंग्रेजी में बोले तो बात समझ में आती है लेकिन दिल्ली का यह माजरा देखकर मैं दंग हूं.
उन्होंने श्रोताओं से फिर पूछा कि आप हिंदी नहीं बोलते, यह ठीक है लेकिन आशा है, मैं जो बोल रही हूं, उसे समझते तो होंगे? दिल्लीवालों पर इससे बड़ी लानत क्या मारी जा सकती थी?

इसके बावजूद जब मंच-संचालक ने अंग्रेजी में ही आशाजी से आग्रह किया कि वे कोई गीत सुनाएँ तो उन्होंने क्या करारा तमाचा जमाया? उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम कोका कोला कंपनी ने आयोजित किया है. आपकी ही कंपनी की कोक मैंने अभी-अभी पी है. मेरा गला खराब हो गया है,
मैं गा नहीं सकती.

क्या हमारे देश के नकलची और गुलाम बुद्घिजीवी आशा भोंसले और तीजनबाई से कोई सबक लेंगे? ये वे लोग हैं, जो मौलिक है और प्रथम श्रेणी के हैं जबकि सड़ी-गली अंग्रेजी झाड़नेवाले हमारे तथाकथित बुद्घिजीवियों को पश्चिमी समाज नकलची और दोयम दर्जे का मानता है. वह उन्हें नोबेल और बुकर आदि पुरस्कार इसलिए भी दे देता है कि वे अपने-अपने देशों में अंग्रेजी के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के मुखर चौकीदार की भूमिका निभाते रहें. उनकी जड़ें अपनी जमीन में नीचे नहीं होतीं, ऊपर होती हैं. वे चमगादड़ों की तरह सिर के बल उल्टे लटके होते हैं. आशा भोंसले ने दिल्लीवालों के बहाने उन्हीं की खबर ली है.

(दा भास्कर' से साभार  )

Jan 26, 2012

जब किसी इंसान या पाषाण में भगवान मिल जाएँ...

यूँ तो मुझे शायद हक नहीं है कि कुछ सोचूँ मगर कभी-कभी परिस्थितियाँ मजबूर कर देती हैं सोचने के लिए, और तब, न चाहते हुए भी मैं सोचने लगता हूँ। बार-बार भरसक प्रयास करता हूँ कि सोचने का यह कष्टसाध्य क्रम ठहर जाए, थोड़ा विराम ले पर जब एक बार यह शुरू होता है तो फिर क्या मजाल कि रुक जाए। मानो सारा ब्रह्मांड सामने आ जाता है, लोक-परलोक, आकाश-पाताल, स्वर्ग-नर्क कुछ भी तो नहीं छूटता। बस छूट जाता है पसीना और अपार ब्रह्म में न जाने कहाँ खो जाती है नींद। फिर नींद को ढूँढते-ढूँढते कई और चक्कर लग जाते हैं जाने कितने ग्रह, नक्षत्र और तारों के...सितारों के पार, चाँद के उस ओर कहीं कुछ नज़र नहीं आता, थक-हार कर न जाने कब कुछ बेहोशी सी छा जाती है।

Jan 24, 2012

केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण उपसंस्‍थान,चेन्नै में आयोजित होने वाले ‘’कंप्‍यूटर पर हिंदी के आई टी टूल्स का प्रशिक्षण कार्यक्रम‘’ फरवरी-मार्च -2012.

केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण उपसंस्थान, चेन्नै में दिसंबर-2011 में सम्पन्न ‘कंप्‍यूटर पर हिंदी के प्रयोग हेतु आधारभूत प्रशिक्षण कार्यक्रमों (२) के प्रतिभागी’


क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन बेंगलुरु-2011 की कुछ तस्वीरें

किसी मित्र ने क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन बेंगलुरु की ढेर सारी तस्वीरें भेजी हैं। यहाँ पेश है कुछ चुनिंदा तस्वीरें-

6 से 10 घंटों में स्वयं इन्स्क्रिप्ट टंकण सीखने के लिए निशुल्क डाउनलोड करें Aasaan हिन्दी टाइपिंग ट्यूटर

