Feb 23, 2012

इक बार कहो तुम मेरी हो - इब्ने इंशा


इक बार कहो तुम मेरी हो  

-इब्ने इंशा

हम घूम चुके बस्ती-बन में
इक आस का फाँस लिए मन में
कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो
जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में
कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो


दीद=दर्शन; सेरी=तॄप्ति; सूद-ख़सारे=लाभ-हानि

(कविताकोश के सौजन्य से)

नर हो, न निराश करो मन को - मैथिलीशरण गुप्त


मेरे  बहुत  सारे  मित्र  निराश, उदास, बदहवास से लग रहे हैं. उन सब के लिए  मैथिलीशरण गुप्त जी की बचपन में पढ़ी यह कविता प्रस्तुत है -  


नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को


संभलों कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो,
न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को


निज़ गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को


प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को


किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को


करके विधि वाद न खेद करो
निज़ लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो 



(कविताकोश के सौजन्य से )

Feb 4, 2012

दिल्लीवालों की लू उतार दी आशा भोंसले व तीजन बाई ने

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ये दोनों देवियाँ 'लिम्का बुक ऑफ रेकार्ड' के कार्यक्रम में दिल्ली आई थीं. संगीत संबंधी यह कार्यक्रम पूरी तरह अंग्रेजी में चल रहा था. यह कोई अपवाद नहीं था. आजकल दिल्ली में कोई भी कार्यक्रम यदि किसी पांच-सितारा होटल या इंडिया इंटरनेशनल सेंटर जैसी जगहों पर होता है तो वहां हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा के इस्तेमाल का प्रश्न ही नहीं उठता. इस कार्यक्रम में भी सभी वक्तागण एक के बाद एक अंग्रेजी झाड़ रहे थे. मंच संचालक भी अंग्रेजी बोल रहा था.
जब तीजनबाई के बोलने की बारी आई तो उन्होंने कहा कि यहां का माहौल देखकर मैं तो डर गई हूं
आप लोग क्या-क्या बोलते रहे, मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा. मैं तो अंग्रेजी बिल्कुल भी नहीं जानती
तीजनबाई को सम्मानित करने के लिए बुलाया गया था लेकिन जो कुछ वहां हो रहा था, वह उनका अपमान ही था लेकिन श्रोताओं में से कोई भी उठकर कुछ नहीं बोला. तीजनबाई के बोलने के बावजूद कार्यक्रम बड़ी बेशर्मी से अंग्रेजी में ही चलता रहा. इस पर आशा भोंसले झल्ला गईं.

उन्होंने कहा कि मुझे पहली बार पता चला कि दिल्ली में सिर्फ अंग्रेजी बोली जाती है.  लोग अपनी भाषाओं में बात करने में भी शर्म महसूस करते हैं. उन्होंने कहा मैं अभी लंदन से ही लौटी हूं. वहां लोग अंग्रेजी में बोले तो बात समझ में आती है लेकिन दिल्ली का यह माजरा देखकर मैं दंग हूं.
उन्होंने श्रोताओं से फिर पूछा कि आप हिंदी नहीं बोलते, यह ठीक है लेकिन आशा है, मैं जो बोल रही हूं, उसे समझते तो होंगे? दिल्लीवालों पर इससे बड़ी लानत क्या मारी जा सकती थी?

इसके बावजूद जब मंच-संचालक ने अंग्रेजी में ही आशाजी से आग्रह किया कि वे कोई गीत सुनाएँ तो उन्होंने क्या करारा तमाचा जमाया? उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम कोका कोला कंपनी ने आयोजित किया है. आपकी ही कंपनी की कोक मैंने अभी-अभी पी है. मेरा गला खराब हो गया है,
मैं गा नहीं सकती.

क्या हमारे देश के नकलची और गुलाम बुद्घिजीवी आशा भोंसले और तीजनबाई से कोई सबक लेंगे? ये वे लोग हैं, जो मौलिक है और प्रथम श्रेणी के हैं जबकि सड़ी-गली अंग्रेजी झाड़नेवाले हमारे तथाकथित बुद्घिजीवियों को पश्चिमी समाज नकलची और दोयम दर्जे का मानता है. वह उन्हें नोबेल और बुकर आदि पुरस्कार इसलिए भी दे देता है कि वे अपने-अपने देशों में अंग्रेजी के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के मुखर चौकीदार की भूमिका निभाते रहें. उनकी जड़ें अपनी जमीन में नीचे नहीं होतीं, ऊपर होती हैं. वे चमगादड़ों की तरह सिर के बल उल्टे लटके होते हैं. आशा भोंसले ने दिल्लीवालों के बहाने उन्हीं की खबर ली है.

(दा भास्कर' से साभार  )

Jan 26, 2012

जब किसी इंसान या पाषाण में भगवान मिल जाएँ...

यूँ तो मुझे शायद हक नहीं है कि कुछ सोचूँ मगर कभी-कभी परिस्थितियाँ मजबूर कर देती हैं सोचने के लिए, और तब, न चाहते हुए भी मैं सोचने लगता हूँ। बार-बार भरसक प्रयास करता हूँ कि सोचने का यह कष्टसाध्य क्रम ठहर जाए, थोड़ा विराम ले पर जब एक बार यह शुरू होता है तो फिर क्या मजाल कि रुक जाए। मानो सारा ब्रह्मांड सामने आ जाता है, लोक-परलोक, आकाश-पाताल, स्वर्ग-नर्क कुछ भी तो नहीं छूटता। बस छूट जाता है पसीना और अपार ब्रह्म में न जाने कहाँ खो जाती है नींद। फिर नींद को ढूँढते-ढूँढते कई और चक्कर लग जाते हैं जाने कितने ग्रह, नक्षत्र और तारों के...सितारों के पार, चाँद के उस ओर कहीं कुछ नज़र नहीं आता, थक-हार कर न जाने कब कुछ बेहोशी सी छा जाती है।

Jan 24, 2012

केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण उपसंस्‍थान,चेन्नै में आयोजित होने वाले ‘’कंप्‍यूटर पर हिंदी के आई टी टूल्स का प्रशिक्षण कार्यक्रम‘’ फरवरी-मार्च -2012.

केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण उपसंस्थान, चेन्नै में दिसंबर-2011 में सम्पन्न ‘कंप्‍यूटर पर हिंदी के प्रयोग हेतु आधारभूत प्रशिक्षण कार्यक्रमों (२) के प्रतिभागी’


क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन बेंगलुरु-2011 की कुछ तस्वीरें

किसी मित्र ने क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन बेंगलुरु की ढेर सारी तस्वीरें भेजी हैं। यहाँ पेश है कुछ चुनिंदा तस्वीरें-

6 से 10 घंटों में स्वयं इन्स्क्रिप्ट टंकण सीखने के लिए निशुल्क डाउनलोड करें Aasaan हिन्दी टाइपिंग ट्यूटर

लगभग 8 वर्ष पूर्व एक मित्र ने एक द्विभाषी सॉफ्टवेयर 'श्री शक्ति' की डेमो सीडी  दी थी। उसी पर एक "टाइपिंग ट्यूटर" यानी "हिन्दी टंकण शिक्षक" सॉफ्टवेयर भी दिया गया था। उस वक्त तक यूनिकोड का इतना चलन नहीं था। आज हर ओर यूनिकोड की चर्चा है। हिन्दी टाइपिंग ट्यूटर से आप देवनागरी इन्स्क्रिप्ट टंकण स्वयं 6 से 10 घंटे के अभ्यास से सीख़ सकते हैं। इन्स्क्रिप्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आप हिन्दी के साथ-साथ स्वत: अन्य सभी भारतीय भाषाओं की टाइपिंग भी सीख जाते हैं। यह टाइपिंग ट्यूटर सॉफ्टवेयर कितना लाजवाब है यह आप स्वयं प्रयोग करेंगे तो जानेंगे। न किसी क्लास में जाने का झंझट, न किसी की मदद की जरूरत, बस डाउनलोड कीजिए और शुरू हो जाइए... और सब कुछ मुफ्त में...  

हम नीचे Aasaan टाइपिंग ट्यूटर का लिंक दे रहे हैं, जरा आजमाइए तो सही -  


हिन्दी टंकण/ शब्द संसाधन के पुराने प्रश्न-पत्र...मित्रों की माँग पर

काफी दिनों से कुछ मित्र हिन्दी टंकण/  शब्द संसाधन के प्रश्न-पत्रों की माँग कर रहे थे। उनकी सुविधा के लिए वर्ष 2007 में सम्पन्न कंप्यूटर/मैन्युअल/इलेक्ट्रानिक परीक्षा के प्रश्न-पत्र दे रहे हैं। हिन्दी टंकण परीक्षा में दो प्रश्न-पत्र होते हैं। कंप्यूटर/मैन्युअल/इलेक्ट्रानिक हिन्दी टंकण/  शब्द संसाधन  में शायद कोई अन्तर नहीं होता।

Jan 8, 2012

गुजरात में गुजरातियों के लिए हिंदी एक विदेशी भाषा है- एक समाचार

'दा टाइम्स ऑफ इंडिया' में छपी एक खबर के अनुसार माननीय गुजरात उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में गुजरात में गुजरातियों के लिए हिंदी को एक विदेशी भाषा बताया है। पूरी खबर नीचे दिए लिंक से पढ़ी जा सकती है। 

वैसे यह बात बिलकुल सही है कि जिस भाषा की पढ़ाई किसी राज्य विशेष के प्राथमिक विद्यालयों में अनिवार्यत: नहीं कराई जाती तथा जिस राज्य के निवासियों की मातृभाषा वह भाषा नहीं है, उसे विदेशी भाषा ही माना जाता है। मेरा भी व्यक्तिगत रूप से यही मानना है कि हिंदी शिक्षण योजना के अंतर्गत हिंदी न जानने वालों को हिंदी परदेशी / विदेशी भाषा के रूप में ही पढ़ाई जाती है। यहाँ परदेशी / विदेशी भाषा से अभिप्राय: भारत से इतर किसी अन्य देश की भाषा से नहीं लिया जाना चाहिए।
पूरा आदेश पढ़ने के लिए लिंक नीचे दिया गया है-
http://gujarathc-casestatus.nic.in/gujarathc/showoj.jsp?side=C&casetype=SCA&caseno=10826&caseyr=2011&orddate=29/12/2011&ordno=6&incrno=8461&findcatg=txtSearch  

Dec 31, 2011

व्हाई दिस कोलावरी डी... यह किस भाषा का "सॉन्ग" है!

यह इस वर्ष की अंतिम पोस्ट है। अपनी भाषाओं की चिंता करते हुए काफी घबराहट के साथ मैं भी कोलावरी डी' का आनंद ले रहा हूँ। लगातार यही विचार मन में आता है कि इस गाने में तमिल अथवा हिंदी के कितने शब्द हैं? वर्ष 1991 तथा 2001 की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार हमारे देश में तमिल बोलने वालों का प्रतिशत 6.32 से घटकर 5.91 पर आ गया। वर्ष 2011 की जनगणना के पूरे आँकड़े अभी नहीं मिल पाए हैं। प्रश्न यही है कि हम कहाँ जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं? तमिल फिल्मों के सितारे और पूरा देश एक ऐसे गाने को तमिल का गाना मानकर वह-वाह कर रहे हैं जिसमें तमिल का शायद ही कोई शब्द है। तमिल का लहजा ज़रूर मौजूद कहा जा सकता है। इस गीत की धुन में नयापन है, पकड़ है, माधुर्य है मगर अपनी कोई भी भाषा या उसका कोई शब्द ... शायद नहीं है। आने वाले नए वर्ष 2012 में इस बारे में चिंतन जरूर किया जाना चाहिए कि क्या ऐसे गानों से हम जाने-अंजाने अपनी भाषाओं को तो  भुलाने के दुष्चक्र में नहीं फँसते जा रहे हैं। मुझे ऐसी एक भी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी, जिसमें इस गाने की भाषा पर चिंता व्यक्त की गई हो। हो सकता है कुछ लोग सहमत न हों परंतु यह मेरा व्यक्तिगत विचार है कि तमिल भाषा का  विकास, हिंदी के विकास के लिए सर्वाधिक जरूरी है। तमिल को मजबूत बनाने से हिंदी भी स्वत: मजबूत होती है क्योंकि इससे अंग्रेज़ी की गति में ठहराव आता है। 
नव वर्ष 2012 की शुभकामनाओं के साथ, मैं एक हिंदी भाषी भारतीय, अपनी सभी भाषाओं के उत्तरोत्तर विकास की कामना करते हुए आग्रह करना चाहता हूँ कि कोलावरी डी' पर आप भी सोचिए... संगीत को सहज स्वीकारिये मगर अपनी भाषाओं के सुर, लय, ताल को ताक पर मत रखिए।  

