Dec 31, 2011

व्हाई दिस कोलावरी डी... यह किस भाषा का "सॉन्ग" है!

यह इस वर्ष की अंतिम पोस्ट है। अपनी भाषाओं की चिंता करते हुए काफी घबराहट के साथ मैं भी कोलावरी डी' का आनंद ले रहा हूँ। लगातार यही विचार मन में आता है कि इस गाने में तमिल अथवा हिंदी के कितने शब्द हैं? वर्ष 1991 तथा 2001 की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार हमारे देश में तमिल बोलने वालों का प्रतिशत 6.32 से घटकर 5.91 पर आ गया। वर्ष 2011 की जनगणना के पूरे आँकड़े अभी नहीं मिल पाए हैं। प्रश्न यही है कि हम कहाँ जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं? तमिल फिल्मों के सितारे और पूरा देश एक ऐसे गाने को तमिल का गाना मानकर वह-वाह कर रहे हैं जिसमें तमिल का शायद ही कोई शब्द है। तमिल का लहजा ज़रूर मौजूद कहा जा सकता है। इस गीत की धुन में नयापन है, पकड़ है, माधुर्य है मगर अपनी कोई भी भाषा या उसका कोई शब्द ... शायद नहीं है। आने वाले नए वर्ष 2012 में इस बारे में चिंतन जरूर किया जाना चाहिए कि क्या ऐसे गानों से हम जाने-अंजाने अपनी भाषाओं को तो  भुलाने के दुष्चक्र में नहीं फँसते जा रहे हैं। मुझे ऐसी एक भी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी, जिसमें इस गाने की भाषा पर चिंता व्यक्त की गई हो। हो सकता है कुछ लोग सहमत न हों परंतु यह मेरा व्यक्तिगत विचार है कि तमिल भाषा का  विकास, हिंदी के विकास के लिए सर्वाधिक जरूरी है। तमिल को मजबूत बनाने से हिंदी भी स्वत: मजबूत होती है क्योंकि इससे अंग्रेज़ी की गति में ठहराव आता है। 
नव वर्ष 2012 की शुभकामनाओं के साथ, मैं एक हिंदी भाषी भारतीय, अपनी सभी भाषाओं के उत्तरोत्तर विकास की कामना करते हुए आग्रह करना चाहता हूँ कि कोलावरी डी' पर आप भी सोचिए... संगीत को सहज स्वीकारिये मगर अपनी भाषाओं के सुर, लय, ताल को ताक पर मत रखिए।  

नववर्ष 2012 हमारी सभी भाषाओं के लिए भी शुभ हो।

-अजय मलिक

नए साल की शुभकामनाएँ

हिंदी/इंडिक सक्रिय करने के लिए अजय मलिक की एक वीडियो फिल्म

video

इस फिल्म को पावर पॉइंट से बनाया गया है। मूल फिल्म का आकार (साइज़) लगभग 746 एम बी था, जिसे ब्लॉग पर दे पाना संभव नहीं था। इसे ब्लॉग पर लाने के लिए लगभग 10 गुणा छोटा करना पड़ा जिसके कारण इसकी गुणवत्ता भी उतनी ही घट गई। एक वरिष्ठ की सलाह पर बस प्रयोग के तौर पर यह फिल्म यहाँ दी जा रही है।
-प्रतिभा मलिक

