Oct 3, 2012

प्रबोध ऑनलाइन परीक्षा की लिखित परीक्षा के लिए मॉडल प्रश्न-पत्र -3


प्रबोध ऑनलाइन परीक्षा की लिखित परीक्षा के लिए मॉडल प्रश्न-पत्र -3

1. निम्नलिखित अनुच्छेद को सुंदर लिखावट में लिखिए / Write the following paragraph legibly -


जैसे-जैसे सैफ-करीना की शादी नजदीक आती जा रही है वैसे-वैसे उनके बारे में रोज एक बात सामने आ रही है। खबर आ रही है कि सैफ-करीना की शादी की पार्टी अब पटौदी पैलेस में होगी। पटौदी पैलेस जो कि मौजूदा दौर में एक होटल के रूप में संचालित होता है उसकी सारी बुंकिंग को 26 अक्टूबर तक रोक दिया गया है और पिछले एक हफ्ते से उसका सौन्दर्यीकरण जारी है।

Sep 22, 2012

गीत संगीत के साथ सीखिए- हिन्दी स्वर एवं व्यंजन

देवनागरी स्वर और व्यंजन गीत संगीत के साथ भी सीखे और सिखाए जा सकते हैं। इस कथन को आजमाना है तो नीचे दिए लिंक्स को क्लिक करने का साहस दिखाएँ-




(यू ट्यूब से साभार )

Sep 21, 2012

आइए, जरा हिन्दी के साथ जोहांसबर्ग चलें...

यह विचित्र सी ही बात है कि उत्तर-प्रदेश का निवासी होते हुए भी मैं सबसे ज्यादा अपरिचित उत्तर-प्रदेश और उत्तर भारत से ही हूँ। इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता गाँव के इस ठेठ देहाती की अनभिज्ञता और फूहड़पन का। शायद यही वजह है कि मैं सही मायनों में "आरआई" भी नहीं हूँ, "एनआरआई" होना तो बड़ी दूर की बात है बशर्ते कि सिलीगुड़ी के पास नेपाल की सीमा से गुजरने या एक घंटे के लिए पानी की टंकी के पास से नेपाल में घूम आने को इसमें शामिल न किया जाए। मेरे कई परिचित आज एनआरआई हो गए हैं। वे हिंदी के साथ दक्षिण अफ्रीका में जोहांसबर्ग गए हैं और अढ़ाई दिन बाद लौट आएंगे। कुछ मित्र ऐसे भी हैं जिन्हें जोहांसबर्ग हिंदी को ले जाने का अवसर बस मिलते-मिलते रह गया। मैं एक घंटे वाला नेपाल रिटर्न इंडियन हिंदी के नाम पर चेन्नई में पड़ा हूँ। मैं हिंदी को ढोने योग्य भी नहीं बचा हूँ, अब शायद हिंदी ही मुझे ढो या धो रही है। बहुत सारे लोग हैं जिन्हें हिंदी ढो रही है। मैं भी ढुलाई वाले ट्रक या गाड़ी में लदा हूँ और ढोए जाने के अजीब से चक्र का हिस्सा बना हुआ हूँ। जो थोड़ी-बहुत हिंदी जानता था वह अङ्ग्रेज़ी की भेट चढ़वा दी गई और अँग्रेजी इस भारतीय को न तो अंग्रेज़ बना पाई और न ही हिंदी वाला रहने दिया। एक अजीब सा कुछ-कुछ दलिया जैसा बनकर रह गया हूँ। यदि खिचड़ी भी बन गया होता तो भी कुछ संतोष होता। 

Sep 20, 2012

दो जुबान चाहिए

आज के दा हिंदू अखबार के चेन्नई संस्करण में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और जाने-माने विधिवेत्ता श्री मार्कन्डेय काटजू का एक आलेख प्रकाशित हुआ है जिसमें हर भारतीय के लिए अँग्रेजी और हिंदी  दो भाषाओं के सीखने की जरूरत बताई गई है । हिंदी दिवस से जुड़े उनके अनुभवों से  परिचित कराते आलेख का लिंक नीचे दिया जा रहा है-


(The Hindu से साभार )

Sep 19, 2012

सभी को गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएँ


हिंदी दिवस समारोह, 2012 के अवसर पर भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी का अभिभाषण




(www.rajbhasha.gov.in के सौजन्य से )

Sep 17, 2012

हिंदी में प्रार्थना पत्र, सिफारिशी पत्र तैयार करें

यहाँ एक ही वेबसाइट के तीन लिंक दिए जा रहे हैं जिनसे आप हिंदी (अँग्रेजी सहित यानी द्विभाषी) में कुछ सीधे-सादे आवेदन-पत्र, सिफारिशी पत्र तैयार करना सीख सकते हैं। इसी के साथ hi.bab.la  की इस वेबसाइट पर ऑनलाइन प्यारा सा/ से शब्दकोश भी उपलब्ध है/ हैं। एक-एक कर आजमाइएगा जरूर -




(http://hi.bab.la से साभार )


अमेरिका में हिन्दी शिक्षण की लहर : डॉ सुरेन्द्र गंभीर ( अभिव्यक्ति का लिंक )

साहित्यिक पत्रिका "अभिव्यक्ति" में एक वर्ष पूर्व प्रकाशित यह लेख अभी भी ताजगी से भरपूर है। लिंक नीचे दिया जा रहा है-

Sep 14, 2012

क्या मैं आपको कवि नज़र आता हूँ...