नववर्ष 2012 हमारी सभी भाषाओं के लिए भी शुभ हो।

-अजय मलिक

नए साल की शुभकामनाएँ

हिंदी/इंडिक सक्रिय करने के लिए अजय मलिक की एक वीडियो फिल्म


इस फिल्म को पावर पॉइंट से बनाया गया है। मूल फिल्म का आकार (साइज़) लगभग 746 एम बी था, जिसे ब्लॉग पर दे पाना संभव नहीं था। इसे ब्लॉग पर लाने के लिए लगभग 10 गुणा छोटा करना पड़ा जिसके कारण इसकी गुणवत्ता भी उतनी ही घट गई। एक वरिष्ठ की सलाह पर बस प्रयोग के तौर पर यह फिल्म यहाँ दी जा रही है।
-प्रतिभा मलिक

Dec 24, 2011

पाँच मिनटों में सीखें हिंदी इंस्क्रिप्ट कुंजी पटल लेआउट - लीना महेंडले

[यह आलेख साभार राजभाषा गूगल ग्रुप से लिया गया है। सुश्री लीना महेंडले के इस आलेख में इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल लेआउट सीखने का बेहद सरल और आकर्षक तरीका बताया गया है। इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे हिंदी सहित किसी भी भारतीय भाषा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कुंजीपटल सभी भारतीय भाषाओं के लिए लिनक्स तथा मैक ऑपरेटिंग सिस्टम्स में भी उपलब्ध है। यदि इस आलेख को ध्यान से पढ़ा जाए तो इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल लेआउट को आत्मसात करने में बहुत कम समय लगता है। फिर बस कुछ घंटों के अभ्यास की जरूरत ही भारतीय भाषाओं में टाइप करने के लिए शेष रह जाती है। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और न्यायाधीश द्वारा विशेषकर स्कूली बच्चों के लिए तैयार इस आलेख से यह भी प्रमाणित होता है कि यदि मन से शुरुआत भर हो जाए तो भारतीय भाषाओं और संघ की राजभाषा हिंदी में कामकाज करने में किसी को कोई कठिनाई नहीं हो सकती। ]   
बच्चों, अब तो स्कूलों में भी संगणक (कम्प्यूटर) सिखाया जाने लगा है और तुममें से कईयों के घर में भी यह जरूर होगा... तो क्या तुम जानते हो कि संगणक पर हिंदी सीखने के लिये एक  युक्ति है जिसमें केवल आधा घंटा पर्याप्त है और वह भी अंग्रेजी टंकण-ज्ञान पर निर्भरता के बिना। और अगर पूरी बात कहूँ तो हरेक भारतीय भाषा सीखने की यही युक्ति है।

Dec 22, 2011

फिर एक लंबा अंतराल...शायद अब तक का सबसे लंबा

फिल्म समारोहों में मैं कभी अधूरे मन से नहीं गया था मगर इस बार यह भी हो गया। हर साल 15 दिन मैं फिल्म समारोह ले लिए रखा करता था...इस बार सिर्फ एक दिन रह गया। पूर्णता उस एक दिन में भी पाने की कोशिश की। संयोग से एक के बाद एक तीन मलयालम फिल्में देखने का मौंका मिला।
विम वेंडर्स निर्देशित जर्मनी की प्रस्तुति "पिना" देखकर मन गदगद हो गया। इस थ्री डी फिल्म पर बहुत कुछ लिखने की इच्छा हुई परंतु एक शब्द भी नहीं लिखा जा सका। ईरानी फिल्मों का दबदबा आज भी कायम है। सिराज की सिफारिश पर असगर फरहीदी निर्देशित "नाड़ेर एंड सिमीन अ' सेपरेशन" देखी और सिराज को धन्यवाद दिया। यकीन मानिए लाजवाब फिल्म थी।   "विनर" देखने से कैसे वंचित रह गया, यह अपने आप में बड़ी घटना रही। इज़राइल की जोसेफ मड्मोंय निर्देशित "रेस्टोरेशन" ने भी निराश नहीं किया। समीर ताहिर निर्देशित मलयालम फिल्म "चप्पा कुरिषु" पूरी नहीं देख पाया मगर वी के प्रकाश की "कर्मयोगी और राजेश पिल्लै की "ट्रैफिक" (दोनों मलयालम) पूरी देखने का मौका मिला। कर्मयोगी तो कमाल की फिल्म रही मगर ट्रैफिक की लम्बाई ने थोड़ा बेचैन किया। लेकिन मजेदार रही रेवती की 17 मिनट की अंग्रेज़ी/तमिल फिल्म "रेड बिल्डिंग इज़ वेयर द' सन सेट्स"। 
इन सब फिल्मों की चर्चा तभी अच्छे से कर पाता जब फिल्म समारोह में मन से जाना होता। इस बार गोवा गया तो सिर्फ डॉक्टर साहब और भाभी जी से मिलने था। किसी भी फिल्म समारोह से ज्यादा जरूरी था उनसे मिलना।  
मगर इस बार इतना लंबा अंतराल हो गया कि खुद हैरान हूँ... व्यस्तता और जिम्मेदारी के अहसास ने वक्त ही नहीं दिया। पिछले बीस दिनों में दो बार दिल्ली, गोवा, मद्रास ने इतना उलझाकर रखा कि 4-6 घंटों से ज्यादा सोना भी नसीब नहीं हुआ। फिर भी जिंदगी में व्यस्तता स्वयं में एक बड़ा सहारा है सुकून से जीने का। इतने पर भी मन तो यही कहता है-इतना बड़ा अंतराल तो अच्छी बात नहीं है, इसे नहीं ही होना चाहिए था...   