लगभग 8 वर्ष पूर्व एक मित्र ने एक द्विभाषी सॉफ्टवेयर 'श्री शक्ति' की डेमो सीडी  दी थी। उसी पर एक "टाइपिंग ट्यूटर" यानी "हिन्दी टंकण शिक्षक" सॉफ्टवेयर भी दिया गया था। उस वक्त तक यूनिकोड का इतना चलन नहीं था। आज हर ओर यूनिकोड की चर्चा है। हिन्दी टाइपिंग ट्यूटर से आप देवनागरी इन्स्क्रिप्ट टंकण स्वयं 6 से 10 घंटे के अभ्यास से सीख़ सकते हैं। इन्स्क्रिप्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आप हिन्दी के साथ-साथ स्वत: अन्य सभी भारतीय भाषाओं की टाइपिंग भी सीख जाते हैं। यह टाइपिंग ट्यूटर सॉफ्टवेयर कितना लाजवाब है यह आप स्वयं प्रयोग करेंगे तो जानेंगे। न किसी क्लास में जाने का झंझट, न किसी की मदद की जरूरत, बस डाउनलोड कीजिए और शुरू हो जाइए... और सब कुछ मुफ्त में...  

हम नीचे Aasaan टाइपिंग ट्यूटर का लिंक दे रहे हैं, जरा आजमाइए तो सही -  


हिन्दी टंकण/ शब्द संसाधन के पुराने प्रश्न-पत्र...मित्रों की माँग पर

काफी दिनों से कुछ मित्र हिन्दी टंकण/  शब्द संसाधन के प्रश्न-पत्रों की माँग कर रहे थे। उनकी सुविधा के लिए वर्ष 2007 में सम्पन्न कंप्यूटर/मैन्युअल/इलेक्ट्रानिक परीक्षा के प्रश्न-पत्र दे रहे हैं। हिन्दी टंकण परीक्षा में दो प्रश्न-पत्र होते हैं। कंप्यूटर/मैन्युअल/इलेक्ट्रानिक हिन्दी टंकण/  शब्द संसाधन  में शायद कोई अन्तर नहीं होता।

Jan 8, 2012

गुजरात में गुजरातियों के लिए हिंदी एक विदेशी भाषा है- एक समाचार

'दा टाइम्स ऑफ इंडिया' में छपी एक खबर के अनुसार माननीय गुजरात उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में गुजरात में गुजरातियों के लिए हिंदी को एक विदेशी भाषा बताया है। पूरी खबर नीचे दिए लिंक से पढ़ी जा सकती है। 

वैसे यह बात बिलकुल सही है कि जिस भाषा की पढ़ाई किसी राज्य विशेष के प्राथमिक विद्यालयों में अनिवार्यत: नहीं कराई जाती तथा जिस राज्य के निवासियों की मातृभाषा वह भाषा नहीं है, उसे विदेशी भाषा ही माना जाता है। मेरा भी व्यक्तिगत रूप से यही मानना है कि हिंदी शिक्षण योजना के अंतर्गत हिंदी न जानने वालों को हिंदी परदेशी / विदेशी भाषा के रूप में ही पढ़ाई जाती है। यहाँ परदेशी / विदेशी भाषा से अभिप्राय: भारत से इतर किसी अन्य देश की भाषा से नहीं लिया जाना चाहिए।
पूरा आदेश पढ़ने के लिए लिंक नीचे दिया गया है-
http://gujarathc-casestatus.nic.in/gujarathc/showoj.jsp?side=C&casetype=SCA&caseno=10826&caseyr=2011&orddate=29/12/2011&ordno=6&incrno=8461&findcatg=txtSearch  

Dec 31, 2011

व्हाई दिस कोलावरी डी... यह किस भाषा का "सॉन्ग" है!