एक मित्र ने संदेश भेजा - 'कवि सम्मेलन में कविता पाठ करना है, शाम साढ़े पाँच बजे।' मैंने कई बार अपने गंजे सिर पर हाथ फेरा, इधर-उधर देखा, चश्में को उतारकर आँखों पर हथेलियों का दबाव डालकर इस बात का पता लगाने की कोशिश की कि आखिर किस कोण से मेरे जैसा त्रिकोण कवि लग सकता है? कुछ समझ में नहीं आया। फिर सोचा चलिए, मित्रवर की पारखी निगाहों से देखने से शायद कुछ नज़र आ जाए... इस जाँच-पड़ताल में एक लाल बत्ती पर स्कूटर रोककर खड़े-खड़े कुछ पंक्तियाँ लिखने की कोशिश की। बस फिर क्या

सभी भारतीयों को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 

हिन्दी दिवस का सीधा प्रसारण देखें

आज हिंदी दिवस के अवसर पर विज्ञान भवन से हिंदी दिवस का सीधा प्रसारण लाइव वेबकास्ट  के जरिए नीचे दिए लिंक से देखा जा सकता है-





(rajbhasha.gov.in के सौजन्य से )


Sep 13, 2012

विंडोज़ 8.0 अब चौदह नई भाषाओं में भी उपलब्ध

यहाँ हम भाषा इंडिया डॉट कॉम का एक लिंक दे रहे है जिसपर आपको अगले माह लाँच होने वाली विंडोज 8.0 के बारे जानकारी के साथ-साथ अन्य अनेक सोफ्टवेयर्स के  संबंध में भी विस्तृत जानकारी हिन्दी में मिलेगी। विंडोज 8 में समर्थित भाषाओं की संख्या 109 हो जाने की जानकारी दी गई है। विस्तृत जानकारी के लिए नीचे दिए लिंक को क्लिक करें-



(bhashaindia.com के सौजन्य से )

Sep 12, 2012

हत्यारी अँग्रेजी के पैरोकारों को क्या कहूँ......

डेक्कन क्रोनोकिल के चेन्नई संस्करण की एक खबर 

अमेरिका में हिंदी बन रही है वैकल्पिक भाषा

हिंदी प्रेमियॊं के लिए दॊ अच्छी खबरें

वाशिंगटन। अमेरिका में बड़ी संख्या में रह रहे गैर अंग्रेजी भाषी प्रवासी समुदायों में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी उर्दू की स्वीकार्यता से चकित अमेरिकी समाज भी इसे अपनाने को तैयार हो रहा है।
दुनिया भर से विभिन्न भाषा भाषी समुदायों के लाखों लोगों के अमेरिका में आ बसने के साथ ही इन वर्गो में सांस्कृतिक चुनौतियां सामने आ रही हैं जिनमें भाषा की समस्या प्रमुख है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय में एशियाई भाषा एवं साहित्य विभाग के प्रोफेसर डा. एमजे वारसी देश में हो रही इस दिलचस्प क्रांति का बयान करते हुए बताते है कि गैर अंग्रेजी भाषी पृष्ठभूमि के अफ्रीकी, एशियाई लैटिन अमेरिकी आदि देशों के लोगों के परिवारों के बच्चे स्कूलों में शिक्षा पाकर फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगते हैं लेकिन मां बाप की अंग्रेजी समझ तो लेते हैं लेकिन बोलने में दिक्कत आती है। इसीलिए वे जवाब हिन्दी या उर्दू में देते हैं। डा. वारसी के अनुसार ऐसे माता-पिता हिंदी या उर्दू बहुत आसानी से सीख लेते हैं। बच्चों को भी इस भाषा में बात करने में अच्छा लगता है। उनके अनुसार 11 सितंबर के हमले के बाद अमेरिका में एक सकारात्मक परिवर्तन भी आया है। यहां के समाज में दूसरे समुदायों की संस्कृतियों एवं धर्म

Sep 5, 2012

हिन्दी ई-लर्निंग का लिंक 2 काम नहीं कर रहा है

आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के हिन्दी सीखने के बेहद लोकप्रिय एवं उपयोगी पाठों से जोड़ने वाला  हिन्दी ई-लर्निंग का हिंदी सीखने के लिए लिंक- 2 काम नहीं कर रहा है। खेद है। 

शिक्षक दिवस पर हिन्दी सीखने के लिए एक और लिंक

आज शिक्षक दिवस है। इस अवसर पर एक और नया लिंक प्रस्तुत है हिन्दी सीखने के लिए -


Sep 4, 2012

स्वर्गीय अनिल बोरडिया को हिंदी सबके लिए की श्रद्धांजलि


कल रात टीवी पर एक छोटा सा समाचार था- शिक्षाविद एवं प्रशासनिक अधिकारी श्री अनिल बोरडिया नहीं रहे। श्रद्धांजलि स्वरूप यह पोस्ट मैं तभी डालना चाहता था किन्तु 103 बुखार में बैठना भी संभव नहीं हो पाया। कई लोग यह पूछ सकते हैं कि अनिल बोरडिया जी से मेरा या हिंदी सबके लिए का क्या संबंध हो सकता है? सच तो ये है कि स्वयं बोरडिया जी को भी 25 वर्ष पुरानी वह घटना याद न रही होगी। वर्ष 1987-88 में "हम पाँच" नई दिल्ली स्थित शास्त्री भवन परिसर में एक पेड़ के नीचे आमरण अनशन पर बैठ गए थे। हमारे पास न कोई पंडाल था, न ही कोई प्रायोजक। हमारे पास  वित्तीय साधन भी कोई नहीं था। हम थोड़े से सनकी किस्म के प्राणी हुआ करते थे। जाड़े की रात ऊपर से बारिश। हम कुकड़ रहे थे। 

हम पांचों में बोलने का काम श्यामरुद्र पाठक जी किया करते थे। श्याम जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे हिंदी, अँग्रेजी और संस्कृत में पूरे अधिकार के साथ धारा-प्रवाह लगातार बोलते रह सकते थे। वे अपनी बात बिल्कुल एक टेपरिकार्डर की तरह बिना एक शब्द इधर-उधर किए बोलते थे। मैं बिलकुल चुप पड़ा रहने वाला प्राणी था। डॉ मुनीश्वर गुप्त दूसरे प्रवक्ता थे। पुष्पेंद्र चौहान जी अलग ढंग से सोचते थे और विनोद कुमार गौतम जी मेरी तरह चुप रहते थे। आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा से अँग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कराने का मुद्दा था। श्यामरुद्र पाठक एमएस फिजिक्स की अंतिम वर्ष की परीक्षा के सभी प्रश्न-पत्र हिंदी में लिखकर अपना परीक्षाफल रुकवाने का आनंद ले चुके थे। विनोद कुमार गौतम को दो बार हिंदी में लिखने के कारण एएमआईई की परीक्षा में शून्य अंक पाने का गौरव हासिल हो चुका था और मैं एम एड का परीक्षाफल रुकवाने का श्रेय शिरोधार्य किए बैठा था। डॉ मुनीश्वर गुप्त को एमडी की डिग्री हिंदी में लिखने पर भी मिल चुकी थी और पुष्पेंद्र चौहान दिल्ली बार काउंसिल में अँग्रेजी का पर्चा बिना लिखे पंजीकरण पा चुके थे।