- अजय मलिक

Nov 26, 2011

कुछ झलकियाँ गोवा से 42वें फिल्म समारोह की








-अजय मलिक

हिन्दी होम पेज़ और कुछ और लाजवाब लिंक्स

इन लिंक्स के बारे कुछ भी कहना कम ही पड़ेगा। इसलिए बस आपके परखने के लिए इन्हें दिया जा रहा है। जरूर आज़माइगा-


http://www.hindi2tech.com/


https://sites.google.com/site/hindifontconverters/files  


http://www.youtube.com/user/hindiuniversity#g/c/3544B2DE2CA53E5D  

http://www.hindihomepage.com/index.php  



http://groups.google.com/group/technical-hindi/browse_thread/thread/c26508dc3f75e150  


http://www.sanskritweb.net/itrans/#SANS2003  


क्या-क्या नहीं किया है लोगों ने हिन्दी के लिए ... मुझे तो कभी-कभी लगता है कि सिखाना तो दूर अपनी तो अभी सीखने की भी शुरुआत नहीं हो पाई है। 
  
-अजय मलिक

Nov 23, 2011

गोवा में भारत के बयालीसवें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह-2011 का आगाज़ आज

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती अंबिका सोनी आज गोवा में बयालीसवें भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह-2011 के शुभारंभ के अवसर पर सुप्रसिद्ध फ्रेंच फिल्‍म निर्माता बर्ट्रेंड टैवरनियर को लाइफटाइम अचीवमेंट सम्‍मान से नवाजेंगी। इस सम्‍मान के तहत 10 लाख रुपए की राशि, स्‍क्रॉल और प्रमाण पत्र दिया जाएगा।


भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के निदेशक श्री शंकर मोहन ने आई.एफ.एफ.आई.-11 का पोस्‍टर को जारी करते हुए बताया कि आज (23 नवम्बर) शाम 5 बजे 42वें भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म के उद्घाटन समारोह के अवसर पर रा.वन के जी.वन यानी शाहरुख खान भी शिरकत करेंगे।   23 नवम्बर से 3 दिसम्‍बर 2011 तक चलने वाले इस समारोह थीम है -'वसुधैव कुटुम्‍बकम' अर्थात 'समूचा विश्‍व एक परिवार'। आई.एफ.एफ.आई. के विज्ञापन का डिजाइन श्री थोटा थरानी ने तैयार किया है।

इस समारोह का आयोजन भारत सरकार द्वारा गोवा राज्‍य सरकार और आई.एफ.एफ.आई. के सहयोग से किया जा रहा है। इसमें भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍मों को प्रदर्शित किया जाएगा।
 

समापन समारोह में दक्षिणी सिनेमा की प्रसिद्ध हस्‍ती सुरैया शिरकत करेंगी। उद्घाटन समारोह में 'उरूमी' फिल्‍म प्रदर्शित की जाएगी और इसमें भारतीय फिल्‍में जैसे 'रंजना अमी अर अस्‍बो ना', 'जिंदगी ना मिलेगी दोबारा' जैसी फिल्‍मों के अलावा  कान, लोकार्नो और मॉण्ट्रियल फिल्‍म समारोहों में चर्चित हो चुकीं विश्‍व के 65 देशों की 100 से अधिक फिल्‍में प्रदर्शित की जाएँगी।
-अजय मलिक

Nov 20, 2011

केंद्रीय सरकार के सिविलियन कर्मचारियों की जनगणना

“सेन्सस ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लॉईस” यानी केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों की जनगणना, एक रिपोर्ट हैजिसे भारत सरकार, श्रम मंत्रालय, रोजगार एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय, जामनगर हाउस, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2003 में प्रकाशित किया गया। इसमें केंद्रीय सरकार के सिविलियन कर्मचारियों के 31 मार्च 2001 तक के आँकड़े दिए गए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 में पूर्वोत्तर राज्यों में केंद्रीय सरकार के नियमित कर्मचारियों की संख्या कुछ इस प्रकार थी-

असम -76,500; मणिपुर-4,800; मेघालय-16,600; नागालेंड-6,700; सिक्किम-400; त्रिपुरा-7,200; अरुणाचल प्रदेश-2000; मिजोरम-800 यानी कुल 1,15,000 केंद्रीय सरकार के नियमित कर्मचारी/ अधिकारी थे। इन आँकड़ों का अगर थोड़ा और विश्लेषण किया जाए तो असम और मेघालय को छोड़कर शेष संपूर्ण पूर्वोत्तर राज्यों में कुल 21,900 केंद्रीय सरकार के नियमित कर्मचारी/ अधिकारी थे। ये किसी एक राज्य विशेष के रहने वाले न होकर सभी राज्यों के विभिन्न भाषा-भाषी समुदाय के होने चाहिए।

उपर्युक्त रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 में पॉण्डिचेरी में 5,200 नियमित केंद्रीय सरकार के कर्मचारी थे। गोवा, दामन दीव में 5,900; दादरा नगर हवेली में 2,600; जम्मू-काश्मीर में 28,000 केंद्रीय सरकार के कर्मचारी थे।

वर्ष 2001 में बिहार में 1,80,200; छत्तीसगढ़ में 45,500; हरियाणा में 31,000; हिमाचल प्रदेश में 16,500; मध्यप्रदेश में 1,61,700; पंजाब में 79,000; राजस्थान में 1,64,700; उत्तर प्रदेश में 3,95,600; उत्तरांचल में 27,500; चंडीगढ़ में 16,900; अंडमान-निकोबार में 4,800 केंद्रीय सरकार के नियमित कर्मचारी थे।

यदि पिछले वर्षों में विभिन्न पदों में हुई कटौती पर विचार किया जाए तो वर्ष 2011 तक इस संख्या में कुछ प्रतिशत कमी आनी चाहिए?

मेरी जिज्ञासा का विषय यह है कि उपर्युक्त कर्मचारियों तथा अधिकारियों में कितने हिंदीभाषी अथवा हिन्दी जानने वाले रहे होंगे?

जिस रिपोर्ट के आधार पर यह आलेख तैयार किया गया है, उसका लिंक नीचे दिया जा रहा है-


- अजय मलिक

 

भारतीय पैनोरमा खंड :: iffi11:: 24 में से 7 मलयालम फिल्मों के साथ - केरल सबसे आगे

     23 नवम्बर से गोवा में शुरू हो रहे भारत के 42वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के भारतीय पैनोरमा खंड में कुल 24 कथा फिल्में तथा 21 गैर-कथा फिल्में दिखाई जाएँगी। मशहूर फिल्मकार सई परांजपे की अध्यक्षता में गठित जूरी के 10 सदस्यों  ने 21 दिन की मशक्कत के बाद 118 फिल्मों में से कुल 23 फिल्मों का चयन भारतीय पैनोरमा खंड के लिए किया। इसी के साथ इस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कथा फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजी गई निर्देशक सलीम अहमद की मलयालम प्रस्तुति 'आदामिन्टे मकन अबु' को परंपरानुसार सीधे प्रवेश मिला। कुल चौबीस  कथा फिल्मों में से सर्वाधिक 7 मलयालम फिल्में हैं।