यह इस वर्ष की अंतिम पोस्ट है। अपनी भाषाओं की चिंता करते हुए काफी घबराहट के साथ मैं भी कोलावरी डी' का आनंद ले रहा हूँ। लगातार यही विचार मन में आता है कि इस गाने में तमिल अथवा हिंदी के कितने शब्द हैं? वर्ष 1991 तथा 2001 की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार हमारे देश में तमिल बोलने वालों का प्रतिशत 6.32 से घटकर 5.91 पर आ गया। वर्ष 2011 की जनगणना के पूरे आँकड़े अभी नहीं मिल पाए हैं। प्रश्न यही है कि हम कहाँ जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं? तमिल फिल्मों के सितारे और पूरा देश एक ऐसे गाने को तमिल का गाना मानकर वह-वाह कर रहे हैं जिसमें तमिल का शायद ही कोई शब्द है। तमिल का लहजा ज़रूर मौजूद कहा जा सकता है। इस गीत की धुन में नयापन है, पकड़ है, माधुर्य है मगर अपनी कोई भी भाषा या उसका कोई शब्द ... शायद नहीं है। आने वाले नए वर्ष 2012 में इस बारे में चिंतन जरूर किया जाना चाहिए कि क्या ऐसे गानों से हम जाने-अंजाने अपनी भाषाओं को तो  भुलाने के दुष्चक्र में नहीं फँसते जा रहे हैं। मुझे ऐसी एक भी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी, जिसमें इस गाने की भाषा पर चिंता व्यक्त की गई हो। हो सकता है कुछ लोग सहमत न हों परंतु यह मेरा व्यक्तिगत विचार है कि तमिल भाषा का  विकास, हिंदी के विकास के लिए सर्वाधिक जरूरी है। तमिल को मजबूत बनाने से हिंदी भी स्वत: मजबूत होती है क्योंकि इससे अंग्रेज़ी की गति में ठहराव आता है। 
नव वर्ष 2012 की शुभकामनाओं के साथ, मैं एक हिंदी भाषी भारतीय, अपनी सभी भाषाओं के उत्तरोत्तर विकास की कामना करते हुए आग्रह करना चाहता हूँ कि कोलावरी डी' पर आप भी सोचिए... संगीत को सहज स्वीकारिये मगर अपनी भाषाओं के सुर, लय, ताल को ताक पर मत रखिए।  

नववर्ष 2012 हमारी सभी भाषाओं के लिए भी शुभ हो।

-अजय मलिक

नए साल की शुभकामनाएँ

हिंदी/इंडिक सक्रिय करने के लिए अजय मलिक की एक वीडियो फिल्म


इस फिल्म को पावर पॉइंट से बनाया गया है। मूल फिल्म का आकार (साइज़) लगभग 746 एम बी था, जिसे ब्लॉग पर दे पाना संभव नहीं था। इसे ब्लॉग पर लाने के लिए लगभग 10 गुणा छोटा करना पड़ा जिसके कारण इसकी गुणवत्ता भी उतनी ही घट गई। एक वरिष्ठ की सलाह पर बस प्रयोग के तौर पर यह फिल्म यहाँ दी जा रही है।
-प्रतिभा मलिक

Dec 24, 2011

पाँच मिनटों में सीखें हिंदी इंस्क्रिप्ट कुंजी पटल लेआउट - लीना महेंडले

[यह आलेख साभार राजभाषा गूगल ग्रुप से लिया गया है। सुश्री लीना महेंडले के इस आलेख में इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल लेआउट सीखने का बेहद सरल और आकर्षक तरीका बताया गया है। इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे हिंदी सहित किसी भी भारतीय भाषा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कुंजीपटल सभी भारतीय भाषाओं के लिए लिनक्स तथा मैक ऑपरेटिंग सिस्टम्स में भी उपलब्ध है। यदि इस आलेख को ध्यान से पढ़ा जाए तो इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल लेआउट को आत्मसात करने में बहुत कम समय लगता है। फिर बस कुछ घंटों के अभ्यास की जरूरत ही भारतीय भाषाओं में टाइप करने के लिए शेष रह जाती है। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और न्यायाधीश द्वारा विशेषकर स्कूली बच्चों के लिए तैयार इस आलेख से यह भी प्रमाणित होता है कि यदि मन से शुरुआत भर हो जाए तो भारतीय भाषाओं और संघ की राजभाषा हिंदी में कामकाज करने में किसी को कोई कठिनाई नहीं हो सकती। ]   
बच्चों, अब तो स्कूलों में भी संगणक (कम्प्यूटर) सिखाया जाने लगा है और तुममें से कईयों के घर में भी यह जरूर होगा... तो क्या तुम जानते हो कि संगणक पर हिंदी सीखने के लिये एक  युक्ति है जिसमें केवल आधा घंटा पर्याप्त है और वह भी अंग्रेजी टंकण-ज्ञान पर निर्भरता के बिना। और अगर पूरी बात कहूँ तो हरेक भारतीय भाषा सीखने की यही युक्ति है।