एक प्रेस फोटोग्राफर चाहते थे कि जिंदाबाद-मुर्दाबाद की मुद्रा में एक फोटो हो जाए मगर हम पांचों सनकी इसपर सहमत नहीं थे। हमें ये भी पता नहीं था कि वास्तव में हमारे ज्ञापन या अभ्यावेदन कोई पढ़ भी रहा या नहीं। सतर्कता विभाग का एक अधिकारी जेएनयू का छात्र बनकर हमारे खेमे में घुसपैठ करना चाहता था परंतु हम पाँच, छह बनने को तैयार नहीं थे। हमारे अनशन का दूसरा या तीसरा दिन था। शायद रविवार की सुबह दस या ग्यारह बजे का समय था। हम लोग एक पुरानी दरी पर स्वयं को समेटे बैठे थे। तभी हाथ में ब्रीफकेस थामे एक लंबे से भारी भरकम व्यक्तित्व ने आकर पूछा- बच्चो बात क्या है, आप लोग क्या चाहते हैं?

हमारी नीति यह थी कि जो भी बात करना चाहता है उसे हमारे साथ, हमारे पास बैठकर बात करनी होगी। श्याम जी ने उस विशाल व्यक्तित्व से आग्रह किया कि कृपया बैठ जाइए। वे बैठ गए। श्याम जी अपने अंदाज़ में शुरू हो गए। पाँच मिनट, दस मिनट फिर पंद्रह मिनट गुजर गए, श्याम जी विस्तार से सप्रमाण अपनी बात बताते रहे। तब पूछने वाले सज्जन ने प्रस्ताव रखते हुए कहा – क्यों न हम अंदर चलकर बात करें? तब हम लोगों ने पूछा - श्रीमान आपका परिचय... ? उन्होंने अपना नाम बताया - मैं अनिल बोरडिया हूँ, शिक्षा सचिव ...आप लोग मेरे ही खिलाफ तो अनशन कर रहे हैं।


हम पांचों एक दूसरे का चेहरा ताकने लगे। फिर उनके केबिन में हम लोग उनके साथ जा बैठे। उन्हें एनसीईआरटी और आईआईटी दिल्ली के सर्वेक्षण का ब्यौरा दिया तो वे सारी बात समझ गए। उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि वे भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ने वालों को न्याय दिलाकर रहेंगे। आईआईटी के निदेशक मण्डल को इसमें परेशानी थी। बैठक पर बैठक होती रहीं। बोरडिया साहब ने कहा - "जितना समय लगाना है लगा लीजिए पर भारतीय भाषाओं को आईआईटी संयुक्त प्रवेश परीक्षा में जगह देनी ही होगी।" मैं आज तक नहीं जान पाया कि हमारे अनशन स्थल पर बैठक के बाद गद्दे कहाँ से आएँ, पंडाल कहाँ से लगा? 

शास्त्री भवन प्रांगण में दफा 144 लगी रहती थी मगर हम लोगों का न कोई विरोध हुआ, न कोई गिरफ़्तारी हुई। पांचवे दिन हम लोग बहुत चल-फिरने लायक नहीं रह गए थे, पेट की अतड़िया ऐंठने लगी थीं। एक बार फिर बैठक शुरू हुई। अनिल बोर्डिया जी ने कहा - " इन पांचों के सामने ही सारी बात होनी चाहिए।" हम लोग कुर्सियों पर बैठने में असहज महसूस कर रहे थे। फिर पैरों को पेट से चिपका कर बैठ गए। शाम को जब जब मांगें मान लिए जाने का पत्र टाइप हुआ तो वह अँग्रेजी में था। अनिल बोर्दिया जी ने कहा- कम से कम ये पत्र तो हिंदी में होना चाहिए था! उनके एक मातहत ने खींसे निपोरते हुआ कहा- सर, हिंदी में टाइप करने वाला आज नहीं आया है। बहुत सारी बातें हैं जिनका जिक्र कुछ लोगों को अच्छा नहीं भी लग सकता है, मगर अगर आईआईटी जेईई में भारतीय भाषाएँ माध्यम बनीं तो उसका बहुत कुछ श्रेय अनिल बोरडिया जी को भी जाता है।


23 साल से अधिक बीत गए राजभाषा विभाग में चाकरी करते हुए मगर यहाँ स्वर्गीय अनिल बोरडिया जी जैसा हिंदी एवं भारतीय भाषाओं के प्रति समर्पित व्यक्ति गाहे-बगाहे ही मुझे मिला होगा। यहाँ भांति-भांति के व्यक्तित्व मुझे मिले मगर अधिकांश को हिंदी से अधिक हिंदी की नौकरी से लगाव के लिए जुगाड़ लगाते हुए पाया। उन दिनों दैनिक हिंदुस्तान में लालमणि मिश्रा जी हमारे आंदोलन की कवरेज कराया करते थे। सेवा निवृत होने पर अनिल बोरडिया जी मिश्रा जी को अपनी किताब देने आए थे। अनिल जी के हिंदी के सरकारी महीने में परलोकवासी हो जाने से हिंदी के एक सच्चे समर्थक को खो देने का एहसास हो रहा है। मैं उस आमरण अनशन के बाद कभी भी उनसे मिलने का सौभाग्य नहीं पा सका मगर दिल से सोचने वाला यह अनाड़ी उन्हें कभी नहीं भुला पाया। बस उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना के साथ समाप्त करता हूँ। 

- अजय मलिक (c)

Sep 3, 2012

हिन्दी गद्यकोश

जी हाँ, कविताकोश के बाद हिन्दी गद्यकोश भी उपलब्ध है। यह जानकारी मुझे राहुल जी की फेस बुक पर उपलब्ध पोस्ट से मिली है। गद्यकोश में सभी प्रतिष्ठित हिन्दी रचनाकारों की गद्य कृतियाँ आकारादि क्रम में उपलब्ध हैं। लिंक नीचे दिया जा रहा है-