     इस खंड में जहाँ हिन्दी, बांग्ला तथा मराठी की तीन-तीन फिल्में  हैं वहीं असमिया, कन्नड़, भोजपुरी,  कोंकणी, मणिपुरी, अंग्रेज़ी, तमिल तथा तेलुगु की मात्र एक-एक फिल्में ही  स्थान बना सकीं। इस खंड की हिन्दी फिल्मों में हैं- निर्देशक प्रवीण डबास की "सही धंधे गलत बंदे";तिगमांशु धूलिया निर्देशित "शागिर्द" और  जोया अख्तर निर्देशित " ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा"।

     गैर कथा फिल्मों के लिए लेखक-निर्देशक अशोक राणे की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय जूरी ने 135 फिल्मों में से जिन 21 फिल्मों का चयन किया है उनमें  सर्वाधिक 6 फिल्में हिन्दी भाषा की  हैं। इसके अलावा  अंग्रेज़ी की 4, बांग्ला, मणिपुरी, गुजराती तथा मराठी भाषा की एक-एक तथा शेष मिश्रित भाषा में बनी फिल्में हैं। 
                                                    
 -अजय मलिक

Nov 12, 2011

भारत का 42वाँ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, 23 से गोवा में



भारत का बयालीसवाँ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, गोवा में 23 नवम्बर 2011 से 03 दिसंबर 2011 तक आयोजित किया जाएगा। इस दौरान देश-विदेश की अनेक फिल्मों का प्रदर्शन विभिन्न खंडों में किया जारगा। फिल्म समीक्षकों/ मीडिया के सदस्यों के लिए पंजीकरण की ऑनलाइन सुविधा नीचे दिए लिंक पर 15 नवम्बर 2011 तक उपलब्ध है-


-अजय मलिक

Oct 30, 2011

खाली मन के कई सवाल और मन-मन भर के कई उत्तर मनके

आदमी सोचता कुछ है, करता कुछ है और होता कुछ है। गाँव, घर, बूढ़े बाबा (दादा) और बड़े मामा की जब याद आती है तो अतीत के ढेर सारे पन्ने फड़फड़ाते पंखों की तरह खुलते चले जाते हैं। चौमासे के हफ्तों तक चले झड़ (लगातार झर-झर झरती बूदों ) के बाद नीले खुले आसमान तले, पानी के तेज प्रवाह से बहकर आई मिट्टी से बनी गोल मसनद सी पर कूदना और घुटनों तक मिट्टी में धँस जाना। ढेंचे के वे बड़े-बड़े हरे पौधे, ज्वार के आठ-दस फुट लंबे हरे पेड़ या पोधे, सुबह-सुबह न्यार (चारा) लेने सिद्धों या लालावाले  खेतों पर जाना। वो बड़ी-बड़ी गड्डियाँ सिर पर लादे, गर्दन ताने दौड़ने के मानिद चलना... फिर स्कूल के लिए जैसे-तैसे भागना। स्कूल से आने पर बड़े बाबा (ताऊ) का हुक्का ताजा करने, चिलम भरने का आदेश। शाम को भैंस का दूध दूहने  के लिए घंटों बैठे रहना... मच्छर ही नहीं डांस तक के डंक झेलना... सुबह-शाम कुएँ पर बाल्टी से पानी खींचकर नहाना। बरसात में कुआँ ऊपर तक भर जाता था, गज भर की रस्सी पानी खिचने के लिए काफी होती थी। काफी लोग एक साथ अलग-अलग बाल्टी लिए कुएँ पर नहाया कराते थे... वह कुआँ, उसके सामने की खुली जगह सब न जाने किस-किसने कब्जा ली है... अब वह रौनक कहीं भी नज़र नहीं आती। गाँव के लोग आज स्नेह भरी नज़रों से देखते नहीं, बल्कि संदेह भरी निगाहों से घूरते हैं। पिछले दिनों कृष्णबीर से बात हुई ... दशकों पहले वह मध्यप्रदेश पुलिस में भर्ती हो गया था... उसने बताया इस बार भी गाँव के चारों और रौह आ गई थी, खूब बरसा मेह इस बार... मगर वे छप्पर, वे ओसारे, वह छान अब गाँव में कहीं नहीं जो गाँव को गाँव होने का गौरव देते थे... 
कल मोटी-मोटी नमकीन रोटियाँ बनवाईं और प्याज की गंठी के साथ खाईं...इसे आप सनक कह सकते हैं... मुँह और गला प्याज से अभी तक जला हुआ है, मगर जो आनंद मिला उसे बयान नहीं किया जा सकता। आज शहरी हो जाने के बाद सब कुछ बनावटी सा हो गया है... मिट्टी से जीवन भर आदमी भागता फिरता है और अंत में उसी मिट्टी में शरण पाता है... चांदी-सोना कितना ललचाता है, मगर अंतत: सब मिट्टी हो जाता है।          

लिनक्स और भारतीय भाषाओं के लिए यूनिकोड

        लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम्स वाले कंप्यूटरों पर भी भारतीय भाषाओं में यूनिकोड में काम करने में कोई कठिनाई नहीं है, यहाँ कुछ लिंक्स देकर आपको सीधे लिनक्स की दुनिया तक पहुँचाया जा रहा है -
http://www.cdacmumbai.in/projects/indix/n_download.shtml

        "इंडिक्स" प्रस्तावना से साभार एक पैरा यहाँ दिया जा रहा- "टीडीआईएल कार्यक्रम के अंतर्गत संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा निधिक इंडिक्स परियोजना का मुख्य उद्देश्य है, नि:शुल्क सॉफ्टवेयर तथा खुले प्लैटफार्म और प्रणालियों के द्वारा भारतीय भाषाओं के कम्प्यूटिंग अनुप्रयोगों का बड़े पैमाने पर उपयोग उपलब्ध करना। इस परियोजना का विशिष्ट एवं तात्कालिक लक्ष्य है, यूनीकोड (UNICODE) तथा इस्की (ISCII) कूटों का प्रयोग करते हुए लिनक्स ऑपरेटिंग प्रणाली के योग्य अंगभूतों का स्थानीकरण, ताकि 12 मुख्य भारतीय भाषाओं के विषय विस्तु का सृजन, सम्पादन, अवलोकन तथा मुद्रण किया जा सके। ये 12 भाषाएं है- असमिया, बंगला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल और तेलुगु। इंडिक्स परियोजना के पहले चरण में भारतीय लिपियों, विशेषकर हिंदी भाषा, की विशेषताओं को उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित किया गया"
        नीचे कुछ लिंक्स दिए जा रहे हैं, उनके लिए, जो लिनक्स जैसे मुद्दों पर आगे पढ़ना और बढ़ना चाहते हैं । इनके माध्यम से कई व्यावहारिक समस्याओं के समाधान पाए जा सकते हैं। निशुल्क उपलब्ध यह सामग्री कितनी उपयोगी है, यह आप स्वयं आजमाइए-