Dec 24, 2011

पाँच मिनटों में सीखें हिंदी इंस्क्रिप्ट कुंजी पटल लेआउट - लीना महेंडले

[यह आलेख साभार राजभाषा गूगल ग्रुप से लिया गया है। सुश्री लीना महेंडले के इस आलेख में इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल लेआउट सीखने का बेहद सरल और आकर्षक तरीका बताया गया है। इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे हिंदी सहित किसी भी भारतीय भाषा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कुंजीपटल सभी भारतीय भाषाओं के लिए लिनक्स तथा मैक ऑपरेटिंग सिस्टम्स में भी उपलब्ध है। यदि इस आलेख को ध्यान से पढ़ा जाए तो इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल लेआउट को आत्मसात करने में बहुत कम समय लगता है। फिर बस कुछ घंटों के अभ्यास की जरूरत ही भारतीय भाषाओं में टाइप करने के लिए शेष रह जाती है। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और न्यायाधीश द्वारा विशेषकर स्कूली बच्चों के लिए तैयार इस आलेख से यह भी प्रमाणित होता है कि यदि मन से शुरुआत भर हो जाए तो भारतीय भाषाओं और संघ की राजभाषा हिंदी में कामकाज करने में किसी को कोई कठिनाई नहीं हो सकती। ]   
बच्चों, अब तो स्कूलों में भी संगणक (कम्प्यूटर) सिखाया जाने लगा है और तुममें से कईयों के घर में भी यह जरूर होगा... तो क्या तुम जानते हो कि संगणक पर हिंदी सीखने के लिये एक  युक्ति है जिसमें केवल आधा घंटा पर्याप्त है और वह भी अंग्रेजी टंकण-ज्ञान पर निर्भरता के बिना। और अगर पूरी बात कहूँ तो हरेक भारतीय भाषा सीखने की यही युक्ति है।

Dec 22, 2011

फिर एक लंबा अंतराल...शायद अब तक का सबसे लंबा

फिल्म समारोहों में मैं कभी अधूरे मन से नहीं गया था मगर इस बार यह भी हो गया। हर साल 15 दिन मैं फिल्म समारोह ले लिए रखा करता था...इस बार सिर्फ एक दिन रह गया। पूर्णता उस एक दिन में भी पाने की कोशिश की। संयोग से एक के बाद एक तीन मलयालम फिल्में देखने का मौंका मिला।
विम वेंडर्स निर्देशित जर्मनी की प्रस्तुति "पिना" देखकर मन गदगद हो गया। इस थ्री डी फिल्म पर बहुत कुछ लिखने की इच्छा हुई परंतु एक शब्द भी नहीं लिखा जा सका। ईरानी फिल्मों का दबदबा आज भी कायम है। सिराज की सिफारिश पर असगर फरहीदी निर्देशित "नाड़ेर एंड सिमीन अ' सेपरेशन" देखी और सिराज को धन्यवाद दिया। यकीन मानिए लाजवाब फिल्म थी।   "विनर" देखने से कैसे वंचित रह गया, यह अपने आप में बड़ी घटना रही। इज़राइल की जोसेफ मड्मोंय निर्देशित "रेस्टोरेशन" ने भी निराश नहीं किया। समीर ताहिर निर्देशित मलयालम फिल्म "चप्पा कुरिषु" पूरी नहीं देख पाया मगर वी के प्रकाश की "कर्मयोगी और राजेश पिल्लै की "ट्रैफिक" (दोनों मलयालम) पूरी देखने का मौका मिला। कर्मयोगी तो कमाल की फिल्म रही मगर ट्रैफिक की लम्बाई ने थोड़ा बेचैन किया। लेकिन मजेदार रही रेवती की 17 मिनट की अंग्रेज़ी/तमिल फिल्म "रेड बिल्डिंग इज़ वेयर द' सन सेट्स"। 
इन सब फिल्मों की चर्चा तभी अच्छे से कर पाता जब फिल्म समारोह में मन से जाना होता। इस बार गोवा गया तो सिर्फ डॉक्टर साहब और भाभी जी से मिलने था। किसी भी फिल्म समारोह से ज्यादा जरूरी था उनसे मिलना।  
मगर इस बार इतना लंबा अंतराल हो गया कि खुद हैरान हूँ... व्यस्तता और जिम्मेदारी के अहसास ने वक्त ही नहीं दिया। पिछले बीस दिनों में दो बार दिल्ली, गोवा, मद्रास ने इतना उलझाकर रखा कि 4-6 घंटों से ज्यादा सोना भी नसीब नहीं हुआ। फिर भी जिंदगी में व्यस्तता स्वयं में एक बड़ा सहारा है सुकून से जीने का। इतने पर भी मन तो यही कहता है-इतना बड़ा अंतराल तो अच्छी बात नहीं है, इसे नहीं ही होना चाहिए था...   

- अजय मलिक