(गद्यकोश एवं राहुल जी की पोस्ट के सौजन्य से )

Aug 31, 2012

हिन्दी दिवस पर माननीय गृह मंत्री जी का संदेश

                                                        
(सौजन्य:  राजभाषा विभाग) 

Aug 29, 2012

चकल्लस

23 अगस्त 2012, डबल्यूडबल्यूएफ़ कुश्ती की एक नई कड़ी का निर्माण हुआ। एक वाशबेसिन की कहानी इतनी लंबी हो गई कि एकता कपूर के धारावाहिक छोटे पड़ जाएँ... अभी भी कहानी जारी है। वाश बेसिन जिंदा है याकि उसने नया जन्म ले लिया है किन्तु उसकी कमीज़-पेंट की सिलाई अभी बाकी है। पेंट से याद आया एक आलसी बल्कि महा आलसी कहाना ज्यादा सही रहेगा, पेंट के एक पैर की उधड़ी सिलाई सिलाने नहीं गया और इस तरह दो माह गुजर गए। वह रोज एक ही जोड़ी को धोने और सुखाने में आलसीपन नहीं दिखाता मगर दर्जी के पास जाने के लिए पाँच मिनट उसके पास नहीं हैं।

बिना ब्रेक की साइकिल चलाने में उसे कोई कठिनाई नहीं मगर ब्रेक डलवाने में नानी याद आती है। यकीन मानिए पंचर लगाने का सामान, साइकिल-स्कूटर की मरम्मत का सामान, ग्रीस, मोबिल ऑइल, हथौड़ा, प्लायर, बहुत सारे रिंच, जूते गाँठने के नुकीले औज़ार वगैरा सब लाकर घर में रख चुका हूँ और आज एक सिलाई मशीन भी खरीद लाया। एक आरी, बसूला, रंदा, एक बर्मा यानी ड्रिलिंग मशीन और लानी है। इसके बाद इन सब को चलाना है इसके लिए कुछ प्लाइवुड, कुछ सनमाइका लानी है। कुल मिलाकर अगर पानी पीना है तो हर कदम पर कुंआ खोदना है । जीने के लिए पानी कितना जरूरी है इसपर नया कुछ कहने की जरूरत नहीं है। शहरों में छूआ छूत जैसा कुछ नहीं है मगर मेरे जैसे किस्मत से दिलद्दर को बिना कुंआ खोदे पानी कभी नहीं मिला। 

महानगरों के अपने कायदे-कानून हैं और काफी हद तक बेतुके हैं। तिसपर भी बढ़ईगीरी, लुहारगीरी, जूता गठाई, सिलाई-कढ़ाई-बुनाई, प्लम्बिंग, मिस्त्रीगीरी वगैरा के बाद जो कुछ बचा रह जाता है वह है महानगरीय अवश प्राणी। यह अवश प्राणी जब सुबह उठता है तो खिड़की खोलकर ताज़ी हवा ढूंढने के चक्कर में दो-चार तेजतर्रार मच्छरों का शिकार बनता है। फिर शहरी बाबू होने के अहसास की अकड़ में जकड़कर कमर दर्द से कराहता है और  दफ़्तर की दौड़ में घुटनों की टीस से सुकून पाने के उपाय ढूँढता हुआ लौटता है।

कार है जो बेकार खड़ी है। तीन साल में छः हज़ार किमी का सफर वह भी तब जब मद्रास से त्रिवेन्द्रम वगैरा का एक चक्कर लगाने में तीन हज़ार किमी किसी तरह खींच दी थी। सालाना पेट्रोल से अधिक बीमा और ढुलाई-पुछाई वाली तथाकथित सर्विस का खर्चा। बढ़ाइए पेट्रोल के दाम मुझे कोई ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है। जब तक स्कूटर चलता है चला लेते हैं बाद में आईआई टी से एक पुरानी साइकिल भन्ने में देकर खरीद लूँगा।

कार की मोबिल ऑइल बदलने की सेवा के नाम पर बिना किसी कारण छः हज़ार का बिल बना दिया भाई लोगों ने। किसी ने सही ही कहा है जाकी कार उसी को साजे... हम ठहरे ठेठ देहाती...  गाँव के गंवार, मोटी रोटी और प्याज की गंठी से बढ़कर स्वादिष्ट कोई व्यंजन नहीं लगता और साइकिल से बढ़कर कोई सवारी नहीं लगती। आने दीजिए बाढ़-तूफान-आँधी हमारी साइकिल में सायलेंसर  ही नहीं है जिसमें पानी भरने का डर हो। सड़क हो या न हो, सूखा हो या गारा अपनी साइकिल को कोई क्या रोकेगा! पुलिस का हवलदार न  रोक सकता है न चालान काट सकता है। न बैटरी की चिंता न इंडिकेटर के टूटने का डर... क्लच, ब्रेक सब बाहर, कोई हेर-फेर नहीं, कोई लौचा नहीं। बचपन में साइकिल चलाना सीखने के चक्कर में तुड़वाए हाथ-पाँव आज काम आ रहे है। हमने रस्सी बनानी/ बटनी सीखी थी, मछीके बनाने और लगाने सीखे थे। हमारी बनाई रस्सी के बल इतने तगड़े कि जलने पर तो क्या खाक में मिलने पर भी बलवान ही रहते हैं।  ये अलग बात है कि गंजे सिर पर पिछले पच्चीस बरस से जब भी हाथ फेरता हूँ तो खुद को पचपन का पाता हूँ।     (जारी ... )  