http://epandit.shrish.in/labs/Indic-IME-Lite

       इसके अलावा नीचे दिए गए लिंक से यदि चाहें तो तीन चीजें डाउन लोड करें-

1. remington-installer

2. Linux pocket guide in Hindi

3. Converter-Training
और लिंक है-
http://cid-60eace63e15a752a.office.live.com/self.aspx/.Public/remingt...


-अजय मलिक



Oct 26, 2011

कुछ दीप जलाओ तुम भी, कुछ दीप जलाएँ हम भी

हर घर में उजियारा भरने
कुछ दीप जलाओ तुम भी
जग भर को उजियारा करने

Oct 19, 2011

यदि विंडोज XP में लैंग्वेज़ बार गायब हो जाए...

टास्क बार से यदि लैंग्वेज़ बार गायब हो जाए तो क्या हो...

आज विंडोज XP में लैंग्वेज़   की बात करेंगे। यदि टास्क बार से EN गायब हो गया है तो पहले स्क्रीन पर लैंग्वेज़  बार तलाशें। हो सकता है आपने लैंग्वेज़ बार रेस्टोर बटन क्लिक कर दिया हो। यदि स्क्रीन पर लैंग्वेज़ बार नहीं है तो आपने लैंग्वेज़  बार को छुपा (hide) दिया है। इसे पुन: पाने के लिए कंट्रोल पैनल में रीज़नल  एवं लैंग्वेज़  विकल्प में जाएँ और Languages क्लिक करने के बाद नीचे दिए

Oct 18, 2011

यदि लैड्ग्वेज बार गायब हो जाए तो क्या हो...

कुछ मित्रों ने पूछा है-
टास्क बार से यदि लैड्ग्वेज बार गायब हो जाए तो क्या हो...
आज विंडोज विस्ता और 7 की बात करेंगे। यदि टास्क बार से EN गायब हो गया है तो पहले स्क्रीन पर लैड्ग्वेज बार तलाशें। हो सकता है आपने लैड्ग्वेज बार रेस्टोर बटन क्लिक कर दिया हो। यदि स्क्रीन पर लैड्ग्वेज बार नहीं है तो आपने लैड्ग्वेज बार को छुपा (hide) दिया है। इसे पुन: पाने के

Oct 17, 2011

विभिन्न ऑपरेटिंग सिस्टम्स में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की यनिकोड सक्रियता हेतु सहायता

ऑपरेटिंग सिस्टम विंडोज़ हों या मैक या लिनक्स, भारतीय भाषा हिंदी हो या तमिल, बांग्ला हो या मलयालम, यूनिकोड सक्रियता हेतु निशुल्क सहायता उपलब्ध है- विकीपीडिया पर। एक ही आलेख में लगभग सारी बातों पर चर्चा और संभावित समाधान और...और भी बहुत कुछ, बस नीचे दिए लिंक को क्लिक करें... हो जाएगी बल्ले-बल्ले    


(wikipedia.org के सौजन्य से)

Oct 15, 2011

भाषायी कंप्यूटरीकरण संबंधी समस्याओं का समाधान

                 राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार की वेबसाइट http://www.rajbhasha.gov.in/  पर सामूहिक चर्चा-परिचर्चा का एक मंच हाल ही में शुरू किया गया है जिसे नाम दिया गया है- "भाषायी कंप्यूटरीकरण संबंधी समस्याओं का समाधान।"  देश-विदेश का कोई भी व्यक्ति जिसके पास गूगल ई मेल का पता है, इस समूह का सदस्य बन सकता है। समूह के  सदस्य हिन्दी/इंडिक कम्प्यूटिंग से संबंधित अपनी समस्याएँ पोस्ट कर सकते हैं। इन समस्याओं के समाधान भी समूह के सदस्यों द्वारा सुझाए जाएँगे। हिन्दी/इंडिक  कम्प्यूटिंग पर राष्ट्रीय सूचना केंद्र के वरिष्ठ तकनीकी निदेशक श्री केवल कृष्ण जी की विशेष अभ्युक्तियाँ भी इस मंच पर उपलब्ध होंगी। इस समूह के बारे और अधिक जानकारी के लिए कृपया नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें- 

भाषायी कंप्यूटरीकरण संबंधी समस्याओं का समाधान


Oct 7, 2011

चाणक्य फॉन्ट को निशुल्क यूनिकोड में बदलें

शुषा, कृतिदेव, चाणक्य, शिवाजी और श्रीलिपि फोंट्स को निशुल्क यूनिकोड फोंट्स में बदलने की सुविधा कविता कोश (www.kavitakosh.org/) पर उपलब्ध है। कवितकोष के मुखपृष्ठ  पर फॉन्ट परिवर्तक बटन दबाने पर आप उपर्युक्त फॉन्ट कन्वर्टर पृष्ठ पर पहुँच जाएंगे। उपर्युक्त जिस भी फॉन्ट में आपका दस्तावेज़ है उसे चुनिए और बाक्स में पेस्ट कर दीजिए, बस आपका काम हो जाएगा। यदि आप यूनिकोड फोंट्स में तैयार दस्तावेज़ को उपर्युक्त नॉन यूनिकोड फोंट्स में बदलना चाहते हैं तो उसका विकल्प भी मौजूद है। मुफ्त आजमाने में आपका क्या जाता है?

बस एक बात का ध्यान जरूर रखें कि कविताकोश फ़ायरफ़ॉक्स तथा गूगल क्रोम में ही सर्वोत्तम दिखाई देता है।

-अजय मलिक

Oct 6, 2011

विश्व जन की विजय हो, नव सृजन की विजय हो...... असत्य परे सत्य हो और सत्य की ही विजय हो......