Dec 22, 2011

फिर एक लंबा अंतराल...शायद अब तक का सबसे लंबा

फिल्म समारोहों में मैं कभी अधूरे मन से नहीं गया था मगर इस बार यह भी हो गया। हर साल 15 दिन मैं फिल्म समारोह ले लिए रखा करता था...इस बार सिर्फ एक दिन रह गया। पूर्णता उस एक दिन में भी पाने की कोशिश की। संयोग से एक के बाद एक तीन मलयालम फिल्में देखने का मौंका मिला।
विम वेंडर्स निर्देशित जर्मनी की प्रस्तुति "पिना" देखकर मन गदगद हो गया। इस थ्री डी फिल्म पर बहुत कुछ लिखने की इच्छा हुई परंतु एक शब्द भी नहीं लिखा जा सका। ईरानी फिल्मों का दबदबा आज भी कायम है। सिराज की सिफारिश पर असगर फरहीदी निर्देशित "नाड़ेर एंड सिमीन अ' सेपरेशन" देखी और सिराज को धन्यवाद दिया। यकीन मानिए लाजवाब फिल्म थी।   "विनर" देखने से कैसे वंचित रह गया, यह अपने आप में बड़ी घटना रही। इज़राइल की जोसेफ मड्मोंय निर्देशित "रेस्टोरेशन" ने भी निराश नहीं किया। समीर ताहिर निर्देशित मलयालम फिल्म "चप्पा कुरिषु" पूरी नहीं देख पाया मगर वी के प्रकाश की "कर्मयोगी और राजेश पिल्लै की "ट्रैफिक" (दोनों मलयालम) पूरी देखने का मौका मिला। कर्मयोगी तो कमाल की फिल्म रही मगर ट्रैफिक की लम्बाई ने थोड़ा बेचैन किया। लेकिन मजेदार रही रेवती की 17 मिनट की अंग्रेज़ी/तमिल फिल्म "रेड बिल्डिंग इज़ वेयर द' सन सेट्स"। 
इन सब फिल्मों की चर्चा तभी अच्छे से कर पाता जब फिल्म समारोह में मन से जाना होता। इस बार गोवा गया तो सिर्फ डॉक्टर साहब और भाभी जी से मिलने था। किसी भी फिल्म समारोह से ज्यादा जरूरी था उनसे मिलना।  
मगर इस बार इतना लंबा अंतराल हो गया कि खुद हैरान हूँ... व्यस्तता और जिम्मेदारी के अहसास ने वक्त ही नहीं दिया। पिछले बीस दिनों में दो बार दिल्ली, गोवा, मद्रास ने इतना उलझाकर रखा कि 4-6 घंटों से ज्यादा सोना भी नसीब नहीं हुआ। फिर भी जिंदगी में व्यस्तता स्वयं में एक बड़ा सहारा है सुकून से जीने का। इतने पर भी मन तो यही कहता है-इतना बड़ा अंतराल तो अच्छी बात नहीं है, इसे नहीं ही होना चाहिए था...   

- अजय मलिक

Nov 26, 2011

कुछ झलकियाँ गोवा से 42वें फिल्म समारोह की








-अजय मलिक

हिन्दी होम पेज़ और कुछ और लाजवाब लिंक्स

इन लिंक्स के बारे कुछ भी कहना कम ही पड़ेगा। इसलिए बस आपके परखने के लिए इन्हें दिया जा रहा है। जरूर आज़माइगा-


http://www.hindi2tech.com/


https://sites.google.com/site/hindifontconverters/files  


http://www.youtube.com/user/hindiuniversity#g/c/3544B2DE2CA53E5D  

http://www.hindihomepage.com/index.php  



http://groups.google.com/group/technical-hindi/browse_thread/thread/c26508dc3f75e150  


http://www.sanskritweb.net/itrans/#SANS2003  


क्या-क्या नहीं किया है लोगों ने हिन्दी के लिए ... मुझे तो कभी-कभी लगता है कि सिखाना तो दूर अपनी तो अभी सीखने की भी शुरुआत नहीं हो पाई है। 
  