ओणम की शुभकामनाएँ


Aug 18, 2012

बीस बरस पहले सबरंग में छपी कुछ कविताएँ


Aug 15, 2012

वंदे मातरम्



Aug 10, 2012

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ


यह चित्र फेसबुक पर राहुल जी ने साझा किया है। माँ की याद आ गई। 

Aug 3, 2012

सलूने मुबारक और रक्षाबंधन की शुभकामनाएँ


कल से मन में एक अजीब सा वितृष्णा का भाव है। फेसबुक पर एक पोस्ट दलित साहित्य के जानकार श्री कर्दम जी ने शेयर की थी। मेरे लिए साहित्य सिर्फ साहित्य है वह चाहे किसी भी नाम से किसी भी रूप में आए। जो लिख रहा है वह कुछ कहना चाह रहा है। उसके मन में अच्छा-बुरा, सफ़ेद या स्याह कुछ है जिसे वह अभिव्यक्ति देना चाह रहा है। साहित्य के रूप में सजग पाठक ने जिसे स्वीकार लिया, उसे पढ़ने  की जिज्ञासा सभी को हो सकती है। खरीदी कोड़ियों के मोल का पहला भाग कवरत्ती में पढ़ा था और दूसरा पढ़ने के लिए मुंबई के एक पुस्तकालय में 70 रुपए खर्च कर सदस्यता ली थी। फिल्म रसास्वादन पाठ्यक्रम के दौरान 5 सप्ताह यही सिखाया गया था कि निर्णेता होने का दंभ मत पालना, फिल्म निर्माण में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। इसी आधार पर लिखना भी सभी के लिए संभव नहीं है। जो लिखता है... लिख सकता है, वह बहुत परिश्रम और प्रयासों के बाद लिखता है।

Jul 27, 2012

श्रुतलेखन पर कुछ छींटे और कुछ बौछारें

श्रुतलेखन पर श्री रवि रतलामी जी की राय बदली है। राजभाषा विभाग द्वारा सीडैक से तैयार कराए गए कम से कम दो सॉफ्टवेयर्स ऐसे हैं जो उपयोगी और प्रशंसनीय हैं। पहला लीला हिंदी प्रबोध (पुराना पाठ्यक्रम) और दूसरा श्रुतलेखन। रवि जी ने कुछ दिन पूर्व कुछ छींटे मारे थे श्रुतलेखन पर मगर अब निर्मल बौछारों से उन्हें धो-पौंछ दिया है। जब रवि जैसे अनुभवी कंप्यूटर विशेषज्ञ को प्रथम प्रयास में परेशानी हो सकती है तो सामान्य प्रयोगकर्ता का क्या हाल होगा इसे आसानी से समझा जा सकता है। मुझे श्रुतलेखन ने जनवरी 2007 से अब तक बहुत बार थकाया है और बहुत बार अद्वितीय परिणाम दिए हैं। मैं रवि जी के आलेख का लिंक नीचे दे रहा हूँ जिसे श्री विजय प्रभाकर नागरकर जी ने भेजा है। रवि जी के छींटे और बौछारें श्रुतलेखन के प्रयोक्ताओं को बहुत मदद करेंगी, इसी आशा के साथ नीचे लिंक दिया जा रहा है, जरूर पढ़ें-
   http://raviratlami.blogspot.in/2012/07/blog-post_27.html
कृपया ध्यान दें- 
श्रुतलेखन इंस्टालेशन से पूर्व एंटी वायरस सोफ्टवेयर निष्क्रिय कर दें। चिंता न करें, इंस्टालेशन के बाद जब कम्प्युटर रिस्टार्ट होगा तो एंटी वायरस स्वत: पुन: सक्रिय हो जाएगा। यदि वायरस आक्रमण का डर है तो इंस्टालेशन के समय इंटरनेट भी बंद रख सकते हैं।

Jul 26, 2012

हिन्दी सबके लिए का 3 वर्ष का सफर

जितना चाहते थे उसका दस प्रतिशत भी इन तीन वर्षों में नहीं दिया जा सका। बहुत सारा काम पुन: संपादन के लिए शेष है। कुछ ऐसे बहाने हैं जिनका सहारा लेकर कम लिखने या कम पोस्ट करने का तर्क दिया जा सकता है। ... लेकिन जिंदगी में यदि झंझट नहीं होंगे तो फिर इसे जिंदगी ही कौन कहेगा! हमें गर्दन और पीठ की परवाह न करते हुए, पीठ पर पड़ने वाले कोडों की संख्या में हुई वृद्धि के अनुपात में और अधिक घंटे काम करना चाहिए था जो नहीं किया जा सका।

ज्यादा समय कोडों की चिंता और पीठ के दर्द को सहलाने में नष्ट हुआ जिसकी भरपाई मुश्किल है। 

मगर असफलताओं के बीच जीने भर के लिए आक्सीजन की कमी तो नहीं है। एक रूखे से ब्लॉग को पिछले 3 वर्षों के दौरान औसतन 70 पाठकों ने प्रतिदिन देखा... हमारे लिए इतना भी चलते जाने के लिए कम तो नहीं है। इस स्नेह के लिए विनम्र आभार।   

आपका मनचाहा कुंजीपटल ... संपादित

आपका मनचाहा कुंजीपटल ... आलेख कुछ नई जानकारियों को जोड़ते हुए पुन: संपादित कर दिया गया है। माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैड्ग्वेज इनपुट टूल अब भाषा इंडिया डॉट कॉम के मुख पृष्ठ पर स्थानांतरित हो गया है जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा है-
http://www.bhashaindia.com/_layouts/ilit/Hindi.aspx


हिन्दी आसान ट्यूटर की जानकारी तथा डाउनलोड लिंक तो पहले ही दिया जा चुका है। अब भाषा इंडिया डॉट कॉम पर भी 12 भारतीय भाषाओं केलिए Indic Inscript Tutor सॉफ्टवेयर दिए गए हैं। हिन्दी का लिंक नीचे दिया जा रहा है-


    
(सौजन्य भाषा इंडिया डॉट कॉम)