                                                                                                           सभी छवियाँ गूगल छवि से साभार

Oct 1, 2011

थोड़ा मनोरंजन, फ़ेसबुक से विशाल अग्रवाल का संकलन-3

थोड़ा मनोरंजन, फ़ेसबुक से विशाल अग्रवाल का संकलन-2

थोड़ा मनोरंजन, फ़ेसबुक से विशाल अग्रवाल का संकलन-1

राजभाषा विभाग के नए सचिव
















व्हिसपर्स इन दा कोरिडोर्स की खबर के अनुसार वर्तमान पॅंचायती राज सचिव श्री ए एन पी सिन्हा राजभाषा विभाग के नए सचिव बनाए गए हैं। वे बिहार कैडर के 1974 बैच के वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी हैं।  

Sep 30, 2011

एक प्रश्नपत्र राजभाषा से संबंधित


राजभाषा प्रतियोगिता : 2011

नोट : प्रश्न - 1 से 25 तक अनिवार्य हैं तथा प्रत्येक प्रश्न के लिए 1 अंक निर्धारित है। प्रश्न - 26 में हिंदी में अनुवाद हेतु 5 अँग्रेजी टिप्पणियाँ दी गई हैं। प्रत्येक टिप्पणी के लिए 2 अंक हैं तथा यह प्रश्न 10 अंक का है। प्रश्न - 27 में पाँच विषय दिए गए हैं जिनमें से किसी एक विषय पर हिंदी में निबंध लिखिए। यह प्रश्न 15 अंक का है।

समय 1 घंटा
पूर्णांक – 50

1- राजभाषा किसे कहते हैं ? (1X25=25)

राजकाज की भाषा को / उत्तर भारतीय जनता की भाषा को / निजी पत्राचार की भाषा को / संस्कृत को

2- तारामणि, चेन्नई में किसकी नींव स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने रखी थी ?

Sep 29, 2011

कराहटों सी करवटें


कराहटों सी करवटें
जख्मों के जश्न से
बदल रही हैं बार-बार

आर-पार, वार-पार
धूम मची द्वार-द्वार
तार-तार दामन में
दिल भी हुए तार-तार

यह धरा भी धरी धरी
धड़कती है धार-धार
जीत रहा जुल्म जहां
हार रहे वीर वार

ये फिरंगी आग आज
फ़ैल गई बाज-बाज़
हिंद में ही सिंध धसी
सभी फंसे द्वार पार


रूठ गया कंठ सुन
जालिमों की अंट संट
डंठल से दंश डसें
स्याम से न सधे कंस

रावण का राग सुन
सुर भी जपें सरगम

रोज इस झन झन से
झेंप रहें सद जन


काठ के कुम्हार
अवे, ढूढ़ रहे कुल्हड़
कराहटों सी करवटें...

-अजय मलिक

Sep 23, 2011

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग

पेश हैं चार गज़ले कविताकोश के सौजन्य से।

शायर हैं दुष्यंत कुमार, मुनव्वर राना और सर्वत एम जमाल


एक:

खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही
अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही

हिन्दी व्याकरण से संबंधित दो बहुपयोगी लिंक

भारतकोश पर उपलब्ध है ज्ञान का भंडार। हिन्दी भाषा एवं अन्य भारतीय भाषाओं के संबंध में इतने सरल और गंभीर रूप में जानकारी मिलना बहुत कठिन है। हिन्दी व्याकरण से संबंधित दो बहुपयोगी लिंक यहाँ भारतकोश से जुडने के लिए दिए जा रहे हैं-

हिन्दी व्याकरण



(सौजन्य : भारतकोश)

Sep 22, 2011

अजी भाई साहब जी, सुनो तो जी...

अंधेरा ... इस घनघोर अंधेरे में खड़ा हुआ मैं, उजाले में चलते-फिरते, गुलाटियाँ लगाते, गिलोरियाँ खेलते, गोटियाँ बिठाते कई तरह के चेहरों को, बड़ी आसानी से देख पाता हूँ। मुझे अंधेरे में गुम हो गया मान लिया गया है। मैं शायद ब्रह्मांड का हिस्सा बन गया हूँ... ब्लैक होल में समाकर सब ऊर्जाएँ सबसे बड़ी ऊर्जा का हिस्सा बन जाती हैं। अंधेरा जो सबसे बड़ी ऊर्जा है। अंधेरे से सब उजाले में जाना चाहते हैं ... उजाले से कोई भी अंधेरे में नहीं आना चाहता, मगर आना तो पड़ता है। ऐसा कोई नहीं जो अंधेरे में समाने से बच सके। घर का अंधेरा सब मिटाना चाहते हैं; बाकी किसी जगह बिखरे अंधेरे को कोई देखना तक नहीं चाहता। इस अंधेरे में छुपे रहस्यों को क्यों कोई जानना-समझना-छूना-पहचानना नहीं चाहता।

Sep 20, 2011

दो नंबरी तीन हों तो क्या हो...

लगभग 18 वर्ष पूर्व एक लेख लिखा था और शायद राष्ट्रीय सहारा में छपा था। लेख का शीर्षक था- "अधिकांश सुपर स्टारों का खास रिश्ता है दो के अंक से।" पाँच-छह साल पहले एक टी वी चैनल पर इसी विषय पर एक कार्यक्रम भी आया था।
संजय मासूम ने आज भट्ट साहब को जन्मदिन की बधाई दी है फेसबुक के माध्यम से। भट्ट साहब को मेरी ओर से भी बधाई। मैं उनसे कभी मिला तो नहीं मगर बंबई के मुंबई में बदलने के दौर में जब शक्ति सामंत सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष हुआ करते थे तब एक बार फोन पर उनसे जरूर बातचीत हुई थी। 