-अजय मलिक

Nov 23, 2011

गोवा में भारत के बयालीसवें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह-2011 का आगाज़ आज

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती अंबिका सोनी आज गोवा में बयालीसवें भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह-2011 के शुभारंभ के अवसर पर सुप्रसिद्ध फ्रेंच फिल्‍म निर्माता बर्ट्रेंड टैवरनियर को लाइफटाइम अचीवमेंट सम्‍मान से नवाजेंगी। इस सम्‍मान के तहत 10 लाख रुपए की राशि, स्‍क्रॉल और प्रमाण पत्र दिया जाएगा।


भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के निदेशक श्री शंकर मोहन ने आई.एफ.एफ.आई.-11 का पोस्‍टर को जारी करते हुए बताया कि आज (23 नवम्बर) शाम 5 बजे 42वें भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म के उद्घाटन समारोह के अवसर पर रा.वन के जी.वन यानी शाहरुख खान भी शिरकत करेंगे।   23 नवम्बर से 3 दिसम्‍बर 2011 तक चलने वाले इस समारोह थीम है -'वसुधैव कुटुम्‍बकम' अर्थात 'समूचा विश्‍व एक परिवार'। आई.एफ.एफ.आई. के विज्ञापन का डिजाइन श्री थोटा थरानी ने तैयार किया है।

इस समारोह का आयोजन भारत सरकार द्वारा गोवा राज्‍य सरकार और आई.एफ.एफ.आई. के सहयोग से किया जा रहा है। इसमें भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍मों को प्रदर्शित किया जाएगा।
 

समापन समारोह में दक्षिणी सिनेमा की प्रसिद्ध हस्‍ती सुरैया शिरकत करेंगी। उद्घाटन समारोह में 'उरूमी' फिल्‍म प्रदर्शित की जाएगी और इसमें भारतीय फिल्‍में जैसे 'रंजना अमी अर अस्‍बो ना', 'जिंदगी ना मिलेगी दोबारा' जैसी फिल्‍मों के अलावा  कान, लोकार्नो और मॉण्ट्रियल फिल्‍म समारोहों में चर्चित हो चुकीं विश्‍व के 65 देशों की 100 से अधिक फिल्‍में प्रदर्शित की जाएँगी।
-अजय मलिक

Nov 20, 2011

केंद्रीय सरकार के सिविलियन कर्मचारियों की जनगणना

“सेन्सस ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लॉईस” यानी केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों की जनगणना, एक रिपोर्ट हैजिसे भारत सरकार, श्रम मंत्रालय, रोजगार एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय, जामनगर हाउस, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2003 में प्रकाशित किया गया। इसमें केंद्रीय सरकार के सिविलियन कर्मचारियों के 31 मार्च 2001 तक के आँकड़े दिए गए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 में पूर्वोत्तर राज्यों में केंद्रीय सरकार के नियमित कर्मचारियों की संख्या कुछ इस प्रकार थी-

असम -76,500; मणिपुर-4,800; मेघालय-16,600; नागालेंड-6,700; सिक्किम-400; त्रिपुरा-7,200; अरुणाचल प्रदेश-2000; मिजोरम-800 यानी कुल 1,15,000 केंद्रीय सरकार के नियमित कर्मचारी/ अधिकारी थे। इन आँकड़ों का अगर थोड़ा और विश्लेषण किया जाए तो असम और मेघालय को छोड़कर शेष संपूर्ण पूर्वोत्तर राज्यों में कुल 21,900 केंद्रीय सरकार के नियमित कर्मचारी/ अधिकारी थे। ये किसी एक राज्य विशेष के रहने वाले न होकर सभी राज्यों के विभिन्न भाषा-भाषी समुदाय के होने चाहिए।