Jul 25, 2012

दो अखबारों की एक ख़बर

 'हिन्दी सबके लिए' का कल से चौथा वर्ष शुरू हो रहा है। इस पूर्व संध्या पर चेन्नई के दो स्थानीय समाचार पत्रों में छपी एक ख़बर के लिंक नीचे दिए जा रहे हैं। ये लिंक्स मैंने 18 जगह भेजे और प्रत्योत्तर में माननीय अग्रवाल साहब एक संदेश मिला। एक परम मित्र ने फोन पर लंबी बात की। उनसे लगभग रोज ही बात होती है और अगले दिन तक विदा लेने से पूर्व डबल्यूडबल्यूएफ़ और हिन्दी में समानता पर चर्चा होती है। ये लिंक यहाँ इसलिए दिए जा रहे हैं क्योंकि कुछ लोग अभी भी नहीं मानते कि हिन्दी सबके लिए है। मित्रो, अपनी माँ और मौसी को अपना मानें या न मानें, सच्चाई तो बदली नहीं जा सकती...   
http://www.deccanchronicle.com/channels/cities/chennai/why-should-lic-staff-sign-hindi-asks-mk-392

http://www.thehindu.com/news/states/tamil-nadu/article3663329.ece

Jul 20, 2012

धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल! - अज्ञेय


(अज्ञेय जी की यह कविता मुझे अत्यधिक पसंद है। कल नेट पर यह कविता मुझे मिल गई। जहाँ से मिली वहाँ भी श्रद्धेय अज्ञेय जी के एक परम भक्त के प्रयासों से ही डाली गई होगी। मुझे अब तक अपने जीवन में अज्ञेय जी के प्रति मुझसे अधिक श्रद्धावान दो ही महानुभाव मिले - एक मुंबई में और एक कोचिन में। इसका यह मतलब नहीं कि अज्ञेय जी के प्रति श्रद्धा रखने वालों की कमी है, बस उनके प्रति समर्पित लोग मौन ज्यादा रहते हैं और अपने मन के किसी भी कोने में कोई झरोखा तक नहीं छोड़ते किसी के झाँकने के लिए।  अज्ञेय जी की इस कविता से मैं स्वर्गीय राजेश खन्ना यानी काका को श्रद्धांजलि दे रहा हूँ.........  -अजय मलिक

(1)

धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!
तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल!

जब ईसा को दे कर सूली जनता न समाती थी फूली,
हँसती थी अपने भाई की तिकटी पर देख देह झूली,
ताने दे-दे कर कहते थे सैनिक उस को बेबस पा कर :
''
ले अब पुकार उस ईश्वर को-बेटे को मुक्त करे आ कर!''

जब तख्ते पर कर-बद्ध टँगे, नरवर के कपड़े खून-रँगे,
पाँसे के दाँव लगा कर वे सब आपस में थे बाँट रहे,
तब जिस ने करुणा से भर कर उस जगत्पिता से आग्रह कर
माँगा था, ''मुझे यही वर दे : इन के अपराध क्षमा कर दे!''

वह अन्त समय विश्वास-भरी जग से घिर कर संन्यास-भरी
अपनी पीड़ा की तड़पन में भी पर-पीड़ा से त्रास-भरी
ईसा की सब सहने वाली चिर-जागरुक रहने वाली
यातना तुझे आदर्श बने कटु सुन मीठा कहने वाली!

तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल-
धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!

(2)

धक्-धक् धक्-धक् ओ मेरे दिल!
तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल!

बोधी तरु की छाया नीचे जिज्ञासु बने-आँखें मीचे-
थे नेत्र खुल गये गौतम के जब प्रज्ञा के तारे चमके;
सिद्धार्थ हुआ, जब बुद्ध बना, जगती ने यह सन्देश सुना-
''
तू संघबद्ध हो जा मानव! अब शरण धर्म की आ, मानव!''

जिस आत्मदान से तड़प रही गोपा ने थी वह बात कही-
जिस साहस से निज द्वार खड़े उस ने प्रियतम की भीख सही-
''तू अन्धकार में मेरा था, आलोक देख कर चला गया;
वह साधन तेरे गौरव का गौरव द्वारा ही छला गया-

पर मैं अबला हूँ  इसीलिए, कहती हूँ, प्रणत प्रणाम किये,
मैं तो उस मोह-निशा में भी ओ मेरे राजा! तेरी थी;
अब तुझ से पा कर ज्ञान नया यह एकनिष्ठ मन जान गया
मैं महाश्रमण की चेरी हूँ-ओ मेरे भिक्षुक! तेरी हूँ!''

वह मर्माहत, वह चिर-कातर, पर आत्मदान को चिर-तत्पर,
युग-युग से सदा पुकार रहा औदार्य-भरा नारी का उर!
तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल-
धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!

(3)

धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!
तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल!

बीते युग में जब किसी दिवस प्रेयसि के आग्रह से बेबस,
उस आदिम आदम ने पागल, चख लिया ज्ञान का वर्जित फल,
अपमानित विधि हुंकार उठी, हो वज्रहस्त फुफकार उठी,
अनिवार्य शाप के अंकुश से धरती में एक पुकार उठी :

''
तू मुक्त न होगा जीने से, भव का कड़वा रस पीने से-
तू अपना नरक बनावेगा अपने ही खून-पसीने से!''
तब तुझ में जो दु:सह स्पन्दन कर उठा एक व्याकुल क्रन्दन :
''
हम नन्दन से निर्वासित हैं, ईश्वर-आश्रय से वंचित हैं;

पर मैं तो हूँ पर तुम तो हो-हम साथी हैं, फिर हो सो हो!
गौरव विधि का होगा क्योंकर मेरी-तेरी पूजा खो कर?''
उस स्पन्दन ही से मान-भरे, ओ उर मेरे अरमान-भरे,
ओ मानस मेरे मतवाले-ओ पौरुष के अभिमान-भरे!

तुझ में सामर्थ्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल,
धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल!

- सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन 'अज्ञेय' 

Jul 12, 2012

राष्ट्रभाषा : मनन, मंथन, मंतव्य

यहाँ विकिबुक्स के एक लेख, जिसे अनेक लेखों का संकलन कहा जा सकता है, लिंक दिया जा रहा है-


http://hi.wikibooks.org/wiki/AF


समय हो तो जरूर पढ़ें, समय न हो तो अवश्य पढ़ें

(सौजन्य विकिबुक्स)

लीला गहन प्राज्ञ पाठ्यक्रम ऑनलाइन परीक्षा की लिखित भाग की परीक्षा के लिए नमूना प्रश्न पत्र


Jun 23, 2012

कारक

(भारत कोश के सौजन्य से) 

Jun 17, 2012

'फादर्स डे' पर काका हाथरसी की एक कविता


फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸
लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।
कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸
दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।
कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸
मौज कर रहे पुत्र¸ हडि्डयां घिसते फादर।

पढ़नालिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸
होते रहु दो साल तक फस्ट इयर में फेल।
फस्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸
साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।
कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸
मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।

प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸
लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।
मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸
शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें 'काका कवि' राय¸ भयंकर तुमको देता¸
बन सकते हो इसी तरह 'बिगड़े दिल नेता।
- काका हाथरसी
(कविता कोश के सौजन्य से )

पूछ लूँ मैं नाम तेरा ....... - अज्ञेय


( अज्ञेय जी की इस कविता को न जाने कितने बरसों से ढूंढ रहा था मैं..."पूर्वा" में पढ़ी इस कविता के कुछ अंश मुझे सदा याद रहे मगर पूरी कविता याद करने-गुनगुनाने की चाह हमेशा बनी रही। आज अचानक मुझे यह कविता दास्तां-ए-समीर नामक ब्लॉग पर मिल गई। समीर जी को धन्यवाद)

पूछ लूँ मैं नाम तेरा,
मिलन रजनी हो चुकीविच्छेद का अब है सवेरा!
जा रहा हूँ और कितनी देर अब विश्राम होगा,
तू सदय है किन्तु तुझको और भी तो काम होगा!
प्यार का साथी बना थाविघ्न बनने तक रुकूँ क्यों?
समझ ले स्वीकार कर ले, यह कृतज्ञ प्रणाम मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


और होगा मूर्ख जिसने चिर-मिलन की आस पाली-
'पा चुका अपना चुका' - है कौन ऐसा भाग्यशाली ?
इस तड़ित को बाँध लेना, दैव से मैंने न माँगा-
मूर्ख उतना हूँ नही, इतना नहीं है भाग्य मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


श्वाँस की हैं दो क्रियाएँ - खींचना फिर छोड़ देना,
कब भला संभव हमे इस अनुक्रम को तोड़ देना?
श्वाँस की उस संधि सा है इस जगत में प्यार का पल,
रुक सकेगा कौन कब तक बीच पथ में डाल डेरा?
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


घूमते हैं गगन में जो दीखते हैं स्वच्छंद तारे,
एक आँचल में पड़े भी अलग रहते हैं बिचारे-
भूल में पल भर भले छू जाएँ उनकी मेखलाएँ-
दास मैं भी हूँ नियति का क्या भला विश्वास मेरा!
पूछ लूँ मै नाम तेरा!


प्रेम को चिर एक्य कोई मूढ़ होगा तो कहेगा,
विरह की पीड़ा न हो तो प्रेम क्या जीता रहेगा?
जो सदा बांधे रहे वह एक कारावास होगा-
घर वही है जो थके का रैन भर का हो बसेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


प्रकृत भी है अनुभूति; वह रस-दायिनी निष्पाप भी है,
मार्ग उसका रोकना ही पाप भी है, शाप भी है;
मिलन हो, मुख चूम लेंआई विदा, ले राह अपनी-
मैं न पूछूंतुम न जानो, क्या रहा अंजाम मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


रात बीतीयद्यपि उसमें संग भी था, रंग भी था,
अलग अंगों में हमारे, स्फूर्त एक अनंग भी था;
तीन की उस एकता में प्रलय ने तांडव किया था-
सृष्टि-भर को एक क्षण भर बाहुओं का बाँध घेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


सोच मत, 'यह प्रश्न क्यों, जब अलग ही हैं मार्ग अपने?'
सच नहीं होते, इसी से भूलता है कौन सपने?
मोह हमको है नहीं पर द्वार आशा का खुला है-
क्या पता फिर सामना हो जाए तेरा और मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


कौन हम-तुम? दुःख और सुख होते रहेहोते रहेंगे;
जान कर परिचय परस्पर हम किसे जाकर कहेंगे?
पूछता हूँ क्योंकि आगे जानता हूँ क्या बदा है-
प्रेम जग का, और केवल नाम तेरा, नाम मेरा!
पूछ लूँ मैं नाम तेरा!


मिलन रजनी हो चुकी, विच्छेद का अब है सवेरा.....!!


सचिदानंद हीरानंद वात्सायन 'अज्ञेय' 

Jun 16, 2012

हमारे देश में साक्षरता 1901 से 2011 तक


गीतायन के गीत : फ़िल्मी गीतों से हिंदी सीखने का मंत्र

बहुत दिन बीत गए कोई नया लिंक दिए। आवारा फिल्म का एक संवाद है-"मेरी सूरत ही कुछ ऐसी है"। मित्रो मेरी सूरत और सीरत दोनों ही कुछ ऐसी हैं कि भाई लोग बीच-बीच में उलझाते रहते हैं। बहुत सारी वह ऊर्जा जिसका सदुपयोग कुछ नया करने में होना चाहिए उसे भाई लोगों द्वारा खड़ी की जाने वाली नई-नई बाधाओं को पार करने और स्वयं को जिंदा रखने की जद्दोजहद में करना पड़ता है। जब मैं त्रिवेन्द्रम में था तो डॉ. धर्मवीर जी अक्सर कहा करते  थे- "ये लोग जानते हैं कि तुम कुछ नया कर सकते हो, इसलिए जीवन भर तुम्हें उलझाए रखेंगे"। 
बहरहाल आज एक और लिंक पेश है। गीतायन का यह लिंक आपको 11000 हिंदी फ़िल्मी गीतों को रोमन और देवनागरी में पढ़ने कि सुविधा देता है। iTrans Song Book (ISB) के नाम से संग्रह किए गए ये गीत  कई मायनों में लाजवाब हैं। देवनागरी में इतनी सही वर्तनी में इन गीतों का मिलना अन्यत्र शायद ही कहीं संभव हो सके। गीतायन के 19 वर्षों से जारी इस प्रयास का आप भी लाभ उठाइए और गुनगुनाइए उन सदाबहार गीतों को जो दशकों से आपको सम्मोहित करते चले आ रहे हैं।



    

बस जरा नीचे दिए लिंक को क्लिक कीजिए -

गीतायन.कॉम/

(http://www.giitaayan.com के सौजन्य से) 