Sep 18, 2011

रचना जो प्रस्तावना में ही खो गई

कल किसने देखा है? न आने वाला कल आता है न जाने वाला ही कभी लौटता है। आने वाले की आशा तो की जा सकती है मगर चले जाने वाले की तो बस कल्पना ही की जा सकती है। बीते कल में आने वाले कल की जो उम्मीदें थीं वे एक और बीते हुए कल में समा गईं। एक मुस्कराते हुए सौम्य चेहरे से खिलखिलाहट और किलकारियों की आशा में चमकते दो गौरवान्वित चेहरों पर अचानक ढेर सारी झुर्रियां छा गईं और रचना प्रस्तावना में ही खो गई।
एक रचना जो सैंकड़ों, हजारों और शायद लाखों ज़िंदगियों की उम्मीद और मुस्कान बनने को आतुर थी, वह अचानक उपसंहार तक पहुँचते-पहुंचते स्वत: मिट गई। कल शाम से मैं उसी रचना के बारे में सोच रहा हूँ... वह रचना जो अब नहीं है, वह रचना जिसे हम बहुत दूर तक असीमित संभावनाओं के साथ आगे जाता देख रहे थे...जिसके उपचार के भरोसे बुढ़ापे के दस सालों को बारह-पंद्रह तक बढ़ा लेने के सपने हम बहुत सारे लोग देख रहे थे। वह रचना अचानक न जाने कैसे मिट गई। सिर्फ साढ़े तीन महीने पहले जिस रचना के साथ हम लोग बहुत लंबी चौड़ी हांक रहे थे। जो हमें हाँकता देख हँस रही थी, हमारे साथ अपनी संपूर्णता के साथ थी, जिसे सुबह जल्दबाज़ी में हम उठाए बिना ही चले आए थे, वह हमारी रचना, कल से भी पहले कल न जाने क्यों हम सब से रूठकर कहीं खो गई। 
ऐसा भी कभी हो सकता है क्या? विश्वास नहीं हो रहा... मगर करना तो पड़ेगा क्योंकि बीता हुआ कल कभी भी नहीं आता। उस दिव्य आत्मा को जो दिवंगत हो गई, प्रणाम और ईश्वर से प्रार्थना है कि उसे शांति दे... और संबल, साहस और शक्ति दे उन रचनाकारों को जिनकी रचना अब नहीं रही।                 

Sep 15, 2011

पुरस्कृत होकर एक साल तक अपना नाम सिर्फ हिंदी में लिखेंगे

कितने सारे पुरस्कार!
       हिंदी में श्रेष्ठ या उत्कृष्ट काम करने के लिए या सिर्फ हिंदी में काम करने के लिए राष्ट्रीय स्तर से लेकर छोटे-छोटे कार्यालयों के स्तर पर पुरस्कार ग्रहण करने वाले हिंदी सेवियों को हार्दिक बधाई। उनके सत्प्रयत्नों से राजभाषा हिंदी को जो मान-सम्मान मिला है उसके लिए सचमुच वे बधाई के पात्र हैं, अनुकरणीय हैं। उनसे तथा हिंदी से जुड़े पुरस्कारों से प्रेरित होकर अनेक लोग हिंदी से जुड़ेंगे, हिंदी में कामकाज करेंगे, हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। प्रेरणा, प्रोत्साहन और सद्भावना ये ही तो मूल मंत्र हैं सरकार की राजभाषा नीति के।

Sep 14, 2011

हिंदी दिवस समारोह का सीधा प्रसारण (लाइव वैबकास्ट) राजभाषा विभाग की वेबसाइट के माध्यम से

आज प्रात: 11.30 बजे से विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित हिंदी दिवस समारोह का सीधा प्रसारण दूरदर्शन के साथ-साथ राष्ट्रीय सूचना-विज्ञान केन्द्र भवन, नई दिल्ली से लाइव वैबकास्ट के जरिए देखा जा सकेगा। इसके लिए राजभाषा विभाग की वेबसाइट http://www.rajbhaasha.gov.in/  पर भी लिंक उपलब्ध है-


http://webcast.gov.in/hindi-diwas/


हिंदी दिवस मनाएँ, हिंदी को हर दिल की मंजिल बनाएँ 

हम हिन्दुस्तानी हैं, हिंदी हमारे स्वाभिमान का प्रतीक है  

भारत का कोई भी नागरिक हिंदी से अपरिचित नहीं है



  

Sep 11, 2011

हिंदी सबके लिए की ओर से हिंदी दिवस 14 सितंबर 2011 के अवसर पर शुभकामनाएँ

अद्भुत है हिंदी दिवस का ऐसा कलात्मक स्वागत

राजभाषा विभाग की वेबसाइट पर इस बार अद्भुत कलात्मक ढंग से हिंदी दिवस का स्वागत किया गया है। एक बार जरूर लॉग इन करें- http://www.rajbhasha.gov.in/ पर


राजभाषा विभाग की वेबसाइट से साभार

Sep 8, 2011

हिंदी दिवस पर माननीय गृह मंत्री जी का संदेश


राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की वेबसाइट http://www.rajbhasha.nic.in/ के सौजन्य से

Sep 4, 2011

मेरे गुरु...और गुरुजनों को प्रणाम

मन की उदासी या उदास मन, आवारा फिल्म का वह संवाद “दिल और कानून... कानून और दिल; कानून किसी दिल को नहीं मानता... और दिल भी किसी कानून को नहीं मानता...”  स्वर्गीय डॉ0 के पी अग्रवाल की बहुत याद आती है... विशेषकर सितंबर का महीना शुरू होने पर... ऐसे गुरु, शुभचिंतक और जिगरी दोस्त के बिना उदास मन की उदासी और अधिक बढ़ जाती है।

Sep 1, 2011

यूँ तुझे नमन है गजानन






Aug 18, 2011

कुछ नए लिंक्स हिंदीटैक के सौजन्य से

कल मेल से हिंदीटैक का एक लिंक मिला और उसपर कुछ बेहद उपयोगी लिंक्स मिले। इन लिंक्स को यहाँ बिना किसी अभ्युक्ति के दिया जा रहा है। कृपालु पाठक ही इनपर अपनी प्रतिक्रिया दें... 






Aug 16, 2011

किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है...

      राहत इन्दौरी की 2 ग़ज़लें
          (वेब दुनिया के सौजन्य से)
            (1)

अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे


तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे


ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे

अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे

           (2)

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है
 

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है


मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है
 
हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है


जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है


सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

                                                               (वेब दुनिया के सौजन्य से)

Aug 15, 2011

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा










Aug 10, 2011

क्या आप जानते हैं ??



यह अजीब सी बात है मगर शर्तिया आप इस सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं कि...

अंग्रेज़ी के a, b, c, और d अक्षर 1 से 99 तक की अंगेजी गिनतियों में प्रयोग नहीं होते,


अक्षर पहली बार 100 (Hundred) में प्रयोग होता है...

a, b और c अक्षर 1 से 999 तक की अंगेजी गिनतियों में प्रयोग नहीं होते,

a अक्षर पहली बार 1000 (Thousand) में प्रयोग होता है...

b और c अक्षर 1 से 999,999,999 तक की अंगेजी गिनतियों में प्रयोग नहीं होते,

b अक्षर पहली बार अरब (Billion) में प्रयोग होता है...

और

c अक्षर का प्रयोग अंगेजी गिनतियों में कहीं भी नहीं होता।

(हिंदी शिक्षक बंधु से प्राप्त ई मेल पर आधारित)