Sep 15, 2011

पुरस्कृत होकर एक साल तक अपना नाम सिर्फ हिंदी में लिखेंगे

कितने सारे पुरस्कार!
       हिंदी में श्रेष्ठ या उत्कृष्ट काम करने के लिए या सिर्फ हिंदी में काम करने के लिए राष्ट्रीय स्तर से लेकर छोटे-छोटे कार्यालयों के स्तर पर पुरस्कार ग्रहण करने वाले हिंदी सेवियों को हार्दिक बधाई। उनके सत्प्रयत्नों से राजभाषा हिंदी को जो मान-सम्मान मिला है उसके लिए सचमुच वे बधाई के पात्र हैं, अनुकरणीय हैं। उनसे तथा हिंदी से जुड़े पुरस्कारों से प्रेरित होकर अनेक लोग हिंदी से जुड़ेंगे, हिंदी में कामकाज करेंगे, हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। प्रेरणा, प्रोत्साहन और सद्भावना ये ही तो मूल मंत्र हैं सरकार की राजभाषा नीति के।
        न जाने क्यों एक विचार मन में आ रहा है जो 'नाम' से जुड़ा है।  मनोविज्ञान में मुझे पढ़ाया गया था कि किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे मोहक ध्वनि उसका अपना नाम होता है। नाम के चक्कर में लोग बदनाम तक हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं। फिर इस नाम का उपयोग हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए क्यों न किया जाए? 
       एक भारतीय नागरिक के नाते मेरा विचार है कि हिंदी के लिए पुरस्कार पाने वालों, हिंदी के लिए पुरस्कार ग्रहण करने वालों के लिए एक छोटी सी बात का वादा करना जरूरी होना चाहिए कि अगले एक साल तक वे जहाँ भी अपना नाम लिखेंगे वह केवल हिंदी यानी देवनागरी लिपि में लिखेंगे। जहाँ अंग्रेज़ी में लिखने की विवशता होगी वहाँ पहले हिंदी में और फिर अंग्रेज़ी में लिखेंगे। इसे और भी आगे बढ़ाया जा सकता है - जैसे कि वे अगले एक साल तक जहाँ भी हस्ताक्षर करेंगे वहाँ उनका नाम हिंदी में टंकित / टाइप होगा। यदि वे ऐसा नहीं कर पाएँगे तो वे स्वयं पुरस्कार वापस कर देंगे या अगले पाँच वर्षों के लिए पुरस्कार के लिए अपना नाम प्रस्तावित नहीं करेंगे, नहीं होने देंगे। यदि ऐसा हो तो एक दौर आत्मानुशासन का  हमारी अपनी भाषाओं के मामले में भी आ सकता है।
       पता नहीं मेरे मन में यह विचार क्यों आया है। पर यह विचार शायद बुरा तो नहीं है।  

 -अजय मलिक      

3 comments:

  1. अति उत्‍तम विचार मान्‍यवर

    निश्‍चय ही कम से कम अपना नाम तो देवनागरी में ही लिखना चाहिये । जहाँ विवशता हो वहाँ छोडकर । केवल पुरस्‍कारप्राप्‍त‍व्‍यक्तियों को ही नहीं अपितु हम सभी को यह व्रत पालन करना चाहिये ।


    आपके उत्‍तम विचारों के लिये हार्दिक धन्‍यवाद

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  2. निस्संदेह यह हिंदी के प्रसार में सहायक सिद्ध होगा. और लोगों में हिंदी के प्रयोग के प्रति हीन भावना को आमूल नष्ट करेगा. आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय होगा.

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