प्रवीण एवं प्राज्ञ पाठ्यक्रम की सहायक सामग्री संपादित

हमारी यह कोशिश रही है कि हिंदीतर भाषी हिन्दी प्रेमी विद्यार्थियों के साथ-साथ हमारे मित्र सहकर्मियों के रोज़मर्रा के कार्यालयीन दायित्वों के निर्वाह के लिए भी "हिंदी सबके लिए" सहायक सिद्ध हो सके। इसी क्रम में पिछले दिनों प्रवीण के पाठ सारांशों में दो और पाठों के सारांश सरल शब्दों में तैयार कर जोड़े गए हैं।
प्राज्ञ पाठ्यक्रम के मसौदा लेखन भाग के विभिन्न मसौदों का अलाइनमेंट यानी संरेखण भी गूगल क्रोम की सहायता से सही करने की कोशिश की गई है। अभी भी इसमें बहुत सुधार की आवश्यकता है और हम वादा करते हैं कि आगे भी हम निरंतर सुधार की यह प्रक्रिया जारी रखेंगे।  

Jun 10, 2012

काश, शंघाई की टीम से हिन्दी में गोल्डफिंगर बना पाता!

अचानक परीक्षित का फोन आया- अंकल, नेट पर हो तो जल्दी से शंघाई के प्रीमियर की बुकिंग करा लो। मैंने उसके उकसाने पर 4 टिकटें बुक करा लीं।  आज चौथे दिन भी फिल्म दिमाग पर छाई है। चेन्नै में "लगे रहो मुन्ना भाई" के बाद सिनेमा हाल में यह पहली फिल्म थी जो मैंने देखी। फिर कल रॉवड़ी राठौर भी देखी।


आज शंघाई की दो समीक्षाएं डेक्कन क्रॉनिकल में पढ़ीं। प्रतिष्ठित एवं बेहद वरिष्ठ फिल्म समीक्षक ख़ालिद मोहम्मद ने फिल्म को 50% अंक दिए हैं। यदि मुझे इस पर असहमत होने का हक है तो उनके दिए अंकों से मैं शतप्रतिशत असहमत हूँ। दूसरी समीक्षा सुपर्णा शर्मा की है जो शंघाई को 90% अंक देती है। मैं सुपर्णा शर्मा की समीक्षा को काफी हद तक  सटीक मानता हूँ।
शंघाई फिल्म की शुरुआत जरूर थोड़े हिचकोलों के साथ होती है परंतु जब भूमिका बंध जाती है तो  फिल्म उड़ने लगती है। दर्शक उसकी गति से डरता है, सहमता है मगर उड़ान का पूरा मज़ा लेने का लोभ है कि लगातार बढ़ता जाता है। फिल्म का तकनीकी पक्ष जितना मजबूत है उतना ही कलाकारों का अद्वितीय अभिनय। पटकथा, गीत-संगीत, संपादन सब प्रशंसनीय है।



इमरान हाशमी के अभिनय को लेकर हमेशा मेरे मन में संशय रहा है (भाई संजय मासूम क्षमा करें) मगर शंघाई में उसने जोगी परमार को जिस तरह साकार किया है उससे मैं उसका मुरीद बन गया हूँ...



और अभय देओल का तो कहना ही क्या है! कृष्णन के किरदार में दूसरा कौन है जो इतना परफेक्ट हो सकता था? फारूख शेख के अभिनय पर कुछ कहना तो सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा, अभिनय की इतनी समझ भी मुझमें नहीं है कि उनके बारे में कुछ कह सकूँ।


लेकिन प्रोसेनजीत चटर्जी  ने अहमदी की भूमिका में पृथ्वीराज कपूर और सोहराब मोदी की गरजती आवाज और बलराज साहनी के अभिनय की याद ताज़ा कर दी। कालकी कोचलीन ने भी अपनी भूमिका के साथ बेइंसाफ़ी नहीं होने दी।


भग्गू की भूमिका में पितोबास  त्रिपाठी में मुझे एक और इरफान नज़र आया। निर्देशक दिबाकर बनर्जी को बधाई। 
कुल मिलाकर कह सकता हूँ कि अगर मुझे इस फिल्म की टीम को लेकर फिल्म बनाने के लिए कहा जाए तो बेहिचक मैं हिन्दी में "गोल्डफिंगर" बनाऊँ,  अभय देओल को जेम्स बॉन्ड (सियान कोन्नेरी  ) बना डालूँ, इमरान हाशमी को ओड्डजोब (हेरोल्ड सकाटा) और  प्रोसेनजीत चटर्जी को औरी गोल्डफिंगर (गेर्ट फ़ोरबे) की भूमिका दूँ। फिल्म देखने का मन है तो शंघाई जरूर देखें।  
-अजय मलिक

2007 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्रीमती लता रामचंद्रन, पीआरटी, केंद्रीय विद्यालय आईआईटी मद्रास, लीला प्रवीण का प्रशिक्षण ले रहीं हैं।

केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण उपसंस्थान, लीला हिन्दी कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र, चेन्नै में लीला प्रवीण का प्रशिक्षण ले रहीं श्रीमती लता रामचंद्रन , पीआरटी, केंद्रीय विद्यालय आईआईटी मद्रास, वर्ष 2007 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं। उन्होंने अपने विद्यालय के अनेक शिक्षकों को हिन्दी प्रशिक्षण के लिए प्रेरित किया।
(फोटो सौजन्य  केंद्रीय विद्यालय आईआईटी मद्रास)

नराकास (बैंक एवं वि॰सं॰), चेन्नै के सदस्य कार्यालयों के कार्मिकों के लिए आयोजित हिन्दी/इंडिक यूनिकोड कार्यशाला

केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण उपसंस्थान, लीला हिन्दी कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र, चेन्नई में नराकास  (बैंक एवं वि॰सं॰), चेन्नै के सदस्य कार्यालयों के कार्मिकों के लिए आयोजित हिन्दी/इंडिक यूनिकोड कार्यशाला के उद्घाटन  अवसर का एक चित्र। 


    [फोटो सौजन्य नराकास  (बैंक एवं वि॰सं॰) ]