उपर्युक्त रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 में पॉण्डिचेरी में 5,200 नियमित केंद्रीय सरकार के कर्मचारी थे। गोवा, दामन दीव में 5,900; दादरा नगर हवेली में 2,600; जम्मू-काश्मीर में 28,000 केंद्रीय सरकार के कर्मचारी थे।

वर्ष 2001 में बिहार में 1,80,200; छत्तीसगढ़ में 45,500; हरियाणा में 31,000; हिमाचल प्रदेश में 16,500; मध्यप्रदेश में 1,61,700; पंजाब में 79,000; राजस्थान में 1,64,700; उत्तर प्रदेश में 3,95,600; उत्तरांचल में 27,500; चंडीगढ़ में 16,900; अंडमान-निकोबार में 4,800 केंद्रीय सरकार के नियमित कर्मचारी थे।

यदि पिछले वर्षों में विभिन्न पदों में हुई कटौती पर विचार किया जाए तो वर्ष 2011 तक इस संख्या में कुछ प्रतिशत कमी आनी चाहिए?

मेरी जिज्ञासा का विषय यह है कि उपर्युक्त कर्मचारियों तथा अधिकारियों में कितने हिंदीभाषी अथवा हिन्दी जानने वाले रहे होंगे?

जिस रिपोर्ट के आधार पर यह आलेख तैयार किया गया है, उसका लिंक नीचे दिया जा रहा है-


- अजय मलिक

 

भारतीय पैनोरमा खंड :: iffi11:: 24 में से 7 मलयालम फिल्मों के साथ - केरल सबसे आगे

     23 नवम्बर से गोवा में शुरू हो रहे भारत के 42वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के भारतीय पैनोरमा खंड में कुल 24 कथा फिल्में तथा 21 गैर-कथा फिल्में दिखाई जाएँगी। मशहूर फिल्मकार सई परांजपे की अध्यक्षता में गठित जूरी के 10 सदस्यों  ने 21 दिन की मशक्कत के बाद 118 फिल्मों में से कुल 23 फिल्मों का चयन भारतीय पैनोरमा खंड के लिए किया। इसी के साथ इस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कथा फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजी गई निर्देशक सलीम अहमद की मलयालम प्रस्तुति 'आदामिन्टे मकन अबु' को परंपरानुसार सीधे प्रवेश मिला। कुल चौबीस  कथा फिल्मों में से सर्वाधिक 7 मलयालम फिल्में हैं।

     इस खंड में जहाँ हिन्दी, बांग्ला तथा मराठी की तीन-तीन फिल्में  हैं वहीं असमिया, कन्नड़, भोजपुरी,  कोंकणी, मणिपुरी, अंग्रेज़ी, तमिल तथा तेलुगु की मात्र एक-एक फिल्में ही  स्थान बना सकीं। इस खंड की हिन्दी फिल्मों में हैं- निर्देशक प्रवीण डबास की "सही धंधे गलत बंदे";तिगमांशु धूलिया निर्देशित "शागिर्द" और  जोया अख्तर निर्देशित " ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा"।

     गैर कथा फिल्मों के लिए लेखक-निर्देशक अशोक राणे की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय जूरी ने 135 फिल्मों में से जिन 21 फिल्मों का चयन किया है उनमें  सर्वाधिक 6 फिल्में हिन्दी भाषा की  हैं। इसके अलावा  अंग्रेज़ी की 4, बांग्ला, मणिपुरी, गुजराती तथा मराठी भाषा की एक-एक तथा शेष मिश्रित भाषा में बनी फिल्में हैं। 
                                                    
 -अजय मलिक

Nov 12, 2011

भारत का 42वाँ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, 23 से गोवा में



भारत का बयालीसवाँ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, गोवा में 23 नवम्बर 2011 से 03 दिसंबर 2011 तक आयोजित किया जाएगा। इस दौरान देश-विदेश की अनेक फिल्मों का प्रदर्शन विभिन्न खंडों में किया जारगा। फिल्म समीक्षकों/ मीडिया के सदस्यों के लिए पंजीकरण की ऑनलाइन सुविधा नीचे दिए लिंक पर 15 नवम्बर 2011 तक उपलब्ध है-


-अजय मलिक